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अष्टम अध्याय

पुरुषायित प्रकरण विपरीत रति

श्लोक-(2)- नायकस्य संतताभ्यासात्परिश्रममुपलभ्य रागस्य चानुपशमम्, अनुमता तेन तमधोऽवपात्य पुरुषायितेन साहाय्यं दद्यात्।।

अर्थ- संभोग क्रिया में जिस समय स्त्री, पुरुष की तरह का व्यवहार करती है तो उसे विपरीत रति कहते हैं। स्त्री के साथ काफी देर से संभोग करते हुए जब पुरुष थक जाता है, लेकिन स्त्री की तब तक भी काम-इच्छा शांत नहीं हुई होती तो ऐसे में स्त्री, पुरुष की मर्जी से उसके ऊपर लेटकर संभोग क्रिया करती है।

श्लोक-(2)- स्वाभिप्रयाद्वा विकल्पयोजनार्थिनी।।

अर्थ- स्त्री स्वयं अपनी इच्छा से भी पुरुष के साथ यह क्रिया कर सकती है।

श्लोक-(3) नायककुतूहलाद्वा।।

अर्थ- अगर पुरुष थक भी नहीं हो रहा होता तो भी सिर्फ आनंद के लिए वह नीचे लेट जाता है और स्त्री उसके ऊपर लेटकर संभोग की क्रिया करती है।

श्लोक-(4)- तत्र युक्तयन्त्रेणैवेतरेणोत्थाप्यमाना तमधः पातयेत्। एवं च रतमविच्छिन्नरसं तथा प्रवृत्तमेव स्यात्। इयेकोऽयं मार्गः।।

अर्थ- संभोग क्रिया के समय स्त्री अगर विपरीत रति की इच्छा रखकर पुरुष के ऊपर लेटना चाहती है तो उसे इस तरह से पुरुष के ऊपर लेटना चाहिए कि पुरुष का ध्यान बिल्कुल भी संभोग क्रिया से न हटे । इस तरह से संभोग करने से न तो उन दोनों की उत्तेजना ही कम होती है और आखिरी तक इस क्रिया का आनंद बना रहता है।

श्लोक-(5)- पुनरारम्भेणादित एवोपक्रमेत्। इति द्वितीयः।।

अर्थ- अगर एक बार संभोग क्रिया पूरी तरह हो जाने के बाद दुबारा करने की इच्छा होती है तो उसकी शुरूआत में ही स्त्री को पुरुष के ऊपर लेटकर विपरीत सेक्स करना चाहिए।

श्लोक-(6)- सा प्रकीर्यमाणकेशकुसुमा श्र्वासविच्छिन्नहासिनी वक्त्रसंसर्गार्थ स्तनाभ्यामुरः पीडयनंती पुनः पुनः शिरो नामयन्ती याश्र्चेष्टाः पूर्वमसौ दर्शितवांस्ता एव प्रतिकुर्वीत। पातिता प्रतिपातयामीति हसन्ती तर्जयन्ती प्रतिघ्नती च ब्रूयात्। पुनश्र्चव्रीडां दर्शयेत्। श्रमं विरामाभीप्सां च। पुरुषोपसृप्तै रेवोपसर्पेत्।।

अर्थ- इसके अंतर्गत स्त्री जब पुरुष के ऊपर लेटकर संभोग क्रिया करती है तो उसके बालों में गुंथे हुए फूल बिखर जाते हैं। वह हल्का सा भी हंसती है तो उसकी सांस फूलने लगती है। जब वह अपने मुंह को पुरुष के मुंह के पास उसे चूमने के लिए ले जाती है तो अपने स्तनों से वह पुरुष की छाती को भी दबाती है। संभोग क्रिया के समय जब वह तेजी से हिलती है तो उसका सिर भी तेजी के साथ हिलने लगता है। इस समय स्त्री बिल्कुल ही पुरुष की तरह हो जाती है। वह उसी की तरह नाखूनों को गढ़ाना, दांतों से काटना, चुंबन आदि करती है। इसके बाद वह जोर से हंसते हुए कहती है कि पहले तुमने मुझे गिराया था अब मैं तुम्हे नीचे गिराकर बदला ले रही हूं। लेकिन जब स्त्री की काम-उत्तेजना बिल्कुल ही समाप्त हो जाती है तो वह शर्माकर और सिकुड़कर आंखें बंद कर लेती है और थककर पलंग पर लेट जाती है।

श्लोक-(7) तानि च वक्ष्यामः।।

अर्थ- इसके अंतर्गत पुरुष संभोग क्रिया के समय किस तरह स्ट्रोक लगाता है यह बताया गया है।

श्लोक-(8)- पुरुषः शयनस्थाया योषितस्तद्वचनव्याक्षिप्तचित्ताया इव नीवीं विश्लेषयेत्। तत्र विवदमानां कपोलचुंबनेन पर्याकुलयेत्।।

अर्थ- पलंग पर लेटी हुई स्त्री जब पुरुष की बातों में पूरी तरह से खोई हुई होती है तब पुरुष को धीरे से उसकी साड़ी की गांठ को ढीली कर देनी चाहिए। अगर इसके बीच में स्त्री मना करती है तो पुरुष को उसका मुंह चूमकर उसे बेचैन कर देना चाहिए।

श्लोक-(9)- स्थिरलिङग्श्च तत्र तत्रैनां परिस्पृशेत्।।

अर्थ- जब पुरुष का लिंग पूरी तरह से उत्तेजित अवस्था में आ जाए तब उसे स्त्री के शरीर के कोमल अंगों को धीरे-धीरे से सहलाना चाहिए।

श्लोक-(10)- प्रथमसंगता चेत्संहतोर्वोरन्तरे घट्टनम्।।

अर्थ- सुहागरात के समय अगर स्त्री शर्म के मारे अपने पेटीकोट में हाथ नहीं लगाने देती और अपनी दोनों जांघों को समेट लेती है। ऐसी स्थिति में पुरुष को उसकी जांघों पर हाथ फेरते हुए उन्हें खोल देना चाहिए।

श्लोक-(11)- कन्यायाश्च।।

अर्थ- अगर किसी कुंवारी लड़की से संभोग करते हैं तो दसवें सूत्र में बताई गई पहली समागम विधि से संभोग करना चाहिए।

श्लोक-(12)- तथा स्तनयोः संहतयोर्हस्तयोः कक्षयोरंसयोग्रींवायमिति च।।

अर्थ- उसी तरह स्त्री की कांख, स्तनों, कमर, गर्दन और जांघों में हाथ फेरना चाहिए।

श्लोक-(13)- स्वैरिण्यां यथासात्म्यं यथायोगं च। अलके चुम्बनार्थमेनां निर्दयमवलम्बेत् हनुदेशे चाङठ्लिसंपुंटेन।।

अर्थ- जो स्त्रियां मनचली किस्म की होती हैं उनके साथ तो जैसा सही लगे वैसा ही करना चाहिए। मुंह चूमने के लिए उनके बालों में हाथ डालकर उनका मुंह अपनी तरफ घुमाकर चूमना चाहिए या गालों में धीरे से चुटकी काटनी चाहिए।

श्लोक-(14)- तत्रेतरस्या वीडा निमीलनं च। प्रथमसमागमे कन्यायाश्च।।

अर्थ- जो स्त्री पहली बार किसी पुरुष से मिलती है तो शर्म के मारे अपनी आंखों को बंद कर लेती है।

श्लोक-(15)- रतिसंयोगे चैना कथमनुरज्यत इति प्रवृत्त्या परीक्षेत।।

अर्थ- नई-नवेली दुल्हन को सुहागरात के दिन संभोग क्रिया करने के लिए किस तरह राजी किया जाए यह उसकी प्रवृत्ति को देखकर और समझकर ही करना चाहिए।

श्लोक-(16)- युक्तयन्त्रेणोपसृप्यमाणा यतो दृष्टिमावर्तयेत्तत एवैनां पीडयेत्। एतद्रहस्यं युवतीनामिति सुवर्णनाभः।।

अर्थ- संभोग क्रिया के समय स्त्री, पुरुष द्वारा अपने जिस अंग को दबाने पर उत्तेजना में भरकर अपनी आंखों की पुतलियों को घुमाने लगती है तो उसके उसी अंग को बार-बार दबाना चाहिए। इससे स्त्री तुरंत ही काम-उत्तेजित हो जाती है।

श्लोक-(17)- गात्राणां स्त्रंसन नेत्रनिमीलनं वीडानाशः समधिका च रतियोजनेति स्त्रीणां भावलक्षणम्।।

अर्थ- संभोग क्रिया के समय अंगों का ढीला पड़ जाना, आंखों को बंद कर लेना, शर्म का दूर हो जाना तथा पुरुष के लिंग को अपनी योनि से चिपकाए रखना आदि स्त्रियों के भाव के लक्षण है। उस समय स्त्री ज्यादा भावुक हो जाती है।

श्लोक-(18)- हस्तौ विद्युनोति स्विद्यति दशत्युत्थातुं न ददति पादेनाहन्ति रतावमाने च पुरुषातिवर्तिनी।।

अर्थ- जब स्त्री संभोग क्रिया के आखिरी चरण में हाथों और पैरों को पटकती है, पूरी तरह से पसीने में भीग जाती है, पुरुष को दांतों से काटती है, नाखूनों से नोचती है। इस स्थिति में पुरुष तो स्खलित हो जाता है लेकिन स्त्री पूरी तरह से तृप्त नहीं हुई होती। ऐसे में वह पुरुष को जोर से दबा लेती है, उसे बिल्कुल भी उठने नहीं देती है तथा सारी शर्मों-हय्या को छोड़कर पूरी जान से स्ट्रोक लगाती है।

श्लोक-(19)- तस्याः प्राग्यन्त्रयोगात्करेण संबाधं गज इव क्षोभयेत्। आ मृदुभावात्। ततो यन्त्रयोजनम्।।

अर्थ- संभोग क्रिया के समय स्त्री को जल्दी स्खलित करने के लिए पहले उसकी योनि के अंदर अपनी उंगलियों को जोर-जोर से फिराना चाहिए। जब ऐसा महसूस हो कि उसकी योनि गीली हो गई है तो उसके बाद संभोग क्रिया शुरू करनी चाहिए।

श्लोक-(20)- उपसृप्तकं मन्थनं हुलोऽवमर्दनं पीडितकं निर्घाता वराहघातो वृषाघातश्चटकविलसितं संपुट इति पुरुषोपसृप्तानि।।

अर्थ- संभोग क्रिया में 10 तरह के स्ट्रोक, उपसृप्तक, मंथन, हुल, अवमर्दन, निर्घात वृषाघात, वराहघात, चटकविलसित तथा सम्पुट ये पुरुषोपसृप्त पीड़ितक माने जाते हैं।

श्लोक-(21)- न्याय्यमृजस्मिश्रणमुपसृप्तकम्।।

अर्थ- वात्स्यायन ने संभोग क्रिया में सिर्फ उपसृप्तक (साधारण स्ट्रोकों) की ही सही बताया है बाकी को बेकार क्योंकि इसके अंतर्गत सिर्फ साधारण प्रकार से ही इन्द्रियों को मिलाया जाता है।

श्लोक-(21)- हस्तने लिंग सर्वतो भ्रामयेदिति मन्थनम्।।

अर्थ- मन्थन-

            जिस समय पुरुष द्वारा अपने लिंग को पकड़कर स्त्री की योनि के चारों ओर घुमाया जाता है तो उस क्रिया को मन्थन कहते हैं।

श्लोक-(22)- नीचीकृत्य जघनमुपरिष्याद्धट्टयेदिति हुलः।।

अर्थ- हुल-

            जिस समय पुरुष, स्त्री की जांघों को नीचा करके उन पर प्रहार करता है तो उसे हुल कहते हैं।

श्लोक-(23)- तदेव बिपरीतं सरभसमवमर्दनम्।।

अर्थ- स्त्री के नितंबों के नीचे तकिया रखकर पुरुष द्वारा जोर से स्ट्रोक मारना अवमर्दन कहलाता है।

श्लोक-(24)- लिंङेग्न समाहत्य पीडयंश्चिरमवतिष्ठेतति पीडितकम्।।

अर्थ- पीड़ितक-

            पुरुष जब अपने लिंग को स्त्री की योनि में प्रवेश कराके काफी देर तक जोर से दबाए रखता है तो उसे पीड़ितक कहा जाता है।

श्लोक-(25)- सुदूरमुत्यकृण्य वेगेन स्वजघनमवपातयेदिति निर्घातः।।

अर्थ- निर्घाता-

            पीछे हटकर जोरों से अपनी जांघों को गिराने को निर्घात कहा जाता है।

श्लोक-(26)- एकत एव भूयिष्ठमवलिखेदिति वराहघातः

अर्थ- पुरुष के द्वारा अपने लिंग को स्त्री की योनि में डालकर एक ही तरफ स्ट्रोक लगाने को वराहघात कहते हैं।

श्लोक-(27)- स एवोभयतः पर्यायेण वृपाघातः।।

अर्थ- वृषाघात-

स्त्री की योनि के अंदर पुरुष के अपने लिंग के द्वारा इधर-उधर स्ट्रोक मारना वृषाघात कहलाता है।

श्लोक-(28)- सकृन्मिश्रितमनिष्क्रमय्य द्विस्त्रिश्चतुरिति घट्टयेदिति चटकविल-सितम्।।

अर्थ- चटकविलसित-

            पुरुष द्वारा स्त्री की योनि में प्रवेश कराए गए लिंग से अंदर ही अंदर 2-3 धक्के लगाने चटकविलसित कहलाता है। यह सब स्त्री को चरम सुख की प्राप्ति होने पर समाप्त हो जाता है।

श्लोक-(27) रागावसानिकं व्याख्यातं करणं संपुटमिति।।

अर्थ- सम्पुट-

            सम्पुट संभोग क्रिया करते समय स्खलन होने पर होता है।

श्लोक-(30)- तेषां स्त्रीसात्मयाद्विकल्पेन प्रयोगः।।

अर्थ- स्त्री के आनंद और सुख को ध्यान में रखकर ही इनमें से किसी एक का प्रयोग किया जा सकता है।

श्लोक-(31)- पुरुषायिते तु संदंशो भ्रमरकः प्रेङखोलितमित्यधिकानि।।

अर्थ- विपरीत संभोग के भेद- सन्दंश, भ्रमरक और प्रेङखोलित विपरीत सेक्स के 3 प्रकार है।

श्लोक-(32)- वाडवेन लिंग्ङमवगृह्म निष्कर्षन्त्याः पीडयन्त्या वा चिरावस्थानं संदंशः।।

अर्थ- सन्दंश-

            स्त्री जब पुरुष के लिंग को अपनी योनि में बहुत देर तक फंसाकर रखती है तो उसे सन्दंस कहते हैं।

श्लोक-(32)- युक्तायन्त्रा चक्रद्भमेदिति भ्रमरक आभ्यासिकः।।

अर्थ- भ्रमरक-

भ्रमर (भंवरा) की तरह घूमने को भ्रमरक कहते हैं।

श्लोक-(33)- तत्रेतरः स्वजघनमुत्क्षिपेत्।।

अर्थ- भ्रमरक विपरीत सेक्स के समय पुरुष को अपनी जांघों को ऊपर उठा लेना चाहिए।

श्लोक-(34)- जघनमेव दोनायमानं सर्वतो भ्रामयेदिति प्रेङखोलितकम्।।

अर्थ- प्रेङखोलितकम्-

संभोग क्रिया करते समय थक जाने के बाद स्त्री को अपनी इन्द्रियों को संलग्न करते हुए अपने माथे को पुरुष के माथे पर रखकर आराम करना चाहिए।

श्लोक-(35)- विश्रान्तायां च पुरुषस्य पुनरावर्तनम्। इति पुरुषायितानि।।

अर्थ- अगर स्त्री आराम करने के बाद भी तृप्त नहीं होती तो उसे फिर से नीचे की ओर आ जाना चाहिए तथा पुरुष को उसके ऊपर लेटकर संभोग क्रिया करनी चाहिए।

श्लोक-(36)- भवन्ति चात्र श्लोकाः-

प्रच्छादितस्वभावापि गूढाकारापि कामिनी। विवृणोत्येव भावं स्वं रागादुपरिवर्तिनी।।

अर्थ- इस विषय के पुराने प्रमाणिक श्लोक यह है-

जो स्त्रियां शर्म आदि की वजह से अपने भावों को प्रकट नहीं कर पाती है वह भी विपरीत सेक्स क्रिया के समय काम-उत्तेजना में आकर अपने असली रूप में आ जाती है।

श्लोक-(37)- यथाशीला भवेन्नारी यथा च रतिलालसा। तस्या एव विचेष्टाभिस्तत्सर्वमुपलक्षेयेत्।।

अर्थ- जिस तरह का शांत स्वभाव स्त्री का होता है और जिस तरह की उनकी काम-उत्तेजना होती है वह विपरीत सेक्स के द्वारा प्रकट हो जाता है।

श्लोक-(41)- न त्वेवर्तो न प्रसूतां न मृगीं न च गर्भिणीम्। न चातिव्यायतां नारीं योजयेत्पुरुषायिते।।

अर्थ- गर्भवती स्त्री, छोटी योनी वाली स्त्री, जिस स्त्री का मासिकधर्म आया हो और मोटी स्त्री को विपरीत सेक्स नहीं करना चाहिए।

जानकारी-

          आचार्य वात्स्यायन के कामसूत्र का ज्ञाता होने की वजह से जिस प्रसंग के बारे में बताया है, उसके शिव (अच्छे) और अशिव (बुरे) दोनों ही पक्षों को पेश करता है, लेकिन वह चारों तरफ शिव (अच्छे) पक्ष का ही समर्थन करते नजर आते हैं। आचार्य वात्स्यायन ने इस प्रकरण में उपसृप्त और विपरीत सेक्स, इन दो विषयों का प्रतिपादन खासतौर से किया है।

        आचार्य वात्स्यायन ने इस अनिर्वयनीय आनंद की अनुभूति को बहुत ज्यादा सरल बनाने के लिए संभोग तथा उसके योगों, प्रयोगों और उसकी प्रतिक्रियाओं को विशदरूप से वर्णन किया है। उनके मुताबिक इन क्रियाओं को वह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं मानता है। भोग आसनों का मकसद जीवन की सिद्धि और जीवन कला का अभिज्ञान हासिल करना है।

          आचार्य वात्स्यायन ने अच्छे और बुरे दोनों तरह की प्रवृत्तियों और प्रयोगों का वर्णन किया है लेकिन वह स्त्री और पुरुष दोनों की शुभ नियुक्ति का इच्छुक है। उनका स्वयं का मानना है कि शास्त्र, नियम-विधान से कुछ नहीं होता। अगर व्यक्ति और समाज को सुरक्षित करना है तो उसके लिए पुनीत वातावरण तथा शुभ नियुक्ति ही सही है।

          इस आठवें अध्याय के 2 मुख्य प्रतिपाद्य है- पुरुषायित और पुरुषोपसृप्त। दोनों विषयों को अपने नाम के आधार पर दो प्रकरणों में बांटा गया है। इन दोनों प्रकरणों के विषय का प्रयोजन जितना हमारे आध्यात्मिक जीवन से है उससे कहीं ज्यादा व्यावहारिक जीवन से भी है। व्यावहारिक पक्ष में संभोग को कला के रूप में बताया गया है।

          संभोग क्रिया करते समय जब पुरुष थक जाए और स्त्री की उत्तेजना बढ़ रही हो तो उस समय स्त्री को अपनी तृप्ति के लिए और पुरुष को आराम देने के लिए काम-उत्तेजित पुरुष की तरह ही बर्ताव करके विपरीत सेक्स करना चाहिए। लेकिन स्त्री को उसी स्थिति में विपरीत सेक्स करना चाहिए जब कि पुरुष संभोग करते-करते शांत हो गया हो लेकिन उसकी उत्तेजना कम न हुई हो। जबकि स्त्री की काम-उत्तेजना काफी बढ़ रही हो। ऐसे समय में पुरुष के निवेदन करने पर, स्त्री को पुरुष के ऊपर लेट जाना चाहिए और पुरुष को स्त्री की तरह नीचे लेटकर संभोग की क्रिया करनी चाहिए।

          संभोग क्रिया के समय नागरक यह जांच करता है कि स्त्री की जननेन्द्रिय के अंदर किस स्थान पर लिंग के स्पर्श से या रगड़ से अपनी उत्तेजना को आंखों के द्वारा प्रकट करती है। खासतौर पर उसी जगह पर जब पुरुष उपसर्पण करता है तो अन्तःउपसर्पण किया जाता है। उपसर्पण करते हुए पुरुष को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जिस स्त्री के साथ संभोग क्रिया की जा रही है वह अक्षतयोनि कुमारी है या स्वैरिणी या दूसरी तरह की है। पुरुषाय़ित और उपसृप्तक- यह दोनों प्रयोग पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका के बीच में काम-उत्तेजना बढ़ाने में बहुत ज्यादा मददगार साबित होते हैं।

श्लोक- इति श्रीवात्सायायनीये कामसूत्रे साम्प्रयोगिके द्वितीयेऽधिकरणे पुरुषोपसृप्तानि पुरुषायितं चाष्टमोऽध्यायः।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय