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शास्त्र संग्रह 2

श्लोक (10)- तस्यं षष्ठं वैशिकमधिकरणं पाटलिपुत्रिकाणां गणिकानां नियोगाद् दत्तक पृथक चकार।।

अर्थ- आचार्य दत्तक ने बाभ्राव्य द्वारा संक्षिप्त किए गए कामसूत्र के छठे भाग वैशिक नामक अधिकरण को अलग कर दिया। उन्होने यह सब पाटलिपुत्र की गणिकाओं द्वारा अनुरोध करने पर ही किया था।

श्लोक (11)- तत्प्रसगांत् चारायणः साधारणमधिकरणं पृथक् प्रोवाच। सुवर्णनाभः साम्प्रयोगिकम्। घोटकमुखः कन्यासम्प्रयुक्तकम्। गोनर्दीयो भार्याधिकारिकम्। गोणिकापुत्रः पारदारिकम्। कुचुमार औपनिषदिकमिति।।

अर्थ- आचार्य चारायण ने इसी प्रसंग से साधारण नाम के अधिकरण का पृथक प्रवचन किया। साम्प्रयोगिक नाम के अधिकरण को आचार्य सुवर्णनाभ ने अलग किया। कन्यासम्प्रयुक्तक नाम के अधिकरण को आचार्य घोटकमुख ने अलग किया। आचार्य गोनर्दीय ने भार्याधिकारिक नाम के अधिकरण को अलग किया। पारदारिक नाम के अधिकरण को गोणिकापुत्र ने कामसूत्र से अलग किया और औपनिषदिक नाम के अधिकरण को आचार्य कुचुमार ने अलग किया।

श्लोक (12)- तत्र दत्तकादिभिः प्रणीतानां शास्त्रावयवानामेकदेशत्वात् महदिति च बाभ्रवीयस्य दुरध्येयत्वात् संक्षिप्य सर्वमर्थमल्पेन ग्रंथेन कामसूत्रमिदं प्रणीतम्।

अर्थ- दत्तक आदि आचार्यों ने विभिन्न प्रकार के अधिकरणों को लेकर अपने-अपने ग्रंथों की रचना की। इस प्रकार ये खंड समग्र शास्त्र के ही भाग माने जाते हैं और आचार्य बाभ्रव्य का मूल ग्रंथ विशाल होने की वजह से साधारण मनुष्यों के लिए दुरध्येय है। इसलिए उस महान ग्रंथ को वात्स्यायन ने संक्षिप्त करके थोड़े ही में सारे विषयों से संपन्न कामसूत्र की रचना की।

           मानव जाति की तरक्की और उसकी परंपरा को बनाए रखऩे के लिए ब्रह्मा ने काम, अर्थ और धर्म तीनों पुरुषार्थों को प्राप्त करने के लिए 100 अध्यायों में उपदेश दिए हैं। उस प्रवचन में से धर्माधिकारिक भागों को लेकर मनु ने मनुस्मृति की रचना की। बृहस्पति ने अर्थपूरक विषयों को लेकर अर्थशास्त्र की स्वतंत्र रचना की। फिर उसी प्रवचन में से काम के विषय के भागों को लेकर नन्दी ने एक सहस्त्र अध्यायों में कामसूत्र की रचना की।

           ब्रह्मा से लेकर नन्दी तक की परंपरा को देखकर यह पता चलता है कि कामसूत्र ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना करने से पहले भी था। सृष्टि की रचना के बाद उन्नति और मानवी परंपरा को बनाए रखने के लिए ब्रह्मा ने कामसूत्र का भी उपदेश दिया जो धर्म और अर्थ से संबंधित था। उस विशाल प्रवचन के आधार पर ही नन्दी ने सहस्त्र अध्यायों के एक स्वतंत्र कामशास्त्र की रचना की अर्था कामसूत्र के प्रवर्तक नन्दी है।

           आचार्य वात्स्यायन ने कामसूत्र ग्रंथ की शुरुआत में ही दावा किया था कि इसमें सभी प्रयोजनों का सम्यक समावेश किया गया है।

श्लोक (13)- तस्यायं प्रकरणधिकरणसमुद्देशः।।

अर्थ- कामसूत्र के प्रकरण, अधिकरण और समाद्वेश की सूची इस प्रकार है- अधिकार पूर्वक विषय जहां शुरु होगा उसे प्रकरण करते हैं जिसके प्रकरण होते हैं उसे अधिकरण कहते हैं तथा संक्षिप्त कथन को समुदद्वेश कहते हैं।

श्लोक (14)- शास्त्रसंग्रहः। त्रिवर्गप्रतिपत्तिः। विद्यासमुद्देशः। नागरकवृत्तम्। नायकसहाय-दूतीकर्मविमर्शः। इति साधारणं प्रथमाधिकरणम् अध्यायाः पञ्ञ। प्रकरणानि पञ्ञ।।

अर्थ- कामसूत्र का अनुबंधन अधिकरण अध्याय और प्रकरण के रूप में किया गया है। पहले अधिकरण का नाम साधारण इस कारण से रखा गया है कि इस अधिकरण में ग्रंथातर्गत- सामान्य विषयों का परिचय है, किसी सिद्धान्त की व्याख्या अथवा तात्विक विवेचन नहीं किया गया है।

           पहला प्रकरण, पहला अध्याय- शास्त्र-संग्रह। यहां पर शास्त्र-संग्रह का अर्थ है इस शास्त्र की सूची। ग्रंथ लिखने से पहले लेखक एक विषय सूची तैयार करता है और उसी सूची के द्वारा ग्रंथ की रचना करता है। इसी प्रकार आचार्य वात्स्यायन ने अपने ग्रंथ की विषय सूची का नाम शास्त्र संग्रह रखा है अर्थात वह संग्रह जिससे यह ग्रंथ शासित हुआ है।

           दूसरा प्रकरण, दूसरा अध्याय- त्रिवर्ग प्रतिपात्ति। काम, धर्म और अर्थ यह 3 त्रिवर्ग कहलाए जाते हैं। त्रिवर्ग की प्राप्ति का नाम प्रतिपात्ति है। इस अध्याय और प्रकरण में यह भी बताया गया है कि धर्म, अर्थ और काम को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।

           तीसरा प्रकरण, तीसरा अध्याय- विद्यासमुद्देश। यहां पर सारी विद्याओं की नाम की सूची को विद्या समुद्देश का नाम दिया गया है। इस अध्याय का मुख्य मकसद है कि मानव को स्मृति, श्रुति, अर्थ विद्या और उसकी अंगभूत विद्या दंडनीति के अध्ययन के साथ कामसूत्र का अध्ययन जरूर करना चाहिए। यहां पर विद्याओं की नाम-सूची का अर्थ संभोग की 64 कलाओं से हैं।

           चौथा प्राकरण चौथा अध्याय- नागरकवृत। नागरक से काम सूत्रकार का अर्थ विदग्ध अथवा रसिक व्यक्ति से होता है और वृत्त का अर्थ आचरण नहीं बल्कि दिनचर्या समझना चाहिए।

           कामसूत्र के मुताबिक मनुष्य का सबसे पहले विद्या पढ़नी चाहिए, फिर अर्थोपार्जन करना चाहिए और इसके बाद विवाह करके गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके नागरक वृत्त का आचरण करना चाहिए। कोई भी मनुष्य जब तक कामकलाओं की शिक्षा प्राप्त नहीं कर लेता है तब तक उसको विवाह करने का कोई हक नहीं है। गृहस्थ जीवन को सही तरीके से चलाने के लिए अर्थ संग्रह जरूरी है। सुशिक्षित, धन-संपन्न मनुष्य ही अपने वैवाहिक जीवन को सही तरीके से चलाने में सक्षम हुआ करता है।

           पांचवां प्रकरण, पांचवां अध्याय- नायक सहायदूती- कर्म- विमर्श। आचार्य वात्स्यायन के मतानुसार विवाह से पहले वर्ण धर्म के मुताबिक स्त्री और पुरुष का चुनाव करके प्रेम संबंध स्थापित करना चाहिए। अगर इस तरह के प्रेम संबंधों को स्थापित करने में किसी तरह की रुकावट आती है तो मदद के लिए स्त्री या पुरुष को जरिया बनाना चाहिए। स्त्री-पुरुष किस तरह के संबंध स्थापित करें, किस तरह के व्यक्ति को अपना जरिया बनाएं, इस अध्याय के अंतर्गत इन्ही बातों का उल्लेख किया गया है।

श्लोक (15)- प्रमाणकालाभावेभ्यो रतावस्थापनम्। प्रीतिविशेषाः। आलिंगनविचाराः। ,चुम्बनविकल्पाः। नखरदनजातयः। दशनच्छेद्यविधयः। देश्याउपचाराः। संवेशनप्रकाराः। चित्ररतानि। प्रहणयोगाः। तद्युक्ताश्च। सीत्कृतोपक्रमाः। पुरुषायितम्। पुरुषोपसृप्तानि। औपरिष्टकम्। रतारम्भावसानिकम्। रतविशेषाः। प्रणयकलहः। इति साम्प्रयोगिकं द्वितीयमधिकरणम्। अध्याया दश। प्रकरणानि सप्तदश।।

अर्थ- दूसरे अधिकरण में अध्यायों और प्रकरणों को इस प्रकार से बताया गया है-

    प्रमाण, भावों और काल के मुताबिक संभोग क्रिया की व्यवस्था करना।
    प्रतिभेद।
    आलिंगन।
    चुंबन प्रकार।
    नखच्छेदन-प्रकार।
    दंतच्छेदन-प्रकार।
    अलग-अलग प्रदेशों के लोगों की अलग-अलग प्रवृत्तियां।
    संभोग के प्रकार।
    विचित्र प्रकार के विशिष्ट रत।
    मुट्ठी मारना।
    अलग-अलग स्ट्रोकों से पैदा हुई सी-सी करना।
    थकने के बाद पुरुष का स्त्री के समान व्यवहार करना।
    पुरुष का पास आना।
    औपरिष्टक (मुखमैथुन)।
    संभोग क्रिया की शुरुआत और आखिरी में कर्त्तव्य।
    उत्तेजना के प्रकार।
    प्रणय कलह।

इस अधिकरण के अंतर्गत यह 17 प्रकरण दिए गए हैं और 10 अध्याय हैं।

           इस दूसरे अधिकरण का नाम साम्प्रयोगिक है। सम्प्रयोग से मतलब यहां संभोग से हैं। कामसूत्र का ग्रंथ होने की वजह से इस ग्रंथ में यह खासतौर से बताया गया है पुरुष अर्थ, धर्म और काम नामक तीनों वर्गों की प्राप्ति के लिए स्त्रियसाधयत अर्थात स्त्री को प्राप्त करें। आचार्य वात्स्यायन स्त्री को पाने का सबसे बड़ा लक्ष्य संभोग को ही मानते हैं। लेकिन जब तक संभोग क्रिया की पूरी जानकारी न हो तब तक इसमें पूरी तरह से कामयाबी मिलना मुश्किल है और न ही किसी तरह की आनंद की प्राप्ति होगी।

           ऋग्वेद में संभोग के जिन 10 उपायों को बताया गया है वह कामसूत्र की उपर्य़ुक्त संभोग क्रियाओं के अंतर्गत हैं। यह कोई खास विषय नहीं हैं। आध्यात्मिक नजरिये से भी जगदवैचिन्य मैथुनात्मक और कामात्मक है। काम का मुख्य भाग आकर्षण है या फिर आकर्षण का खास अंग काम है।

           यही आकर्षण जब बड़ो के प्रति होता है, तब वह श्रद्धा, भक्ति आदि सम्मान के भावों में दिखाई पड़ता है, बराबर वालों के प्रति मित्रता, प्यार और सहयोगी के रूप में होता है, अपने से छोटों के प्रति दया और अनुकंपा आदि के रूप में प्रकट होता है और बच्चों के प्रति वात्सल्य भाव बनता है। वहीं काम मां के स्तनों में वात्सल्य के रूप में प्रेमी का आलिंगन करते समय कामरूप में और वही काम दीन-दुखियों के प्रति कृपा के रूप में अवतरिक होता है।

           मगर इन सारे रूपों में एक ही मानसिक भाव प्रवाहित रहता है, वह होता है मिथुन का संबंध- काम या आकर्षण। इसी वजह से बृहदारण्यक उपनिषद में बताया गया है-

पुरुष काममय है। काम मन की जरूरत है।

श्लोक (16)- वरणविधानम्। सम्बन्धनिर्णयः। कन्याविस्त्रम्भणम्। बालायाः। उपक्रमाः। इंगिताकारसूचनम्। एकपुरुषाभियोगः। प्रयोज्यस्योपावर्तनम्। अभियोगतश्च कन्यायाः। प्रतिपत्तिः विवाहयोगः। इति कन्यासम्प्रयुक्तकं तृतीयाधिकरणम्। अध्यायाः पञ्ञ। प्रकरणानि नव।।

अर्थ- इसके बाद कन्या सम्प्रयुक्त नाम के तीसरे अधिकरण के प्रकरणों का निर्देश किया जा रहा है-

    कन्यावरण।
    विवाह करने के बारे में फैसला करना
    कन्या को भरोसा दिलाना।
    कन्या में प्यार पैदा करने का ढंग।
    इशारों आदि को समझना।
    इशारों, कोशिशों या किसी बहाने से देखी हुई कन्या से विवाह करने की कोशिश।
    कन्या द्वारा अपने चहेते को अपनी ओर आकर्षित करना।
    अपने प्रेमी को अभियोगों द्वारा प्राप्त करना।

           इस अधिकरण के 9 प्रकरण सुखी दांपत्य जीवन की कुंजी माने गए हैं। कामसूत्र के रचियता वात्स्यायन विवाह को धार्मिक बंधन मानते हुए दिल का मिलाप स्वीकार करता है। वह लड़कियों को न तो सिर्फ भेड़-बकरी जानकर मनचाहे खूंटे पर बांधने का समर्थन करता है और न ही उन्हे उच्छखल और व्यभिचारिणी बनने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इसलिए इसका विधान है कि लड़कियां और लड़के अपनी युवावस्था में पहुंचने पर संभोग की 64 कलाओं का अध्ययन करें तथा अपना जीवन साथी तलाश करने में अपने दिल और बुद्धि का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें।

           इस बात की सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि हर आदमी के अंदर ऐसे 2 तत्व रहते हैं जो एक-दूसरे से विशिष्ट हैं। इनमें से एक तर्कपूर्ण वृत्ति है और दूसरी विचारशून्य वृत्ति। यही वृत्ति अपने को काम-संभोग, भूख-प्यास और बहुत सी इच्छाओं के रूप में प्रकट करती है। दर्शनशास्त्र के अनुसार हर प्राणी समूह इच्छामात्र है। इच्छाओं के कारण ही मनुष्य़ का मन हर समय भटकता रहता है।

           मनुष्य हर समय अपनी इच्छाओं को पूरी करने की कोशिश में लगा रहता है। इच्छाएं हमेशा पूरी होना चाहती है। हालात अनुकूल होने पर जब इच्छाएं पूरी नहीं होती तो वह मन में जमा होकर विक्षोभ उत्पन्न करती है। यह भी सच्चाई है किसी व्यक्ति को उसकी मनचाही चीज देश, काल, समाज या हालात के बंधन से अथवा राजदंड के डर से न मिलकर किसी दूसरे को मिल जाती है तो उसकी इच्छा क्रिया रूप में जमा हो जाती है और अगर वह इच्छाएं पूरी नहीं होती तो एक तूफान के रूप में मन में समा जाती है। जिसका नतीजा यह होता है कि उस व्यक्ति के मन और मस्तिष्क का संतुलन बिगड़ जाता है।

श्लोक (17)- एकचारिणीवृत्तम्। प्रवासचर्या। सपलीषु ज्येष्ठावृत्तम्। कनिष्ठावृत्तम्। पुनर्भवृत्तम्। दुर्भगावृत्तम्। आन्तःपुरिकम्। पुरुषस्य बह्वीषु प्रतिपत्तिः। इति भार्याधिकारिकं चतुर्थमधिकरणम्। अध्यायौ द्वो प्रकरणान्यषटौ।।

अर्थ- इस अधिकरण का नाम भार्याधिकारिक है। इसके अंतर्गत 8 प्रकरण और 2 अध्याय है-

    सिर्फ अपने पति पर ही अनुराग रखने वाली पत्नी का कर्त्तव्य।
    पति के कहीं दूर जाने पर पत्नी का कर्त्तव्य।
    सबसे बड़ी पत्नी का अपनी से छोटी सौतनों के साथ बर्ताव।
    सबसे छोटी पत्नी का अपनी से बड़ी सौतनों के साथ बर्ताव।
    दूसरी बार विवाहित विधवा का फर्ज।
    अभागिनी पत्नी का अपनी सौतनों और पति को खुश रखने का विधान।
    अंतःपुर (महलों में रहने वाले) के फर्ज।
    पति का अपनी बहुत सारी पत्नियों के प्रति कर्त्तव्य।

           विवाह के बाद हर कन्या, कन्या न कहलाकर पत्नी कहलाती है। पत्नी और सप्तनी 2 प्रकार की भार्या होती है। इसके अंतर्गत इन दोनों प्रकार की पत्नियों के कर्त्तव्य दिए जा रहे हैं। गृहस्थ जीवन को सुख-संपन्न रूप से चलाने के नियमों को आचार्य वात्स्यायन अच्छी प्रकार जानते हैं। उसे इस बात की जानकारी भी है कि वह कौन सी एक छोटी सी चिंगारी है जो पूरे घर को जलाकर राख कर देती है। वह घर को सुखी बनाने के लिए मंगल कामना करता हुआ इस अधिकरण द्वारा सुझाव पेश करता है।

श्लोक (18)- स्त्री-पुरुषशीलावस्थापनम्। व्यावर्त्तनकारणानि। स्त्रीषु सिद्धाः पुरुषाः। अयन्तसाध्या योषितः। परिचयकारणानि। अभियोगाः। भावपरीक्षा। दूतीकर्माणि। ईश्वरकामितम्। अंतःपुरिकं दाररक्षितकम्। इति पारदारिकं पञ्ञममधिकरणम्। अध्यायाः षट् प्रकरणानि दश।

अर्थ- पारदारिक नाम के पांचवें अधिकरण के प्रकरणों का निर्देश करते हैं। इसमें 6 अध्याय और 10 प्रकरण है।

    पुरुष और स्त्री के शील की व्यवस्थापना।
    पराए पुरुष के साथ संबंध बनाने में रुकावट डालने वाले कारण।
    स्त्रियों को अपने वश में करने में निपुण पुरुष।
    अपने आप ही वश में होने वाली स्त्रियां।
    परिचय प्राप्त करने के नियम।
    अभियोग।
    भावों की परीक्षा।
    दूतीकर्म।
    ऐश्वर्यशाली पुरुषों की इच्छाओं को पूरी करने के उपाय।
    व्यभिचारी पुरुषों से स्त्रियों की रक्षा।

           इस अधिकरण का मुख्य मकसद किन हालातों में पराए पुरुष और पराई स्त्री का आपस में प्रेम संबंध पैदा होता है, बढ़ता है और टूट जाता है। किस तरह परदार इच्छा पूरी होती है और किस प्रकार व्यभिचारी से स्त्रियों की रक्षा की जा सकती है।

           पुरुष और स्त्री के बीच एक ही शक्ति बहुत से रूपों में मौजूद रहती है जिसको प्रेम कहते हैं। अगर प्रेम का कहीं कोई बीज होता है तो वह सिर्फ संभोग की इच्छा ही है।

           दार्शनिक दृष्टि से प्रेम का मुख्य मकसद संभोग को माना जाता है। जितने व्यवहार प्रेम से संबंध रखने वाले है वह सब संभोग-प्रेम में अंतर्हित है और इससे अलग नहीं किये जा सकते- जैसे आत्मप्रेम, मातृपितृ प्रेम, शिशु वात्सल्य, मैत्री, विश्व-प्रेम, विषय़-वासनाओं से प्रेम और भावनाओं के प्रति श्रद्धा आदि।

           मनुष्य़ जगत की हर वासना खासतौर पर वितैषणा, दारैषणा और लोकैषणा इन 3 भागों में बंटी है। अगर बारीकी से देखा जाए तो सारी वासनाएं सिर्फ दारैषणा में ही अंतर्भूत हो जाती है क्योंकि आकर्षण ही स्त्री की कामना का सार होता है और स्त्री-पुरुष के मिलन में आकर्षण ही परिणत हो जाया करता है।

           धन, स्त्री और यश की इच्छा सिर्फ आनंद के लिए की जाती है। सारी तरह की वासनाओं की जड़ आनंद ही है और इसी को मूलप्रेरक शक्ति माना जाता है। इसका स्थूल अनुभव संभोग के द्वारा हासिल किया जा सकता है। सांसारिक जीवन में संभोग पराकाष्ठा का आनंद है इसलिए सभी तरह के आनंदों को संभोग आनंद का रूपांतर समझने में किसी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

श्लोक (19)- गम्यचिन्ता। गमनकारणानि। उपावर्तनविधिः। कान्तानुवर्तनम्। अर्थागमोपायाः। विरक्तिलिंगानि। विरक्तप्रतिपत्तिः। निष्कासनप्रकाराः। विशीर्णप्रतिसंधानम्। लाभविशेषः। अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारः। वेश्याविशेषाश्च इति वैशिकं षष्ठमधिकरणम्। अध्यायाः षट्। प्रकरणानि द्वादश।।

अर्थ- हम इस वैशिक नाम के छठे अधिकरण के प्रकरणों का निर्देश करते हैं। इस अधिकरण के अंतर्गत 6 अध्याय और 12 प्रकरण दिए गए हैं-

    गम्य पुरुष विचार।
    किसी एक व्यक्ति के साथ संभोग करने के कारण।
    अपनी तरफ आकर्षित करने का तरीका।
    वेश्या का अपने प्रेमी के साथ उसकी विवाहित पत्नी की तरह व्यवहार करना।
    अर्थोपार्जन के तरीके।
    विरक्त पुरुष के निशान।
    विरक्त पुरुष की दुबारा प्राप्ति।
    निकालने के उपाय।
    निकाले हुए के साथ दुबारा संधि करना।
    लाभ विशेष का विचार।
    अर्थ, धर्म और अधर्म के अनुबंध संयम संबंधी विचार।
    वेश्याओं के भेद।

           इन 12 प्रकरणों से युक्त वैशिक नाम का यह छठा अधिकरण है। इस अधिकरण के अंतर्गत वेश्याओं के चरित्र और उनके समागम उपायों को बताया गया है। आचार्य वात्स्यायन नें वेश्यागमन को एक तरह का बुरा काम माना है और उनका कहना है कि वेश्यागमन से शरीर और अर्थ दोनों का नाश हो जाता है। लेकिन वेश्या समाज का ही अंग होती है इसलिए उसका उपयोग समाज करता है। साधारण मनुष्यों और वेश्याओं की भलाई को ध्यान में रखते हुए लेखक इस अधिकरण में वेश्याओं के चरित्र का विशद् विवेचन किया है।

           यह तो अनुभव की बात है कि काम एक शक्ति है और वह बहुत ज्यादा चंचल होती है। इस शक्ति का जब भी उन्नयन होता है तब तक भावों और संवेगों की उत्पत्ति होती है।

           मनुष्य की जो इच्छाएं ग्रंथि का रूप ले लेती है वहीं वासना कही जाती है। वासनाओं के इसी वेग को संवेग कहते हैं। व्यक्ति के दिल में अनुकूल या प्रतिकूल वेदना ही उत्पत्ति ही भाव कहलाती है। यही भाव बढ़ते-बढ़ते संवेग का रूप धारण कर लेता है। विषयों की स्मृति से अथवा सत्ता से या फिर कल्पित विषयों से भी डर. प्रेम आदि के संवेग जागृत हुआ करते हैं। यह बात वाकई अनुभवसिद्ध है कि विषयों के सन्निकर्ष से कोई न कोई भाव अथवा संवेग जरूर पैदा होता है।

           इसका समर्थन गीता में भी किया गया है कि संग से काम होता है। जितने भी वासना व्यूह है सभी के साथ संवेग जुड़ा रहता है। हमारी चित्त वृत्ति के भावमय. ज्ञानमय और क्रियामय- तीन ही रूप होते हैं। ज्ञान के कारण ही भाव और संवेग जागृत होते हैं। मनचक्र में सोई हुई अतुल कामशक्ति, प्रेरक स्फुलिंगों को पाकर ही जागृत होते हैं। बाह्य अथवा आभ्यंतर उद्दीपकों से पैदा संवेदनाएं और ज्ञानात्मक मनोभाव ही कामशक्ति के प्रेरक स्फुलिंग होते हैं। इनसे प्रेरणा पाकर ही संवेग के साथ कामशक्ति बहिर्मुख होती है।

           मनुष्य के विचार चोटी पर होते हुए भी उसका हृदय हमेशा नई संवेदनाओं की तलाश में नीचे उतर आता है। हर मनुष्य को भावों को बदलने की इच्छा होती है। मनुष्य स्वभाव से ही बदलाव, सुंदरता और नएपन को चाहता है।

           अगर गौर से देखा जाए तो नवीनता का दूसरा नाम अभिरुचि है। जहां पर नवीनता है वहीं रमणीयता रहती है।

           रमणीयता का वही रूप है जो पल-पल में नएपन को प्राप्त करता है। संवेग के कारण ही हमारी क्रियाएं प्रतिक्षण बदला करती है। पहले तो उत्सुकता जागृत होती है और इसके बाद तृष्णा जागृत होती है। जिस समय व्यक्ति के दिल में संवेग पूरी तरह से जागृत हो जाता है उसी समय उसे 1 दिन 1 साल के जैसा लगता है।

           जब संवेग के अवरोधक पूरी तरह अभिव्यक्ति नहीं होने देते तब मन में बेचैनी होने लगती है, चिंताएं बढ़ जाती है. मन में उथल-पुथल होने लगती है। सामाजिक नियमों के अनुरूप काम का निरोध-अवरोध तो जबरदस्ती करना पड़ता है। जबकि यह अनुभव समाज युग-युग से करता आ रहा है कि काम वासना पर पूरी तरह से काबू नहीं पाया जा सकता। समाज का नियंत्रण यहीं तक सीमित रहता है कि वासना शारीरिक क्रिया में परिणत न होने पाए। मानसिक द्वन्द्व भले ही मजबूत होता है।

           मनुष्य जिन वासनाओं को निरोध से दबाना चाहता है वह कभी नहीं दबती, बल्कि सुलगने लगती है और किसी न किसी रूप में अपना असर डालती रहती है। असल बात यह है कि जिस बात को मना किया जाता है उसी को करने के लिए मन में बेचैनी बढ़ती रहती है। शास्त्र और समाज की दृष्टि से पराई स्त्री के साथ संबंध बनाना अधर्म है और उसके साथ संभोग करने को गलत माना जाता है। इस तरह की रोक का नतीजा यह होता है कि पराई स्त्री का रस रसोत्तम माना जाता है।

श्लोक (20)- सुभंगकरणम्। वशीकरणम्। वृष्याश्च योगाः। नष्टरागप्रत्यानयनम्। वृद्धिविधयः। चित्राश्च योगाः। इत्यौपनिषदिकं सप्तममधिकरणम्। अध्यायौ द्वौ। प्रकरणानि।

अर्थ-

    गुण, रूप आदि को बढ़ाना।
    यंत्र, तंत्र और मंत्र द्वारा वश में करना।
    वाजीकरण (काम-शक्ति बढ़ाना) प्रयोग।
    नष्टराग (खत्म हुई उत्तेजना) को दुबारा पैदा करना।
    लिंग को बढ़ाने वाले प्रयोग।
    चित्र-विचित्र प्रयोग।

           इन 6 प्रकरणों से युक्त औपनिषदिक नाम का यह सातवां अधिकरण है और इसके अंतर्गत 2 अध्याय है।

श्लोक (21)- एवं षट्त्रिंशदध्यायाः। चतुःषष्टिः प्रकरणानि। अधिकरणानि सप्त। सपादं श्लोकसहस्त्रम्। इति शास्त्रस्य संग्रहः।।

अर्थ- इस प्रकार से कामसूत्र में 36 अध्याय, 64 प्रकरण, 7 अधिकरण और 1250 श्लोक है।

श्लोक (22)- संक्षेपमिमक्षुक्त्वास्य विस्तरोऽतः प्रवक्ष्यते। इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासभाषणम्।।

अर्थ- इस तरह अधिकरण, अध्याय, प्रकरण आदि की विषय़ सूची संक्षेप में बताकर अब उसी को विस्तार से पेश किया जा रहा है क्योंकि संसार में विद्वानों के लिए संक्षेप तथा विस्तार दोनों की जरूरत है।

           आचार्य वात्स्यायन ने इस सातवें अधिकरण के अंतर्गत अधिकरण का नाम औपनिषदिक रखा है। औपनिषदिक का स्थूल अर्थ टोटका होता है। इस अधिकरण के अंतर्गत कामवासना को पूरा करने के साधन तथा भौतिक जीवन की कामयाबी के तरीकों को बहुत ही विस्तार से समझाया जा रहा है।

           तंत्र औषधि आदि के रूप में जो टोटके पेश किए जा रहे हैं, उनके अंतर्गत स्वेच्छाचारिता, उच्छग्खलात और असामाजिकता, अशिष्टता, निर्दयता की भावना न पैदा हो, यह विवेक भी रखा गया है।

श्लोक- इतिश्री वात्स्यायनीय कामसूत्रे साधारणे, प्रथमधिकरेण शास्त्र संग्रह प्रथमोध्यायः।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय