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नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2

श्लोक (6)- अन्यतोऽपि बहुशो व्यवसित चारित्रा तस्यां वेश्यायामिव गमनमुत्तमवर्णिन्यामपि न धर्मपीड़ां करिष्यति पुनर्भुरियम्।।

अर्थ- आचार्य स्वैरिणी पराई स्त्री से संबंध बनाने के औचित्य को बताते हैं-

बहुत से लोगों द्वारा उनके चरित्र को पहले से ही खराब किया जा चुका है इसीलिए अगर वह अच्छी जाति की भी हो तब भी उसके साथ संभोग क्रिया करना वेश्या के अभिगमन की तरह धर्म के विरुद्ध नहीं होगा।

श्लोक (7)- अन्यपूर्वावरुद्धा नात्र शगंस्ति।।

अर्थ- वह स्त्री पहले ही दूसरे पुरूषों के साथ नाजायज संबंध बनाती है इसलिए उससे संबंध बनाने में किसी तरह की शंका नहीं करनी चाहिए।

श्लोक (8)- पति वा महान्तीमीश्चरमस्मदमित्रसंसृष्टमियमवगृह्म प्रभुत्वेन चरति। सा मया संसृष्टा स्नेहादेनं व्यावर्तीयिष्यति।।

अर्थ- यदि उस स्त्री का पति नामी-गिरामी हस्तियों में आता है और मेरे दुश्मन से उसका संबंध है तो उस स्त्री से मेरा संबंध हो जाने पर वह मेरे मोह में पड़कर अपने पति का मेरे दुश्मन से संबंध तुड़वा देगी।

श्लोक (9)- विरसं वा मयि शक्तमपकर्तुकामं च प्रकृतिमापादयिष्यति।।

अर्थ- इसका अर्थ यह है कि मेरे पुराने दोस्त जो कि किसी कारण से मेरे दुश्मन बन गए हो और मुझे नुकसान पहुंचा रहे हो तो वह स्त्री उससे मेरी दुबारा से दोस्ती करा देगी और यदि दोस्त न भी बना पाई तो उसके द्वारा मुझे किसी प्रकार की हानि भी नहीं होने देगी।

श्लोक (10)- तया वा मित्रीकृतेन मित्रकार्यममित्रप्रतीघातमन्यद्वा दुष्प्रतिपादकं कार्य साधयिष्यामि।।

अर्थ- अर्थात उससे संबंध बन जाने पर उसके द्वारा दोस्ती या दुश्मनी के कामों को या किसी भी मुश्किल काम को मैं पूरा कर लूंगा।

श्लोक (11)- संसृष्टो वानया हत्वास्याः पतिमस्मद्धाव्यं तदैश्चर्यमेवमधिगमिष्यामि।।

अर्थ- नहीं तो उस स्त्री से मेरे संबंध बन जाने पर उसके पति को मारकर उसके द्वारा छीनी गई मेरी सम्पत्ति को मैं हासिल कर लूंगा।

श्लोक (12)- निरत्ययं वास्या गमनमर्थानुबद्धम्। अहं च निःसारत्वात्क्षीणवृत्त्युपायः। सोऽहमनेनोपायेन तद्धनमतिमहदकृच्छ्रादधिगमिष्यामि।।

अर्थ- धन के लालच में पराई स्त्री के साथ शारीरिक संबंध बनाना कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि मैं गरीब हूं, मेरे पास कमाई का कोई साधन नहीं है। इसलिए मैं इस उपाय से उस स्त्री के धन को बहुत ही आसानी से हासिल कर लूंगा।

श्लोक (13)- मर्मज्ञा वा मयि ढृढमभिकामा सा मामनिच्छन्तं दोषविख्यापनेन दूषियिष्यति।।

अर्थ- या वह मुझ पर पूरी तरह से मोहित है, मेरे राजों को जानती है, अगर मैं उससे सही तरह से बात न करूं तो वह मेरी बुराईयों को सबको बताकर मुझ बदनाम कर सकती है इसलिए मेरे लिए यह ही सही है कि मै उसके साथ संबंध बना लूं।

श्लोक (14)- असद्धूतं वा दोषं श्रद्धेयं दुष्परिहारं मयि क्षेप्सयति येन में विनाशः स्यात्।।

अर्थ- या मुझसे खफा होकर वह मुझ पर कोई ऐसा संगीन आरोप लगा दें कि मुझे उससे बचना मुश्किल ही हो जाए तब तो मेरा सर्वनाश ही हो जाएगा। इसलिए उसके साथ संबंध बनाना ही मेरे लिए सही है।

श्लोक (15)- आयतिमन्तं वा वश्यं पतिं मत्तो विभिद्य द्विषतः संग्राहयिष्यति।।

अर्थ- या वह अपने प्रभावशाली पति को मेरे खिलाफ भड़काकर मेरे दुश्मनों के साथ मिला देगी। इसलिए उसके साथ संबंध बनाना ही सही है।

श्लोक (16)- स्वयं वा तैः सह संसृज्येत। मदवरोधानां वा दूषियाता पतिरस्यास्तदस्याहमपि दारानेव दूषयन्तप्रतिकरिष्यामि।।

अर्थ- या तो वह स्वयं ही मेरे दुश्मनों के साथ मिल जाए या उसका पति मेरी पत्नी को यह सोचकर फंसाना चाहे कि इसने मेरी पत्नी के साथ गलत संबंध बनाए हैं तो मैं भी इसकी पत्नी के साथ ऐसा ही करूंगा। इसलिए इसके साथ संबंध बनाना ही उचित है।

श्लोक (17)- यामन्यां कामयिष्ये सास्या वशगा। तामनेन संक्रमेणाधिगमिष्यामि।।

अर्थ- या जिस दूसरी स्त्री को मैं चाहता हूं वह उसके वश में हूं और इसकी वजह से मै उसे हासिल कर लूंगा।

श्लोक (18)- कन्यामलभ्यां वात्माधीनामर्थरूपवतीं मयि संक्रामयिष्यति।।

अर्थ- या फिर जिस धनवान, खूबसूरत युवती से मैं शादी करना चाहता हूं वह मुझे बिना इसकी सहायता के नहीं मिल सकती।

श्लोक (19)- इति साहसिक्यं न केवलं रागादेव। इति परपरिग्रहगमनकारणानि।।

अर्थ- किसी खास कारण के बिना सिर्फ स्त्री के शरीर को पाने के लिए इतने ज्यादा खतरे उठाना बिल्कुल ठीक नहीं है। यहां पर पराई स्त्री के साथ संबंध बनाने का अध्याय समाप्त होता है।

श्लोक (20)- एतैरेव कारणैर्महामात्रसंबद्धा राजसंबंद्धा वा तत्रैकदेशचारिणी काचिदन्या वा कार्यसंपादिनी विधवा पञ्ञमीति चारायणः।।

अर्थ- आचार्य चारायण के अनुसार कन्या, पुनर्भु, वेश्या और पराई स्त्री के अलावा विधवा पांचवीं नायिका है जो राजा, मंत्री और उनके घरवालों के संबंध बना लें या दूसरी कोई ऐसी विधवा स्त्री है जो सफलतापूर्वक अपने सारे कार्यों को कर सके।

श्लोक (21)- सैव प्रव्रजिता षष्ठीति सुवर्णनाभः।।

अर्थ- आचार्य सुवर्णनाभ के मुताबिक परिवाजिका विधवा छठे प्रकार की नायिका होती है।

श्लोक (22)- गणिकाया दुहिता परिचारिका वानन्यपूर्वा सप्तमीति घोयकमुखः

अर्थ- आचार्य घोटकमुख दासी को सातवें प्रकार की स्त्री बताते हैं।

श्लोक (23)- उत्क्रान्तबालभवा कुलयुवतिरुपचारान्यत्वादष्टमीति गोनर्दीयः।।

अर्थ- आचार्य गोनर्दीय के मुताबिक जो युवती बचपन को पार करके जवानी में पहुंचती है और जिसे पाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है वह आठवें प्रकार की नायिका होती है।

श्लोक (23)- कार्यान्तराभावादेतासामपि पूर्वास्वेवोपलक्षणम्, तस्माच्चतस्त्र एव नायिका इति वात्स्यायनः।।

अर्थ- चारायण से लेकर गोनर्दीय तक जिन आचार्यों नें 4 तरह की नायिकाओं के बारे में बताया है वह सब कन्या, पुनर्भू, वेश्या तथा पराई स्त्री के अन्तर्गत समाहित है उनके अलग नहीं है। इसलिए सिर्फ 4 प्रकार की नायिकाएं है।

          आचार्य वात्स्यायन ने गोणिकापुत्र के दिए हुए मत को स्वीकार करके बाकी दूसरे आचार्यों को बहुत ही चतुराई से गलत साबित कर दिया है।

श्लोक (24)- भिन्नत्वात्तृतीया प्रकृतिः पञ्ञमीत्येके।।

अर्थ- आचार्यों के अनुसार पुरुष तथा स्त्री से अलग तीसरे प्रकृति अर्थात (किन्नर) पांचवीं नायिका है।

          इस तीसरी प्रकृति (किन्नर) को पोटा, क्लीव, नपुंसक, वर्षधर, षण्व, उभय-व्यंजन आदि के नामों से भी जाना जाता है। वैसे नपुंसक और हिजड़ों में काफी फर्क होता है।

          लिंग में पूरी उत्तेजना न होने और वीर्य के पर्याप्त मात्रा में न होने के कारण जो पुरुष स्त्री के साथ संभोग करने में असमर्थ रहता है उसे नपुंसक कहा जाता है। कुछ पुरुष जन्म से ही नपुंसक होते है और कुछ अपनी जवानी की गलतियों के कारण हो जाते हैं। नपुंसक को क्लीव भी कहा जाता है।

श्लोक (25)- एक एव तु सार्वलौकिको नायकः। प्रच्छन्नस्तु द्वितीयः। विशेषालाभात्। उत्तमाधममध्यमतां तु गुणागुणतो विद्यात्। तांस्तुभयोरपि गुणागुणान्वैशिकै वक्ष्यामः।।

अर्थ- इसमें नायिकाओं के लक्षण बताने के बाद पुरुष के लक्षण बताए गए है-

स्त्री के जीवन में सबसे बढ़कर जो पुरुष होता है वह उसके पति के रूप में ही होता है। इसके अलावा दूसरा पुरुष उसे कहा जाता है जो सिर्फ शारीरिक सुख के लिए उसके साथ संबंध बनाता है। इनमें से गुण तथा दोषों के ज्यादा या कम होने के अनुसार सबसे अच्छे, मध्यम और नीच पुरुष कहलाते हैं।

श्लोक (26)- अगम्यास्तवेवैताः- कुष्ठन्युन्मत्ता पतिता भिन्नरहस्या प्रकाशप्रार्थिनी गतप्राययौर्वनातिश्वेतातिकृष्णा दुर्गन्धा संबन्धिनी सखी प्रव्रजिता संबंन्धिसखिश्रोत्रियराजदाराश्च।।

अर्थ- इसके अंतर्गत 13 तरह की अगम्या स्त्रियों (जिन स्त्रियों के साथ संभोग नहीं किया जा सकता) के बारे में बताया गया है यह स्त्रियां है- पागल, कोढ़िन, बेशर्म, ज्यादा उम्र की, शरीर से बदबू आने वाली, किसी तरह के रिश्ते में लगती हो, ज्यादा सफेद रंग की या ज्यादा काली रंग की, बचपन की सहेली, जो किसी राज को न छुपा पाती हो, सन्यासिनी।

श्लोक (27)- दृष्टपञ्ञपुरुषा नागम्या काचिदस्तीति बाभ्रवीयाः।।

अर्थ- बाभ्रवीय आचार्यों के मुताबिक अगर कोई स्त्री 5 पुरूषों के साथ संबंध बनाती है तो वह अगम्या स्त्री नहीं है।

श्लोक (28)- संबंधिसखिश्रोत्रियराजदारवर्जमिति गोणिकापुत्रः।।

अर्थ- बाभ्रवीय आचार्य के मत में आचार्य गोणिकापुत्र ने अपना एक मत और जोड़कर उसका समर्थन करते हैं- 5 पुरूषों के साथ संबंध बनाने के बाद भी रिश्तेदार, मित्र, ब्राह्मण और राजा की स्त्री अगम्य है।

          आचार्य वात्स्यायन ने जिस तरह की 13 स्त्रियों के नाम बताए हैं वह धार्मिक, सामाजिक, शारीरिक और मानसिक दृष्टि से सबसे ज्यादा निषिद्ध है। शरीर विज्ञान तथा वंशानुक्रम-विज्ञान से अगर देखा जाए तो पागल, कोढ़िन, शरीर से बदबू आने वाली, ज्यादा काली युवती या ज्यादा गोरी लड़की से संभोग करना भयंकर तथा वंश परंपरागत विकारों को जानबूझकर बुलावा देना है। ज्यादा उम्र की स्त्री के साथ संभोग करना दिल और दिमाग तथा शरीर को नुकसान पहुंचाना ही होता है।

          इसके साथ बड़ी कोशिश से रक्षा करने लायक, वीर्य का नाश करने के समान ही है। अगर धार्मिक दृष्टि से देखा जाए तो अपने कुल या गौत्र की स्त्री, दोस्त की पत्नी, राजा की पत्नी तथा सन्यासिनी के साथ संभोग करना जानवर पंती समझी जाती है अर्थात जो पुरुष ऐसा करता है वह मनुष्य न कहलाकर जानवर कहलाने के लायक ही है।

श्लोक (29)- सहपांसुक्रीडितमुपकारसंबंद्धं समानशीलव्यसनं सहाध्यायिनं यश्चास्य मर्माणि रहस्यानि य विद्यात्, यस्य चायं विद्याद्वा धात्रपत्यं सहसंवृद्ध मित्रम्।।

अर्थ- इसमें यह बताया गया है कि कैसे लोगों को अपना प्रिय मित्र बनाना चाहिए जैसे बचपन में जिनके साथ पूरे दिन खेलते हों, जिस पर किसी तरह का एहसान किया हो, स्वभाव या गुण आदि में जो बिल्कुल अपनी ही तरह हो, जिससे किसी तरह के राज को ना छुपाया गया हो और जो एक ही मां की गोद में खेलकर पले-बढ़े हों।

श्लोक (30)- पितृपैतामहमविसंवादकमद्दष्टवैकृतं वश्यं ध्रुवमलोभशीलमपरिहार्यममन्त्रविस्त्रावीति मित्रन्संपत्।।

अर्थ- जिससे खानदानी प्यार-दुलार चला रहा हो, जिन लोगों से लड़ाई-झगड़ा न होता हो, जो स्वभाव से चंचल न हो, लालची न हो, किसी के बहकावे में न आए और किसी के द्वारा बताई गई बातों को दूसरों के सामने न खोले। इस प्रकार के लोगों के साथ दोस्ती रखनी चाहिए।

श्लोक (31)- राजकनापितमालाकारगान्धिकसौरिकभिक्षुकगोपाल कताम्बूलिकसौवर्णिकपीठमर्दविटविदूषकादयो मित्राणि। तद्योषिन्मित्राश्च नागरकाः स्युरिति वात्स्यायनः।।

अर्थ- इनके अलावा कुछ कारोबार से संबंध रखने वाले लोग भी नायक के दोस्तों में शामिल हो सकते हैं जैसे धोबी, नाई, माली, भिखारी, दूध वाला, तमोली, सुनार आदि। आचार्य वात्स्यायन के मुताबिक धोबी, नाई, माली आदि की पत्नियों को भी दोस्त बनाया जा सकता है क्योंकि यह पुरूषों से ज्यादा नायक की ज्यादा मदद कर सकती है। क्योंकि इनका संबंध महल में रहने वाली रानियों से होता है और यह किसी भी समय उनके महल में आ जा सकती है।

श्लोक (32)- यादुभयोः साधारणमुभयत्रोदारं विशेषतो नायिकायाः सुविस्त्रब्धं तत्र दूतकर्म।।

अर्थ- जो लोग स्त्री और पुरुष दोनों के लिए ही मन में अच्छी भावना रखते हो खास करके स्त्री का ज्यादा विश्वास पात्र हो वह दूतकार्य के लिए बिल्कुल ठीक रहता है।

श्लोक (33)- पटुता धष्टार्यमिगिंताकारज्ञता प्रतारणकालज्ञता विषह्यबुद्धित्वं लध्वी प्रतिपत्तिः सोपाया चेति दूतगाणाः।।

अर्थ- बातचीत में चतुराई, ढीटपना, इशारों को समझना, नायिका को किस समय बहकाया जा सकता है, इसका काल ज्ञान, संकट अथवा शक महसूस होने पर जल्द ही फैसला लेने वाली आदि दूत के गुणों में शुमार होते हैं।

श्लोक (34)- भवति चात्र श्लोकः-

भवति चात्र श्लोकः-

आत्मवान्मित्रवान्युक्तो भावज्ञो देशकालवित्। अलभ्यामप्ययत्नेन स्त्रियं संसाधयेन्नरः।।

अर्थ- इस विषय के बारें में एक पुराना श्लोक है-

          जो पुरुष आत्मनिर्भर तथा दोस्त बनाने वाले गुणों से संपन्न होता है, जो वृत्त में निपुण होता है, स्त्रियों के मन के भावों को परखने वाला होता है, स्थान और समय के महत्व को समझता है, वही अलभ्य स्त्री को भी बहुत आसानी से पा लेता है।

          इस अध्याय का नाम दूतीकर्म विशेष है लेकिन दूतीकर्म से ज्यादा इसमे दूतकर्म का ही ज्यादा इस्तेमाल किया गया है। नायिका को नायक से मिलाने में दूती जितनी ज्यादा मदद कर सकती है उतनी दूत नहीं कर सकता। आचार्य वात्स्यायन ने वैसे तो दूसरे काम-शास्त्र के आचार्यों की राय को सही बताते हुए दूतकर्म का कार्य करने वाले पुरूषों की पत्नियों को भी दूतीकार्य में सहयोग करने की राय दी है, लेकिन वह सारी बातें समीचीन इसलिए नहीं जान पड़ती कि जितने प्रकार के दूत बताए गए हैं उन सभी की पत्नियां दूतीकार्य के लिए सही नहीं रहती। पुराने इतिहास में स्त्री और पुरुष के बारे में प्रेम के बारे में पढ़ने पर ज्ञात होता है कि स्त्री और पुरुष के बीज क्लेश पैदा कराने वाले कार्यों में स्त्रियां ही ज्यादा सफल साबित हुई है पुरुष दूत नहीं।

          इस अध्याय को जो नाम दिया गया है उसके अनुसार इस विषय का विवेचन न के बराबर हुआ है। विषयांतर का समावेश समीक्षक दिमाग में उलझने पैदा करता है। इस अध्याय में दूतीकार्य को छुआ तक नहीं गया है बल्कि इसके मुकाबले दूसरे ग्रंथों में इस विषय के बारें में पूरी जानकारी मिलती है।

          आचार्य वात्स्यायन ने एक पुराने श्लोक को उदाहरण के रूप में बताते हुए कहा है कि जिस पुरुष के पास आत्मबल और बहुत सारे भरोसेमंद मित्र होते हैं और वह नागरकवृत्ति में निपुण तथा मन के भावों को समझने वाला होता है। वह अनायास, अलभ्य स्त्रियों को हासिल कर सकता है।

          इस अध्याय के अंतर्गत नायक पुरुष के जो गुण और विशेषताएं बताई गई है वह सिर्फ अलम्भ स्त्रियों को हासिल करने में ही कामयाबी नहीं दिलाती बल्कि जीवन के हर क्षेत्र और काम-काज में पूरी तरह से कामयाब बनाती है।

          जो पुरुष कायर नहीं होता उसी को आत्मवान कह सकते हैं। जिसका दिल साफ होता है वही सच्चा मित्र बन सकता है। मन के भावों को समझने वाला वही व्यक्ति हो सकता है जिसके अंदर समीक्षात्मक दिमाग तथा मनौवैज्ञानिक नजरिया हो और व्यवहारकुशल व्यक्ति ही देशकालवित हो सकता है।

          इस श्लोक से यही पता चलता है कि काम-शास्त्र का ज्ञाता पुरुष छिछोरा, लफंगा और मनचला नहीं होता बल्कि कुलीन, समझदार, लोकप्रिय, स्वाभिमानी, आत्मनिष्ठ और कलाकुशल होता है।

श्लोक- इति श्री वात्सयायनीये कामसूत्रे साधारणे प्रथमेऽधिकलणे पंचमोऽध्यायः प्रथम अधिकरण (साधारण) समाप्त।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय