Android app on Google Play iPhone app Download from Windows Store

 

त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3

श्लोक (19)- सा चोपायप्रतिपत्तिः कामसूत्रादिति वात्स्यायनः।।

अर्थ- पति-पत्नी के धार्मिक और सामाजिक नियम की शिक्षा कामसूत्र के द्वारा मिलती है। जो दम्पति कामशास्त्र के मुताबिक अपना जीवन व्यतीत करते है उनका जीवन यौन-दृष्टि के पूरी तरह सुखी होता है। ऐसे दम्पति अपनी पूरी जिंदगी एक-दूसरे के साथ संतुष्ट रहकर बिताते हैं। उनके जीवन में पत्नीव्रत या पतिव्रत को भंग करने की कोशिश या आकांक्षा कभी पैदा ही नहीं हुआ करती है तथा उपायों द्वारा प्राप्त वह ज्ञान कामसूत्र से प्राप्त होगा। यह वात्स्यायन का मत है।

           कामसूत्र के द्वारा इस बात के बारे में जानकारी मिलती है कि संभोग की 3 मुख्य क्रियाएं होती है- विलास, सीत्कार और उपसर्ग। इनके अलावा 3 तरह के पुरुष, 3 प्रकार की स्त्रियां, 3 तरह का सम संभोग, 6 तरह का विषम संभोग, संभोग के 3 वर्ग, वर्ग भेद से 9 प्रकार के संभोग, काल भेद से 9 प्रकार के संभोग तथा संभोग के सभी 27 प्रकार है। संभोग करते समय पुरुष और स्त्री को कब और किस तरह का आनंद मिलता है, पहली बार संभोग करते समय किस तरह की परेशानी होती है, स्त्री पर स्खलन का क्या प्रभाव पड़ता है, संभोग करते समय विभिन्न प्रकार के आसनों से किस प्रकार के लाभ होते हैं।

           जो लोग सेक्स क्रिया के बारे में नहीं जानते हैं वह अपनी पत्नी के साथ सेक्स करके उन्हे बहुत से रोगों की गिरफ्त में पहुंचा देते हैं। कामसूत्र द्वारा ऐसी बहुत सी विधियां पाई जाती है जो स्त्री और पुरुष को आपस में ऐसे मिला देती है जैसे कि दूध में पानी। इसलिए आचार्य वात्स्यायन के अनुसार संभोग के लिए शास्त्र उसी तरह जरूरी है जैसे अर्थ और धर्म के लिए होता है।

श्लोक (20)- तिर्यग्योनिषु पुनरावृतत्वात् स्त्रीजातेश्च, ऋतो यावदर्थ प्रवृत्तेबुद्धिपूर्वकत्वाच्च प्रवृत्तीनामनुपायः प्रत्ययः।।

अर्थ- स्त्री और पुरुषों में तो स्त्री जाति स्वाधीन और बंधनरहित होती है। जिसके कारण ऋतुकाल ही में वह तृप्त होती है। उसकी संभोग के प्रति रुचि होने से तथा विवेक बुद्धि न होने से पशु-पक्षियों के लिए स्वाभाविक संभोग की इच्छा ही काम-प्रवृत्तियों को पूरा करने के लिए सही उपाय है।

           वात्स्यायन के मतानुसार मनुष्य रूप में पैदा हुई स्त्री तथा तिर्यग्योनि में पैदा हुई चिड़िया में काफी फर्क होता है। स्त्री चिड़िया की तरह न तो आजाद होती है और न विवेकशून्य। वह समाज और वंश की मर्यादाओं से बंधी रहती है। इसके अंतर्गत लोकलज्जा, कुललज्जा तथा धर्मभय रहता है। इसलिए किसी खास तरह के पुरुष का किसी खास स्त्री के साथ संबंध होने से बहुत सी मुश्किलें पैदा हो सकती है।

           पशु-पक्षियों की तरह मनुष्य की संभोग करने की इच्छा सिर्फ पाशविक धर्म नहीं है। व्यक्ति को धर्म, अर्थ, संतान को पैदा करना, वंश को बढ़ाना जैसे कई तरह के मकसदों को सामने रखना पड़ता है।

          इसके अलावा भी पशु-पक्षियों में भाई-बहन, माता-पिता के संबंधों का विवेक पैदा नहीं होता और न ही उनका दाम्पत्य जीवन पूरी जिंदगी रहता है। वैवाहिक जीवन को पूरी जिंदगी चैन से बिताने के लिए कामसूत्र की जरूरत होती है।

श्लोक (21)- न धर्माश्चरेत्। एष्यल्फलत्वात्। सांशयिकत्वाच्च।।

अर्थ- धर्म का आचरण कभी न करें क्योंकि भविष्य में मिलने वाला फल ही अनिश्चित होता है। उसके मिलने में भी शक रहता है।

श्लोक (22)- को ह्यबालिशो हस्तगतं परगतं कुर्यात्।।

अर्थ- कौन सा व्यक्ति इतना मूर्ख होता है जो हाथ में आई हुई चीज को दूसरे के हाथ में सौंप देगा।

श्लोक (23)- वरमद्य कपोतः श्वो मयूरात्।।

अर्थ- अगर वह सुख मिलना निश्चित भी हो तब भी यह लोकोक्ति चरितार्थ ही होती है- कल मिलने वाले मोर से आज मिलने वाला कबूतर ही अच्छा है।

श्लोक (24)- वरं सांशयिकात्रिकादसांशयिकः कार्षापणः। इति लौकायातिकाः।।

अर्थ- नास्तिक लोगों को मानना है कि कहना है कि असंदिग्ध रूप से मिलने वाला तांबे का बर्तन शंका से प्राप्त होने वाले सोने के बर्तन से अच्छा है।

आचार्य वात्सयायन के मतानुसार-

           धर्मों का पालन जरूर करना चाहिए क्योंकि धर्म का उपदेश करने वाले वेद तथा शास्त्र ईश्वर कृत तथा मंत्रदृष्टा ऋषियों द्वारा बनाए गए है इसलिए वह निश्चय ही सही हैं।

           शास्त्रों के अनुसार कहे गए अभिचार कार्यों और शांति, पुष्टिवर्द्धक कामों के फलों का एहसास इसी जन्म में हो जाता है।

           नक्षत्र, सूर्य, चंद्र, तारागण तथा ग्रह-चक्रों की प्रवृत्ति भी लोगों की भलाई के लिए बुद्धिवाद्-संपन्न जान पड़ती है।

मनुष्य का जीवन वर्णाश्रय धर्म पर आधारित है-

तत्र संप्रतिपत्तिमाह-

श्लोक (25) शास्त्रस्यानभिशंग-यत्वादभिचारानुव्याहारयोश्च कचित्फलदर्शनात्रक्षत्र-चंद्रसूर्यताराग्रहचक्रस्य लोकार्थ बुद्धिपूर्वकमिवप्रवेत्तेर्दर्शनाद्वर्णाश्रमाचारस्थिति-लक्षणत्वाच्च लोकयात्राया हस्तगतस्य च बीजस्य भविष्यतः सस्यार्थे त्यागदर्शनाच्चरेद्धर्मानिति वात्स्यायनः।।

अर्थ- हाथ में आए हुए बीज को अनाज मिलने की आशा में त्याग देना बेवकूफी नहीं है क्योंकि बीज से ही अन्न पैदा होता है। उसी तरह भावी मोक्ष की आशा ऱखकर धार्मिक कार्यों को करना सही है क्योंकि धार्मिक कार्यों के जरिए ही मोक्ष के रास्ते खुलते हैं।

           धर्म के आचरण के लिए वात्स्यायन वेद और शास्त्र को ईश्वरकृत और ऋषि प्रणीत कहकर इन्हे सच मानते हैं। इनकी सत्यता साबित होने पर वह धर्म को भी प्रामाणिक मानते हैं।

वेद ईश्वरकृत है- इसके प्रमाण स्वयं वैदिक ग्रंथ हैं-

श्लोक- अरे अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्।

यद्दग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वागिंरसः।।

श्लोक- त्रयोर्वेदो वायोः सामवेदः आदित्यात्।।

त्रयो वेदा अजायन्त आग्नेऋग्वेदः।

वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात् सामवेदः।।

अग्नेऋरचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात्।

तस्माथज्ञात्सर्वहुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्माद्जायत।।

यस्मिन्नृचः सामयजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभा विवाराः।

सस्माद्दचो अपातक्षन् यजुर्यस्मादपारुषन्।

सामानि यस्य लोमान्यथर्वागिंरसो मुखम्।।

अर्थ- ऊपर दिए गए उदाहरणों से ऋग्वेद, यर्जुवेद, सामवेद तथा अर्थववेद की अपौरूखषेयता और ईश्वरदत्तता साबित होती है। विधि और मंत्र जिसके अंतर्गत आते हैं वही वेद होते हैं। मीमांसा दर्शन ने इस बात पर अपने विचार प्रकट किए हैं कि प्रेरणादायक लक्षण वाला अर्थ ही धर्म है। विधि तथा मंत्र का एक ही अर्थ है क्योंकि प्रेरणात्मकों को मंत्र कहते हैं।

          इसके द्वारा आचार्य वात्स्यायन के इस मत की पुष्टि हो जाती है वेद ईश्वरीय ज्ञान है तथा उनमें धर्मोपदेश है।

       यहां पर वात्स्यायन का अर्थ शास्त्र से मतलब धर्मशास्त्र है। धर्मशास्त्र में यादों को प्रमुख माना जाता है। मनु, याज्ञवल्क्य आदि साक्षात् कृतधर्मा ऋषि-मुनियों नें यादों में जो धर्म के उपदेश दिए हैं वह सार्वकालिक तथा सार्वजनीन है। उनका धर्म उपदेश यथार्थ की पृष्ठभूमि पर सामाजिक अभ्युदय तथा पर लौकिक कल्याण के लिए हुआ है। इस प्रकार यादें सच है, उनके द्वारा बताए गए रास्ते पर धर्म का आचरण करना सही है।

          मनुष्य जो भी शुभ या अशुभ कार्य करता है शास्त्रों के द्वारा उसका फल उसे इसी जिंदगी में भुगतना पड़ता है। मीमांसा के अनुसार श्रुति के द्वारा जिन कार्यों को करने की आज्ञा मिलती है, वह रोजाना, नैमित्तिक तथा काम्य 3 तरह के होते हैं। होम करना रोजाना का काम है। नैमित्तिक कामों को किसी खास मौकों पर किया जाता है। यह दोनों आदेश के रूप में होते हैं और इनको करना जरूरी होता है। उत्तेजित कार्यों को खास किस्म की इच्छाओं को पूरा करने के लिए किया जाता है। हर कार्य में कुछ अंश प्रधान तथा कुछ अंश गौण होते हैं।

           यज्ञ होम का प्राकृतिक और लाभकारी फल वायुमंडल की शुद्धि है। जलती हुई आग अपने ऊपर की ओर आस-पास की वायु को गर्म करके ऊपर की ओर धकेलती है। शून्य को पूरा करने के लिए इधर-उधर से ठंडी हवा हवन-कुंड की तरफ खिंची आती है तथा गर्म होकर वह भी ऊपर आ जाती है। यह चक्कर चलता रहता है।

           इस क्रिया में इधर-उधर उड़ते हुए, पड़े हुए खतरनाक जीव कुंड से गुजरते हुए भस्म हो जाते हैं। इस परिवर्तन क्षेत्र में जो कोई भी बदलाव होता है उससे वायुमंडल तुरंत ही शुद्ध होता है, मंत्रों का पाठ यज्ञ करने वाले को समुन्नत बनाता है। मीमांसाकार के मत से यज्ञों का जो फल है उसका संबंध वर्तमान से हैं।

           धर्म जिज्ञासा पूर्वमीमांसा का विषय है तथा धर्म से वह कार्य अभिप्रेत है जिसकी विधियां वेदों में बताई जा चुकी है। इन कर्मों का फल जरूर मिलता है। यही नही कर्म अगर किए जाते है तो वह फल की प्राप्ति के लिए ही किए जाते हैं। मीमांसा के मतानुसार फल मनुष्य के लिए है और मनुष्य कर्म के लिए है। कर्म की प्रेरणा भले ही इसलिए की जाती है कि ऐसा कर्म कल्याणकारी होता है। हमारी नैतिक भावना की मांग यह है कि पुण्य काम तथा सुख का मेल हो। पाप और दुख का मेल हो। इस सिद्धान्त का पक्षपाती जेमिनी है। शुभ कामों के फल शुभ और अशुभ कामों के फल अशुभ मिलते हैं।

           ग्रह, नक्षत्र आदि की प्रवृत्ति मनुष्य की भलाई की लिए ही होती है। श्रुति के मंत्र भाग के अंतर्गत कई स्थानों पर बताया गया है कि सूर्य ही सब प्रजाओं का प्राण है। सूर्य के द्वारा ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति हुई है। विषुवत् वृत्त तथा क्रांति वृत का शरीर की बनावट के बहुत ही गहरा संबंध होता है। इस विषय के बारे में ऐतरेय ब्राह्मण में बताया गया है-

           इस तरह प्रमाण से यह साबित हो जाता है कि मनुष्य की आत्मा अधेन्द्र अर्थात इंद्र का आधा भाग है। अपूर्णता के रह जाने पर मनुष्य आदि प्राणियों का आत्मा इन्द्र अपने आपको अपूर्ण व अपर्याप्त समझता है क्योंकि अकेला प्राणी कभी भी संभोग नहीं कर सकता- तस्मादेकाली न रमते तद द्वितीयमैच्छत। वह मनोविनोद क्रीडा़ के लिए दूसरे प्राणी का इच्छा करता है। यह जीवन का नियम होता है।

          इसीलिए बहुत सी श्रुतियों का कहना है कि जब तक पुरुष दार-संग्रह विवाह नहीं करता तब तक उसे अधूरा ही माना जाता है। वाजिश्रुति का कहना है कि जिन दो स्त्री-पुरुषों का मिलन होता है वह तब तक पूरे नहीं हो सकते जब तक एक अर्द्ध का दूसरे से मिथुन संबंध नहीं हो जाता है। यह स्त्री आधा भाग होती है। इस तरह से जब तक स्त्री को हासिल नहीं किया जा सकता तब तक सृष्टि नहीं हो सकती है।

           आचार्य वात्स्यायन का यह कथन संकुचित और सीमित नजरिये से अलग ही मालूम पड़ता है कि वर्णाश्रम धर्म पर ही लोगों को जीवन निर्भर करता है। उनके मतानुसार ब्राह्मणादि वर्ण सिर्फ मनुष्य में ही नहीं बल्कि पूरे संसार में वर्तमान चेतन-अचेतन सभी पदार्थ 4 वर्णों में बंटे हैं।

           जो पदार्थ आग्नेय होते हैं वह ब्राह्मण कहलाते हैं। जो ऐन्द्र होते हैं वह क्षत्रिय होते हैं। जो विश्वदेव हैं वह वैश्य माने जाते हैं और पूष देवता के पदार्थों को शुद्र कहते हैं। सारे पदार्थ अग्नि, इंद्र, विश्वदेव और पूष देवता से अलग-अलग प्रकृति के पैदा होते हैं। इसलिए सारे पदार्थों में क्षत्रिय, ब्राह्मण आदि चारों विभाग होते हैं। मानव की इसी बुनियादी प्रकृति को ध्यान में रखकर आचार्य वात्स्यायन ने कामसूत्र में पुरुष और स्त्री का बंटवारा, गुण-कर्म, स्वभाव के मुताबिक करके उनके लिए संभोगकला का निर्देश दिया है।

           धर्म को नैतिक जीवन की बुनियाद माना गया है। धर्म का आचरण कभी त्याज्य नहीं कहा जा सकता है। छान्दोग्य उपनिषद के द्वारा सनत्कुमार का कहना है कि सुख में समग्र है, अल्प (थोड़े) में सुख नहीं है। नैतिक जीवन यज्ञ जैसा है और वह दूसरों को अपने अंदर मिला लेता है।

छान्दोग्य उपनिषद धर्म की उपमा वृक्ष से करते हुए कहते हैं- धर्म के 3 स्कंध है-

    दान, यज्ञ और अध्ययन पहला स्कंध है।
    तप दूसरा सकंध है।
    ब्रह्मचारी का आचार्य कुल में तीसरा सकंध है।

           दान देना, यज्ञ करना और वेदादि धर्मग्रंथों को पढ़ना मनुष्य का कर्त्तव्य बनता है। स्वाध्याय एक तरह का तप ही है। यज्ञ और दान वहीं मनुष्य कर सकता है जो कमाने की काबलियत रखता हो और जो कमाए उसमें से कुछ भाग दान देने की इच्छा रखता हो। अगर जीवन को सफल बनाना है तो उसके लिए तप जरूरी है। अच्छे आचरण जन्म लेते ही नहीं मिलते बल्कि उन्हे तो हमे दूसरों से लेना पड़ता है और इसके लिए हर मनुष्य को कोशिश करनी पड़ती है। यही कोशिश करने का समय ब्रह्मचारी आचार्य कुल में बिताता है जहां पर नैतिक आचार की बुनियाद पड़ती है।

           वात्स्यायन के मतानुसार मनुष्य यज्ञ, तप, दान, स्वाध्याय और शुद्ध आचरण का परित्याग न करके रोजाना इनका उपयोग करता रहे।

श्लोक (26)- नार्थाश्चरेत्। प्रयत्नतोऽपि ह्येतेऽनुष्ठीयमाना नैव कदायित्म्युः अननुष्ठीयमाना अपि यद्दच्छया भवेयुः।।

अर्थ- इसके अंतर्गत शास्त्राकार अर्थ प्राप्ति के संबंध में निम्नलिखित 5 सूत्रों द्वारा संदेह प्रकट करते हैं-

     अर्थ को प्राप्त करने के लिए कभी भी प्रयत्न नहीं करना चाहिए क्योंकि कभी-कभी पूरी तरह प्रयत्न करने के बाद भी अर्थ प्राप्त नहीं होता और कभी-कभी बिना कोशिश के भी प्राप्त हो जाता है।

श्लोक (27)- तत्सर्व कालकारितमिति।।

अर्थ- क्योंकि यह सब कुछ समय पर निर्भर करता है।

श्लोक (28)- काल एव हि पुरुषानर्थानर्थयोर्जयपराजययोः सुखदुःखयोश्च स्थापयति।।

अर्थ- समय ही है जो मनुष्य को अर्थ और अनर्थ में, जय और पराजय में तथा सुख और दुख में रखता है।

श्लोक (29)- कालेन बेलिरेन्द्रः कृतः। कालेन व्यपरोपितः। काल एव पुनरप्येनं कर्तेति कालकारणिकाः।।

अर्थ- समय ही था जिसने बालि को इंद्र के पद पर ला दिया और फिर समय ने ही उसे इंद्र के पद से गिरा दिया। इस तरह समय ही सब कर्मों का कारण है।

श्लोक (30)- पुरुपकारपूर्वक्त्वाद् सर्व प्रवृत्तीनामुपायः प्रत्ययः।।

अर्थ- आचार्य स्वयं ही निम्नलिखित 2 सूत्रों द्वारा अपनी ही शंका का हल कर रहे हैं-

           लेकिन सब कामों के मेहनत द्वारा कामयाब होने के उपायों को समझ लेना भी काम साधन कारण है।

श्लोक (30)- अवर्श्यभाविनोऽप्यर्थस्योपायपूर्वकत्वादेव। न निष्कर्मणो भद्रमस्तीती वात्स्यायनः।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन के मतानुसार किसी भी काम को कोशिश करने पर पूरा हो जाने के बाद यह साबित होता है कि निक्कमा आदमी कभी भी सुख को प्राप्त नहीं कर सकता।

           आचार्य वात्स्यायन के इस सिद्धान्तवाद का समर्थन ऐतरेय ब्राह्मण के शुनः शेप आख्यान के उस संचरण गीत से होता है जिसका अंतरा चरैति बरैवैति है। इस गीत को इंद्र नें पुरुष के वेश में आकर राजा हरिश्चंद्र के मृत्यु के मुंह में पहुंचे पुत्र को सुनाकर उसे लंबी जिंदगी प्रदान की थी।

           आचार्य वात्स्यायन और ऐतरेय ब्राह्मण के विचारों की अगर एक-दूसरे से तुलना की जाए तो उससे यही पता चलता है कि चलने का नाम ही जीवन है, रुकने का नहीं। ऐसे लोग ही अर्थ की प्राप्ति कर सकते हैं। जीवन के रास्ते पर आलसी बन कर रुक जाना, थककर सो जाना बहुत बड़ी मूर्खता है। उपनिषदों में कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में किसी तरह के संकल्प पर अडिग नहीं रहते वह कभी भी आत्मदर्शन नहीं कर सकते। जो मनुष्य़ पूरी तरह से डटकर अर्थ को प्राप्त करने की राह पर चल पड़ता है, इंद्र भी उन्ही के साथ है- इंद्र इधरत सखा।

श्लोक (32)- न कामाश्चरेत्। धर्मार्थयोः प्रधानयोरेवमन्येषां च सतां प्रत्यनीकत्वात्। अनर्थजनसंसर्गमसद्वयवसायमशौचमनायतिं चैते पुरुषस्य जनयन्ति।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन धर्म और अर्थ के बाद अब काम पर अपने मत दे रहे हैं-

           काम का आचरण नहीं करना चाहिए क्योंकि यह प्रधानभूत धर्म तथा अर्थ और सज्जनों के विरुद्ध है। काम मनुष्य में बुरे आदमियों का संसर्ग, बुरे काम, अपवित्रता और कुत्सित परिणामों को पैदा किया है।

श्लोक (33)- तथा प्रमादं लाघवमप्रत्ययमग्राह्यतां च।।

अर्थ- तथा काम-प्रमाद, अपमान, अविश्वास को पैदा करता है तथा कामी आदमी से सभी लोग नफरत करने लगते हैं।

श्लोक (34)- बहवश्च कामवशगाः सगणा एव विनष्टाः श्रूयन्ते।।

अर्थ- तथा ऐसा सुना जाता है कि बहुत से काम के वश में आकर अपने परिवार सहित समाप्त हो जाते हैं।

श्लोक (35)- यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यामभिमन्यमानः सबन्धुराष्ट्रो विननाश।।

अर्थ- जिस प्रकार भोजवंशी दांडक्य नाम का राजा काम के वश में होकर ब्राह्मण की कन्या से संभोग करने के कारण अपने परिवार और राज्य के साथ नष्ट हो गया।

श्लोक (36)- देवराजश्चाहल्यामतिबलश्च कीचको द्रौपदी रावणश्च सीतामपरे चान्ये च बहवो द्दश्यन्ते कामवशगा विनष्टा इत्यर्थचिंतकाः।।

अर्थ- रावण सीता पर, इन्द्र अहल्या पर और महाबली कीचक द्रौपदी पर बुरी नजर रखने के कारण कामुक भाव रखने के कारण नष्ट हुए। ऐसे और भी बहुत से लोग है जो काम के वश में होकर नष्ट होते देखे गए हैं।

श्लोक (37)- शरीरस्थिातहेतुत्वादाहारसधर्माणो हि कामाः। धर्मार्थयोः।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन अपने स्वयं के दिए हुए तर्क का समाधान करते है-

           शरीर की स्थिति का हेतु होने से काम भोजन के समान है और धर्म तथा अर्थ का फलभूत भी यही है।

           आचार्य वात्स्यायन ने दिए गए 6 सूत्रों के द्वारा उदाहरण प्रस्तुत करके यह बताया है कि काम मनुष्य को बुरा, घिनौना और दयनीय बनाकर आखिरी में उसका नाश कर देता है। इस तर्क के मत में जो उदाहरण दिए गए है वह अर्थ चिंतकों के हैं।

           कौटिल्य ने भी राजा को इंद्रियों को जीतने वाला बनने का मशवरा देते हुए लिखा है कि विद्या तथा विनय का हेतु, इंद्रियों को जीतने वाला है। इसलिए क्रोध, काम, लोभमान, मद, हर्ष और ज्ञान से इंद्रियों को जीतना चाहिए।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय