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नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1

श्लोक (1)- कामश्चतुर्षु वर्णेषु सवर्णतः शास्त्रतश्चानन्यपूर्वायां प्रयुज्यमानः पुत्रीयो यशस्यो लौकिकश्च भवति।।

अर्थ- इसके अंतर्गत पुरुष तथा स्त्री के दास और दासियों के करने वाले कार्यों को बताया गया है। इसमें सबसे पहले अपनी जाति की स्त्री से रीति-रिवाज के अनुसार विवाह की जरूरत पर रोशनी डाली जाएगी।

          क्षत्रिय, ब्राह्मण, शुद्र और वैश्य वर्ग के अनुसार अपनी ही जाति की स्त्री से विवाह करना चाहिए। इससे उनकी जो संतान पैदा होती है वह संसार में उनका नाम रोशन करती है।  

          आचार्य वात्स्यायन के अनुसार इस बात के दो अर्थ निकलते हैं- पहला- अपनी ही जाति की स्त्री से विवाह करना और दूसरा संतान को पैदा करके लोकधर्म को निभाना।

          इसलिए भारतीय जाति व्यवस्था में विवाह पद्धति पर बहुत ही नियंत्रण रखा जाता है। बच्चे के जन्म लेने के बाद के अधिकारों को विकसित और परिपक्व बनाने के लिए पूरी शिक्षा-दीक्षा तथा अच्छे माहौल की जरूरत पड़ती है। लेकिन अगर जन्म से ही उन गुणों को पाने की कोशिश नही की जाती तो खानदानी परंपरा का और परिवार के माहौल का असर बच्चे पर ज्यादा नहीं पड़ता।

          आचार्य वात्स्यायन की कही बातें यहां पर बिल्कुल ठीक प्रतीत होती है। अगर अपनी पत्नी से संभोग करके संतान पैदा की जाए तो यह संसार की मर्यादा के अंतर्गत आता है।

श्लोक (2)- तद्विपरीत उत्तमवर्णासु परपरिगृहीतासु च। प्रतिषिद्धोऽवरवर्णास्वनिरवसितासु। वेश्यासु पुनर्भूषु च न शिष्टो न प्रतिषिद्धः। सुखार्थत्वात्।।

अर्थ- इसमें विवाह के समय क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए इस बात को बताया गया है-

          अपनी से ऊंची जाति या पराई स्त्री से संभोग की इच्छा शास्त्रों के अनुकूल नहीं है। इसी तरह से अपने से नीची जाति की स्त्रियों सें संभोग की इच्छा रखना गलत है। परंतु वेश्याओं तथा पुनर्भु स्त्रियों से संभोग करना सहीं है क्योंकि उनके साथ जो संभोग क्रिया की जाती है वह सिर्फ शरीर की आग को शांत करने के लिए होती है न कि संतान आदि पैदा करने के लिए।

         आचार्य वात्स्यायन अपनी ही जाति में विवाह करने का ही समर्थन करते हैं क्योंकि वह दोगली जाति पैदा करने को गलत ठहराते हैं। आज के समय में आधुनिक विज्ञान भी इस बात को मानने लगा है कि दो अलग-अलग जातियों के जीवों के आपस में मिलने से एक तीसरे प्रकार के जीव की उत्पत्ति होती है।

श्लोक (3)- तत्र नायिकास्तिस्त्रः कन्या पुनर्भूर्वेश्या च इति।।

अर्थ- 3 प्रकार की स्त्रियां होती है कन्या, पुनर्भु और वेश्या।

          आचार्य वात्स्यायन के मुताबिक इन तीनों प्रकार की स्त्रियों से पुरुष को प्रेम संबंध जोड़ने चाहिए। पहली स्त्री अर्थात कन्या को सबसे अच्छा माना जाता है। पुनर्भु स्त्री को उससे नीचा और वेश्या स्त्री को सबसे नीचा माना गया है। अब सवाल यह उठता है कि आचार्य वात्स्यायन नें पुनर्भु और वेश्या को कन्या से नीचा क्यों बताया है। जिस लड़की की शादी नहीं होती उसे कन्या कहा जाता है। जो लड़की शादी से पहले किसी पुरुष के साथ संभोग करती है तो उसे पुनर्भु तथा कई पुरूषों के साथ संबंध बनाने वाली स्त्री को वेश्या कहा जाता है।

          इससे एक बात पूरी जाहिर हो जाती है कि आचार्य वात्स्यायन के समय में भी कुंवारी युवतियों को भी अपनी पसंद के युवक से विवाह करने की पूरी छूट थी। हर युवक अपनी खूबियों के बल पर युवती को पाने की इच्छा रखता था। आचार्य वात्स्यायन के मुताबिक विवाह में बंधने से पहले युवक तथा युवती को आपसी प्रेम संबंध द्वारा एक-दूसरे से परिचित हो जाना चाहिए।

          जिस युवक में सारे गुण होते हैं ऐसे युवक के लिए कन्या स्त्री उससे नीचे युवक के लिए पुनर्भु तथा सबसे नीचे युवक के लिए वेश्या स्त्री को चुनने का मकसद सही होता है। सबसे पहले आपस में प्रेम बढ़ाना, फिर एक-दूसरे पर भरोसा रखना और फिर विवाह करना आचार्य वात्स्यायन के मुताबिक सही है।

          आचार्य वात्स्यायन ने इसमें युवक की पात्रता के अनुकूल वेश्या नायिका का विधान बनाया है। इसका मतलब यह है कि बुरे युवक के लिए बुरी युवती। इतिहास में वेश्य़ाओं की स्थिति और वह कितनी पुरासे समय से चली आ रही है यह बताया गया है। सभी पुराने ग्रंथों में वेश्याओं के बारे में लिखा हुआ मिलता है। इसी के साथ ही वेश्याओं के संबंध में अलग ग्रंथ भी बने हुए हैं।

          वेश्याओं को पुराने समय में समाज का एक जरूरी अंग माना जाता था। पहले के समय में वेश्याओं को इस प्रकार की शिक्षा दी जाती थी कि शारीरिक और मानसिक विकास कैसे होता है। लेकिन दूसरी स्त्रियों को इस प्रकार की शिक्षा से दूर रखा जाता था। पुराने समय से ही वेश्याएं हर चीज में निपुण होती थी। यहीं नहीं ऊंची जाति की स्त्रियां भी इनकी शिक्षा-दीक्षा से लाभ उठाया करती थी।

आचार्यों नें कामसूत्र के अलावा दूसरे ग्रंथों में भी कई प्रकार की स्त्रियों के लक्षण बताए हैं-

1- चित्रिणी               

2- परकीया

3- सामान्या              

4- स्वकीया

5- पदमिनी              

6- हस्तिनी

7- शंखिनी               

8- मुग्धा

9- ज्ञातयौवना            

10- मध्यमा

11- प्रौढ़ा                 

12- आरूढ़ यौवना मुग्धा

13- नवलअनंग           

14- लज्जाप्रिया मुग्धा

15- लुब्धपत्ति प्रौढ़ा        

16- प्रगल्भव चना मध्या

17- आक्रमिता प्रौढ़ा        

18- सुरतविचित्रा मध्या

19- विचित्र-विभ्रमा प्रौढ़ा    

20-  समस्तरत कोवि प्रौढ़ा

21- कलहातरिता          

22- धीरा

23- उत्कण्ठिता           

24- धीरा-धीरा

25- स्वाधीन पतिका       

26- प्रादुर्भतमनोभवा मध्या

27- सम्सयाबन्धु          

28- खंडिता

29- स्वयंदूतिका          

30- प्रोषितापतिका

31- कुलटा               

32- लक्षिता

33- लघुमानवती          

34- मुदिता

35- अयुशयना           

36- मध्य मानवती

37- अनूढ़ा               

38- गुरू मानवती

39- रूपग्रर्विता            

40- ग्रर्विता

41- अन्य संभोग दुःखिनी   

41- कुलटा

42- कनिष्ठा              

43- अदिव्या

44- वचनविदग्धा         

45- क्रियाविदिग्धा

46- दिव्या               

46- दिव्या दिव्या

47- कामगर्विता          

48- मध्यमा

49- उत्तमा               

50- प्रेमगर्विता

51- रूपगर्विता  

श्लोक (4)- अन्यकारणवशात्परपरिगृहीतापि पाक्षिकी चतुर्थीति गोणिकापुत्रः।।

अर्थ- इसके अंतर्गत बहुत से आचार्यों द्वारा बताई गई स्त्रियों का उल्लेख किया जाता है।

बहुत से कारणों से पराई स्त्री को भी चौथी स्त्री बनाया जा सकता है।

श्लोक (5)- य यदा मन्यते स्वैरिणीयम्।।

अर्थ- जिन कारणों से पराई स्त्रियों को नायिका बनाया जा सकता है वह निम्नलिखित है-

पुरुष जब इस बात को समझ ले कि पराई स्त्री पतिव्रता नहीं होती है।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय