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पंचम अध्याय

दशन छेद्यविधि प्रकरण

श्लोक(1)- उत्तरौष्ठमन्तर्मुखं नयनमिति मुत्तवा चुम्बनवद्दशनरदन स्थानानि।।

अर्थ- ऊपर वाला होंठ, आंख और जीभ को छोड़कर बाकी सभी वह अंग जिनमें चुंबन किया जा सकता है उनको दांतों से भी काटा जा सकता है।

श्लोक(2)- गुणानाह- समाः स्निग्धच्छाया रागग्राहिणो युक्तप्रमाणा निश्छिद्रास्तीक्ष्णाग्रा इति दशनगुणाः।।

अर्थ- दांतों के गुण-

          दांत ऊंचे-नीचे न होकर बिल्कुल समान होने चाहिए। दांतों में चमक होनी चाहिए, पान आदि खाने से दांत लाल नहीं होने चाहिए। दांत न तो बहुत ज्यादा बड़े होने चाहिए और न ही ज्यादा छोटे होने चाहिए। दांतों के बीच में छेद नहीं होना चाहिए। दांत एक-दूसरे से बिल्कुल सटे होने चाहिए और तेज होने चाहिए।

श्लोक(3)- कुण्ठा राज्युद्रताः पुरुषाः विषमाः श्लक्ष्णाः पृथवो विरला इति च दोषाः।।

अर्थ- दांतों के अवगुण-

          दांतों का छोटा-बड़ा होना, बाहर की तरफ निकलना, एक-दूसरे से दूरी पर होना, खुरदरे होना, पीलापन छाना आदि।

श्लोक(4)- गूढकमुच्छूनकं बिन्दुर्बिन्दुमाला प्रवालमणिर्मणिमाला खण्डाभ्रकं वराहचर्वितकमिति दशनच्छेदनविकल्पाः।।

अर्थ- दांतों से काटने वाले 8 भेद-

          गूढक, उच्छूनक, बिन्दुमाला, बिन्दु, प्रवासमणि, मणिमाला, खण्डाभ्रक तथा वराहचर्वित दांतों से काटने वाले 8 भेद होते हैं।

श्लोक(5)- नातिलोहितेन रागमात्रेण विभावनीयं गूढकम्।।

अर्थ- गूढ़क

          जब होंठों को दांतों से हल्का सा दबाया जाता है तो होंठ में हल्का सा लालीपन आ जाता है लेकिन निशान न उभरे तो उसे गूढ़क कहा जाता है।

श्लोक(6)- तदेव पीडनादुच्छूनकम्।।

अर्थ- उच्छूनक

          होंठ को जोर से काटने को उच्छूनक कहा जाता है।

श्लोक(7)- तदुभयं बिन्दुरधरमध्य इति।।

अर्थ- उच्छूनक गुढक और बिन्दु होंठों के बीच में किये जाते हैं।

श्लोक(8)- उच्छूनकं प्रवालमणिश्च कपोले।।

अर्थ- उच्छूनक और प्रवालमणि गालों पर ही किये जाते हैं।

श्लोक(9)- कर्णपूरचुंबन नखदशनच्छेद्यमिति सव्यकपोलमण्डनानि।।

अर्थ- दांतों और नाखून से काटना, चुंबन तथा कर्णपुर बाएं गाल के श्रृंगार कहलाते हैं।

श्लोक(11)- दन्तौष्ठसंयोगाभ्यासनिष्पादनात्प्रवालमणिसिद्धिः।।

अर्थ- हर बार एक ही जगह को दांतों और होंठों से दबाने की क्रिया को प्रवालमणि कहते हैं।

श्लोक(12)- अल्पदेशायाश्च त्वचो दशनद्वचसंदंशजा बिन्दुसिद्धिः।

अर्थ- शरीर के बहुत से अंगों पर बार-बार दांतों से काटने पर जब रेखा सी उभर आती है तो उसे मणिमाला कहते हैं।

श्लोक(13)- अल्पदेशायाश्च त्वचो दशनद्बयसंदंशजा बिन्दुसिद्धिः।।

अर्थ- दांतों से गर्दन आदि की खाल को खींचकर हल्का सा निशान बना देने को बिंदु कहते हैं।

श्लोक(14)- सवैंर्बिन्दुमालायाश्च।।

अर्थ- ऐसे ही शरीर में एक ही जगह पर बहुत सारे बिंदुओं को बिंदुमाला कहते हैं।

श्लोक(15)- तस्यान्मालाद्वयमपि गलकक्षवंक्षणप्रदेशेषु।।

अर्थ- जांघों और माथे पर भी बिंदुमाला हो सकती है।

श्लोक(16)- मण्डलमिव विषमकूटकयुक्तं खण्डाभ्रकं स्तनपृष्ठ एव।।

अर्थ- दांतों से स्तनों पर बादल के टुकड़े की तरह निशान बनाने को खण्डाभ्रम कहते हैं।

श्लोक(17)- संहताः प्रदीर्घा बह्वयो दशनपदराजयस्ताम्रान्तराला वराहचर्वितकम्। स्तनपृष्ठ एव।।

अर्थ- स्तनों पर दांत गड़ाने की वजह से लाल रंग के बहुत सारे निशान बनने को वराहचर्वितक कहा जाता है।

श्लोक(18)- तदुभयमपि च चण्डवेगयोः। इति दशनच्छेद्यानि।।

अर्थ- खण्डाभ्रक और वराहचर्वितक दांतों से काटने की क्रियाओं को वही स्त्री और पुरुष कर सकते है जिनमें संभोग क्रिया के समय काम-उत्तेजना बहुत ज्यादा हो जाती है। यहां पर दांतों से काटने के भेद समाप्त होते हैं।

श्लोक(19)- विशेषका कर्णपूरे पुष्पापीडे ताम्बूलपलाशे तमालपत्रे चेति प्रयोज्यागामिषु नखदशनच्छेद्यादीन्याभियोगिकानि।।

अर्थ- स्त्री के लिए लिए जा रहे पान के बीड़े पर, तमालपत्र पर, कानों में पहनने वाले नीलकमल पर और श्रंगार के लिए माथे पर लगाने वाले भोजपत्र पर पुरुष को अपने दांतों तथा नाखूनों से निशान बनाकर अपने प्यार का इजहार करना चाहिए।

श्लोक(20)- देशासात्मयाच्च योषित उपचरेत्।।

अर्थ- देशोपचार-प्रकरण

          इसमें अलग-अलग देशों की स्त्रियों के नाखूनों और दांतों से काटने के रिवाज बताए जा रहे हैं।

श्लोक(21)-मध्यदेश्या आर्यप्रायाः शुच्युपचाराश्चचुम्बननखदन्तपदद्वेषिण्यः।।

अर्थ- विन्द्ययाचल और हिमाचल के मध्य प्रदेश की आर्य जाति की स्त्रियां पवित्र प्यार पर विश्वास करती हैं। वह संभोग क्रिया के समय ऩाखून गढ़ाना, दांतों से काटना या चुंबन आदि से घृणा करती हैं।

श्लोक(22)- बाह्लीकदेश्या आवन्तिकाश्च।।

अर्थ- बाह्लीक और अवंती देश की स्त्रियों को भी संभोग क्रिया के समय चुंबन आदि करना पसंद नहीं होता है।

श्लोक(23)- चित्ररतेषु त्वासामभिनिवेशः।।

अर्थ- लेकिन बाह्लीक और अवंती देश की स्त्रियों को चित्ररत में खास रुचि रहती है।

श्लोक(24)- परिष्वङग्चुंबननखदन्तचूषणप्रधानाः क्षतवर्जिताः प्रहणनसाध्या मालव्य आभीर्यश्च।।

अर्थ- मालवा और आभीर देश की स्त्रियों को आलिंगन, नाखूनों को गढ़ाना, दांतों से काटना, चुंबन और मुखमैथुन ज्यादा पसंद होता है। लेकिन इनके नाखूनों या दांतों से पुरुष के शरीर पर किसी तरह के जख्म नहीं होते हैं। संभोग क्रिया के समय पुरुष द्वारा प्रहार आदि करने पर भी इन्हें चरमसुख की प्राप्ति होती है।

श्लोक(25)- सिन्धुषष्ठानां च नदीनामन्तरालीया औपरिष्टकसात्म्याः।।

अर्थ- सिंधु नदी तथा सतलुज नदी के आसपास रहने वाली स्त्रियां मुख मैथुन करना ज्यादा पसंद करती हैं।

श्लोक(26)- चण्डवेगा मन्दसीत्कृता आपरान्तिका लाटयश्च।।

अर्थ- सूरत, भरौंच, अपरान्तक आदि के पास रहने वाली स्त्रियों में काम-उत्तेजना बहुत ज्यादा होती है और वह संभोग करते समय मुंह से हल्की-हल्की सी-सी की आवाजें निकाला करती हैं।

श्लोक(27)- दृढप्रहणनयोगिन्यः खरवेगा एव, अपद्रव्यप्रधानाः स्त्रीराज्ये कोशलायां च।।

अर्थ- जिन देशों में स्त्रियों की संख्या ज्यादा होती है या कौशल देश में स्त्रियों को अपनी काम-उत्तेजना को शांत करने के लिए ऐसे पुरूषों की जरूरत होती है जो संभोग कला में पूरी तरह से निपुण होते हैं। उनको शांत करने के लिए निमित्त क्रिया अर्थात उनकी योनि में पुरुष को अपने लिंग द्वारा तेज प्रहार करने पड़ते हैं। फिर भी जब स्त्री शांत नहीं होती तो उन्हें नकली लिंग का प्रयोग करना पड़ता है।

श्लोक(28)- प्रकृत्या मृद्या रतिप्रिया अशुचिरुचयो निराचाराश्चान्ध्रयः।।

अर्थ- आंध्र प्रदेश की स्त्रियां वैसे तो स्वभाव से नाजुक होती है लेकिन वह संभोग क्रिया को पसंद करने वाली, मन में अश्लील विचार रखने वाली, चरित्रहीन गुणी वाली होती है।

श्लोक(29)- सकलचतुःषष्टिप्रयोगरागिण्योऽश्लीलपरुषवाक्यप्रियाः शयने च सरभसोपक्रमा महाराष्ट्रिकाः।।

अर्थ- महाराष्ट्र देश की स्त्रियां संभोग की 64 कलाओं को पसंद करती है, वह गंदे और अश्लील और कड़वे बोल बोलती हैं और संभोग की शुरुआत बहुत ही जोश के साथ करती हैं।

श्लोक(30)- तथाविधा एव रहसि प्रकाशन्ते नागरिकाः।।

अर्थ- पाटलिपुत्र की स्त्रियां भी महाराष्ट्र की स्त्रियों की तरह ही होती हैं लेकिन वह 64 कलाओं का अभ्यास अकेले में ही करती हैं।

श्लोक(31)- मृद्यमानाश्चाभियोगान्मंद मंदं प्रसिञ्चन्ते द्रविडय।।

अर्थ- संभोग क्रिया की शुरूआत होने के बाद द्रविड़ देश की स्त्रियों में धीरे-धीरे रजस्राव होने लगता है।

श्लोक(32)- मध्यमवेगाः सर्वसहाः स्वाङग्प्रहासिन्यः कुत्सिताश्लीलपरुषपरिहारिण्यो वानवासिकाः।।

अर्थ- कोंकण देश की स्त्रियां संभोग क्रिया में बहुत ही शिथिल होती है। वह इस क्रिया में चुंबन, आलिंगन, नाखूनों को गढ़ाना, दांतों से काटना, आदि सभी कुछ करवा लेती है लेकिन वह अपने शरीर के अंगों को ढककर रखना पसंद करती है और दूसरों के अंगों की हंसी उड़ाती हैं। यह स्त्रियां दुष्ट, गुस्सैल, गंदे लोगों को नापसंद करती हैं।

श्लोक(33)- मृदुभाषिण्योऽनुरागवत्यो मृद्वयङग्यश्च गौडयः।।

अर्थ- पश्चिमी बंगाल की स्त्रियां कोमल अंगों वाली और अपने पति से प्यार करने वाली होती हैं।

श्लोक(34)- उपगृहनादिषु च रागवर्धनं पूर्वं पूर्वं विचित्रमुत्तरमुत्तरं च।।

अर्थ- आलिंगन, चुंबन, दांतों से काटना, नाखूनों को गढ़ाना, प्रहणन और सीत्कार में से हर एक के बाद एक काम-उत्तेजना बढ़ाने वाला होता है और पहले से ज्यादा अनोखा होता है।

श्लोक(35)- वार्यमाणश्च पुरुषो यत्कुर्यात्तदनु क्षतम्। अमृष्यमाणा द्विगुणं तदेव प्रतियोजयेत्।।

अर्थ- अगर पुरुष स्त्री के मना करने के बाद भी उसे नाखूनों से नोचता या दांतों से काटता है तो स्त्री को पुरुष के शरीर पर उससे ज्यादा तेज नोचना और काटना चाहिए।

श्लोक(36)- बिन्दोः प्रतिक्रिया माला मालायाश्चाभ्रखण्डकम्। इति क्रोधादिवाविष्टा कलहान्प्रयोजयेत्।।

अर्थ- बिंदु के बदले माला, माला के बदले अभ्रखण्डक का निशान सहभागी के शरीर पर दांतों से इस तरह बनाना चाहिए जैसे कि गुस्से में बनाया गया हो। इसके अलावा और भी कई प्रकार के प्रेमयुद्ध भी किये जा सकते हैं।

श्लोक(39)- सकचग्रहमुत्रम्य मुखं तस्य ततः पिबेत्। निलीयेत दशेच्चैव तत्र तत्र मदेरिता।।

अर्थ- स्त्री को एक हाथ से पुरुष के बाल पकड़कर और दूसरे हाथ से उसकी ठोढ़ी को पकड़कर उसके होंठों को चूसना चाहिए और इतने जोर से उसका आलिंगन करना चाहिए कि जैसे दोनों एक-दूसरे में समा रहे हो। इसके अलावा शरीर में बहुत से स्थानों पर दांतों से काटना भी चाहिए।

श्लोक(40)- विधानान्तमाह-

उन्नम्य कण्ठे कान्तस्य संश्रिता वक्षसाः स्थलीम्। मणिमालां प्रयुञ्ञीत यच्चान्यपि लक्षितम्।

अर्थ- इसके बाद पुरुष की छाती के ऊपर बैठकर एक हाथ से उसके मुंह को ऊपर उठाकर और दूसरे हाथ को उसके गले में डालकर उसकी गर्दन तथा उसके आसपास के भाग में अपने दांतों से मणिमाला के निशान बना दें।

श्लोक(41)- दिवापि जनसंबाधे नायकेन प्रदर्शितम्। उद्दिश्य स्वकृतं चिह्नं हसेदन्यैरपक्षिता।।

अर्थ- पुरुष अपने दोस्तों के साथ बैठे हुए जब उन्हें अपने शरीर पर अपनी पत्नी के द्वारा बनाए गए निशानों को दिखाता है तो उस समय स्त्री को दूसरी तरफ मुंह करके हंसना चाहिए।

श्लोक(42)- विकूणयन्तीव मुखं कुत्सयन्तीव नायकम्। स्वगात्रस्थानि चिह्नानि सासूयेव प्रदर्शयेत्त्।।

अर्थ- इसके बाद स्त्री को मुंह बनाते हुए और पुरुष को झिड़की देते हुए अपने शरीर पर पुरुष द्वारा बनाए गए निशानों को दिखाना चाहिए।

श्लोक(43)- परस्परानुकुल्येन तदेवं लज्जमानयोः। संवत्सरशतेनापि प्रीपिर्न परिहियते।।

अर्थ- एक-दूसरे के प्रति शर्म का और प्रेम का भाव रखते हुए स्त्री और पुरुष का प्रेम कई सौ सालों तक भी कम नहीं हो सकता।

जानकारी-

          आचार्य वात्स्यायन ने दंतक्षत (दांतों से काटना) और नखक्षत (नाखूनों से काटना) के संबंधी देशाचार का उल्लेख करते हुए मध्य देश, वाहिक, अवन्ती, सिंधु-सतलज का अंतराल, मालव, स्त्री-राज्य कौशल, अपरान्तक, महाराष्ट्र  नगर, आंध्र, द्रविड़, बन, लाट, गौड़, कोकण और आभीर देशों का वर्णन किया है।

          आचार्य वात्स्यायन के इस वर्णन के द्वारा सिर्फ भारत का मानचित्र ही प्रस्तुत नहीं होता बल्कि हर देश के लोगों की प्रवृत्तियों का भी परिचय मिलता है।

श्लोक- इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे साम्प्रयोगिके द्वितीयेऽधिकरणे दशनच्छेद्यविधयो देश्योश्चोपचाराः पञ्ञमोऽध्यायः।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय