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त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2

श्लोक (12)- स्पर्शविशेषविषयात्त्वस्याबिमानिकसुखानुविद्धा फलवत्यर्थप्रतीतिः प्राधान्यात्कामः।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन नें इस सूत्र में काम के बारे में बताते हुए कहा है कि आलिंगन, चुंबन आदि संभोग सुख के साथ गोल, नितंब, स्तन आदि खास अंगों के स्पर्श करने से आनंद की जो झलवती प्रतीत होती है उसकी को काम कहते हैं।

           इस सूत्र में फलवती अर्थप्रतीतिः इस शब्द में गंभीर भाव मौजूद है। इसका खास मकसद सुयोग्य संतानोप्दान ही समझना सही होगा क्योंकि वेद और उपनिषद भी इसी आशय को व्यक्त करते हैं-

1- आरोहतल्पं सुमनस्यमानेह प्रजां जनस्य पत्ये अस्मै।

इन्द्राणीव सुवुधा बुध्यमाना ज्योतिरुग्रा उपसः प्रतिजागरासि।।

अर्थ- हे वधू तू खुश होकर इस पलंग पर लेट जा और अपने इस पति के लिए संतान को पैदा कर तथा इंद्राणी की तरह हे सौभाग्यवती चतुरता से सुबह सूरज निकलने से पहले ही जाग जा।

अर्थात- संभोग क्रिया रात के समय ही होनी चाहिए जिससे मन में किसी तरह का डर, संकोच या शर्म आदि महसूस न हो।

 2- देवा अग्रे न्यपद्यन्त पत्नीः समस्पृशन्त तन्वस्तनूभि।

सूर्येव नारि विश्वरूपा महित्वा प्रजावती पत्या संभवे ह।।

अर्थ- विद्वान पुरुष पहले भी अपने पत्नी को प्राप्त हुए है तथा अपने शरीर को उनके शरीर से अच्छी तरह से मिलाया है। इस वजह से हे महान सुंदरता वाली तथा प्रजा को प्राप्त करने वाली स्त्री तू भी अपने पति से मिल जा।

अर्थात- संभोग क्रिया करने से पहले आलिंगन और चुंबन आदि जरूरा कर लेने चाहिए जिससे कि दोनों को ही आनंद की प्राप्ति हो सके और आलिंगन करने से शरीर में जो बिजली सी दौड़ती है उससे न सिर्फ शर्म ही दूर होती है बल्कि एक अजीब सा ,सुकून भी मिलता है।

3- तां पूषं छिवतमामरेयस्व यस्यां बीजं मनुष्यां वपन्ति

या न ऊरू विश्रयाति यस्यामुश्नतः प्रहरेम शेषः।।

अर्थ- हे जग को पालने वाले ईश्वर, जिस स्त्री के अंतर्गत आज बीज को बोना है उसे जागृत कर। जिसके द्वारा वह हमारी इच्छा करती हुई अपनी जांघों को फैलाती हुई तथा हम इच्छा करते हुए अपने लिंग का प्रहार स्त्री की योनि पर कर सके।

अर्थात- पुरुष और स्त्री दोनों को ही अपनी खुशी से संभोग क्रिया करनी चाहिए। इस क्रिया को करते समय दोनों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि स्त्री के योनि पथ को किसी तरह की हानि न पहुंचे क्योंकि स्त्रियों की योनि में एक बहुत ही बारीक झिल्ली होती है जो अक्सर पहले ही संभोग में टूट जाती है। इसलिए पुरुष को खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए कि स्त्री को किसी प्रकार की परेशानी न हो।

4- प्रत्वा मुञ्ञामि वरुणस्य पाशाद् येन त्वा सविता सुशेवाः।

ऊरू लोकं सुगमत्रपन्थां कृणोमि तुभ्यं सहपल्यै वधु।।

अर्थ- हे स्त्री मै तेरे पति के जरिए जांघों के बीच के योनिमार्ग को सरल बनाता हूं तथा तूझे वरुण के उस उत्कृष्ट बंधन से मुक्त करता हूं जिसको सविता ने बांधा था।

अर्थात- संभोग करते समय जो प्राकृतिक आसन होते हैं उन्ही को आजमाना चाहिए क्योंकि अप्राकृतिक आसनों को संभोग करते समय आजमाने से संतान विकलांग पैदा होती है।

5- आ रोहोरुमुपधत्स्व हस्त परिष्वजस्व जायां सुमनस्यामानः।

प्रजा कृण्वाथामिह मोदमानौ दीर्घ वामायुः सविता कृणोतु।।

अर्थ- हे पुरुष तू जांघ के ऊपर चढ़ जा, मुझे अपनी बांहों का सहारा दें, खुश होकर पत्नी को चिपका लें तथा खुशी मनाते हुए दोनों संतानों को पैदा करो जिसे सविता देव तुम्हारी उम्र को लंबी बनाए।

अर्थात- संभोग क्रिया के संपन्न होने के बाद स्त्री और पुरुष दोनों को ही स्नान कर लेना चाहिए क्योंकि इससे किसी शरीर को किसी तरह के रोग और गंदगी से मुक्ति मिलती है।

6- यद् दुष्कृतं यच्छमलं विवाहे वहतौ च यत्।

तत् संभलस्य कंबले मृज्महे दुरितं वयम्।।

अर्थ- इस वैवाहिक कार्य के द्वारा जो मलिनता हम दोनों से हुई उस कंबल के दागों को हमें छुड़ा लेना चाहिए।

अर्थात- इस बात से साफ पता चलता है कि आचार्य वात्स्यायन ने चुंबन, आलिंगन से फलवती अर्थ प्रतीति का अर्थ संतान को पैदा करने की दृष्टि रखकर ही इस सूत्र की रचना की है।

श्लोक (13)- तं कामसूत्रात्रागरिकजनसमवायाच्च प्रतिपद्येत।।

अर्थ- उस कामविज्ञान को कामसूत्र जैसे शास्त्रो से और काम व्यवहार में निपुण नागरिको के हासिल करना चाहिए।

           कामसूत्र के रचियता अर्थात आचार्य वातस्यायन ने कहा है कि कामशास्त्रो का अध्ययन कामसूत्र के जैसे आचार्यों को आकर ग्रंथो से ही करना चाहिए या किसी योग्य नागरिक से। यहां पर शास्त्र और आचार्य दोनों की ही मह्तवत्ता बताई गई है। अगर किसी भी विषय को जानना है या उसपर योग्यता हासिल करनी है तो किसी शास्त्र और आचार्य की शरण लेनी चाहिए। गीता में कहा गया है कि जो मनुष्य शास्त्र विधि को छोड़कर इधर-उधर भागता है वह न तो सिद्धि प्राप्त कर सकता है रऔ न ही लौकिक सुख को ही ग्रहण कर सकता है। वह कभी मोक्ष को भी पा नहीं सकता है।

श्लोक (14)- यः शास्त्रविधिमृत्स्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुख न परांगतिम।।

अर्थ- यहां पर कामशास्त्राकार का नागरिक जन से अर्थ है कि विद्घधजन अथवा कामशास्त्र का आचार्य़। आचार्य वही होता है जो अपने शिष्य़ों को ऐसी शिक्षा दे कि वह धर्म-अर्थ-काम को आसानी से प्राप्त कर सके। उपनिषद का ज्ञाता अपने शिष्य को पूरी तरह से शिक्षा देने के बाद उसे उपदेश देता है-

श्लोक- सत्य वद, धर्म चर स्वाध्यायान्मा प्रमदः प्रजातत्तुमा व्यवच्द्वेत्सीः।

अर्थ- धर्म का पालन करो, हमेशा सच बोलो, अप्रमत्त होकर स्वाध्याय करते रहो।

           गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के बाद संतान परंपरा को नहीं तोड़ना चाहिए।

           संतान परंपरा को टूटने से बचाने के लिए ब्रह्मचारी को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने से पहले विधि पूर्वक कामशास्त्र का अध्ययन कर लेना चाहिए। इसके बाद विवाह करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए।

           अर्थ, धर्म और काम के लक्षण तथा उनको पाने के साधन बताकर वात्स्यायन इनकी उत्तरोत्तर उत्कृष्टता तथा प्रामाणिकता को बता रहे हैं-

एषां समवाये पूर्वः पूर्वो गरीयान्।।

अर्थ- काम, अर्थ और धर्म में से काम से ज्यादा श्रेष्ठ अर्थ को माना गया है तथा अर्थ से धर्म को।

           सत्य, असत्य, अहिंसा, काम-क्रोध, लोभ से रहित होना, प्राणियों की प्रिय तथा हितकारिणी कोशिश में तैयार करना- यह सभी वर्णों के सामान्य धर्म माने जाते हैं।

           समाज व्यवस्था और सहअस्तित्व को अहिंसा ही कायम ऱखती है. संसार में जो कुछ भी है वह सत्य है। इसी प्रकार सत्य सर्वोपरि धर्म है तथा अहिंसा को अपनाना चाहिए। अहिंसा को छोड़ देने पर सच्चाई भी हाथ नहीं लगती।

           चोरी न करने को ही अस्तेय कहा जाता है। अस्तेय सत्य का ही एक भाग है। सच के इसी भाग पर समाज का व्यवहार आधारित है।

     जब जरूरत से ज्यादा वस्तुओं का उपयोग करने की इच्छा नही होती है तो उसे अकाय कहते हैं अर्थात मनुष्य को अपनी इच्छाएं और जरूरतों को सीमित ही रखना चाहिए।

            अहिंसा के दूसरे रूप में अक्रोध को जाना जाता है। हर व्यक्ति को अपने अंदर के कोध्र को जानना बहुत जरूरी है।

           सर्वभूतहित की भावना मनुष्य के जीवन को ऊपर उठाने में सबसे ऊपर मानी जाती है। अहिंसा, अक्रोध और अकाम आदि सभी इसके अंतर्गत आते हैं। सर्वात्मभाव हमारी जिंदगी का मकसद होना चाहिए तथा सर्वभूतहित हमारी साधना होनी चाहिए।

           आचार्य वात्स्यायन नें इन्ही वजहों से काम से बेहतर अर्थ और धर्म को माना है। जो मनुष्य धर्म की इन भूमिकाओं को स्वीकार कर लेता है उसके लिए काम और अर्थ करतल गत माने जाते हैं।

           आचार्य वात्स्यायन का मुख्य मकसद कामशास्त्र की महत्वत्ता की व्याख्या तथा उसकी व्यवहारिक उपयोगिता व्यक्त करना है। मगर जब तक मनुष्य धर्म के तत्व को नहीं जानता तब तक वह काम की दहलीज पर नहीं पहुंच सकता है।

श्लोक (15)- अर्थश्च राज्ञः। तन्मूलत्वाल्लोकयात्रायाः। वेश्यायाश्चेति त्रिवर्गप्रतिपत्तिः।।

अर्थ- इस तरह के साधारण नियम के बाद काम, धर्म और अर्थ के विशेष नियमों का उल्लेख करते हैं। सांसारिक जीवन का अर्थ मूल सूत्र माना जाता है। इस वजह से राजा के लिए काम और धर्म से ज्यादा जरूरी अर्थ होता है। वेश्या के लिए सबसे ज्यादा काम और अर्थ की जरूरत होती है। काम, धर्म और अर्थ के लक्षण तथा उनकी प्राप्ति के साधन खत्म होते हैं।

चाणक्य के अनुसार-

धर्मस्य मूलमर्थ- धर्म का मूल धर्म है।

अर्थस्य मूलराज्यम- अर्थ काम मूल राज्य है।

राज्यमूलनिन्द्रयजय- राज्य का मूल इन्द्रिजय है।

कौटल्य के द्वारा राजा की अर्थ प्रधान वृत्ति होनी चाहिए। उसके द्वारा वह राज्य तथा धर्म दोनों को उपलब्ध कर सकता है तथा राज्य को भी मजबूत बना सकता है। कौटल्य के इन विचारों से आचार्य वात्स्यायन के विचार बहुत ज्यादा मिलते-जुलते है।

श्लोक (16)- धर्मस्यालौकिकत्वात्तदभिदायक शास्त्र युक्तम्। उपायपूर्वकत्वादर्थासिद्धः। उपायप्रतिपत्तिः शास्त्रात्।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन धर्म का बोध करने वाले शास्त्र की जरूरत बताते हुए कहते हैं-

            धर्म परमार्थ का संपादन करता है, इस प्रकार धर्म का बोध कराने वाले शास्त्र का होना जरूरी है तथा उचित भी। अर्थसिद्धि के लिए कई तरह के उपाय करने पड़ते हैं इस वजह से इन उपायों को बताने के लिए अर्थशास्त्र की जरूरत होती है।

           धर्म का ज्ञान 3 प्रकार से होता है- पहला तो धर्मात्मा विद्वानों की शिक्षा, दूसरा आत्मा की सच्चाई को जानने की इच्छा और तीसरा परमात्मा प्राकेत विद-विद्या का ज्ञान। अथर्ववेद धर्म का लक्षण बताते हुए कहता है-

           यज्ञ, दम, शम, दान और प्रेमभक्ति से तीनों लोकों में व्यापक ब्रह्म की जो उपासना की जाती है उसे तप कहा जाता है। तत्व मानने, सत्य बोलने, सारी विद्याओं को सुनने, अच्छे स्वभाव को धारण करने में लीन रहना ही तप होता है।

            सत्य को ऋत भी कहते है। सच्चे भाषण और सत्य की राह पर बढने से बढ़कर कोई भी धर्म नहीं है क्योंकि सत्य से ही रोजाना मोक्ष सुख और सांसरिक सुख मिलता है।

           मनु, अत्रि, विष्णु, हारित, याज्ञवल्क्य, यम, संवर्त, कात्यायन, पराशर, व्यास, बृहस्पति, शंख लिखित दक्ष, गौतम, शातातप वशिष्ठ समेत यह सारे ऋषि धर्मशास्त्र को रचने वाले हैं। इन सभी धर्मशास्त्रकारों नें यही बताया है कि यज्ञ करना, इन्द्रियों पर काबू करना, सदाचार, अहिंसा, दान, वेदों का स्वाध्याय करना यही परम धर्म होता है।

           धर्म का मकसद सिर्फ इतना ही होता है कि विषयोचित वृत्तियों का निरोधकर आत्मज्ञाम प्राप्त करा जाए। इस वजह से वात्स्यायन नें धर्म को पारमार्थिक कहा है।

           धर्म और मोक्ष से ज्यादा अर्थ के क्षेत्र को ज्यादा व्यापक माना जाता है। जिस तरह से आत्मा के लिए मोक्ष की, बुद्धि के लिए धर्म की तथा मन के लिए काम की जरूरत होती है। इसी तरह शरीर के लिए भी अर्थ की जरूरत होती है। मनुष्य को ही धर्म और मोक्ष की जरूरत पड़ती है लेकिन काम तथा अर्थ के बिना तो मनुष्य पशु, पक्षी, कीड़े-मकोड़े तथा तृण पल्लव किसी का भी गुजारा नहीं हो सकता। काम के बिना भी एकबार काम चल सकता है और मनोरंजन को भी त्यागा जा सकता है।

           जिस अर्थ पर प्राणिमात्र के शरीर स्थिर है, सभी की जिंदगी ठहरी हुई है, उस अर्थ की प्रधानता का अंदाजा अनायास किया जा सकता है। उसकी मिमांसा भी बहुत सावधानी के साथ करना चाहिए क्योंकि उसके अनुचित संग्रह के द्वारा मोक्ष मार्ग बिगड़ सकता है। आर्य सभ्यता में इस वजह से अर्थ की महत्वता स्वीकार करते हुए अर्थशास्त्रों की रचनाएं हुई है।

           जीवन की हर समस्या का हल अर्थशास्त्र के द्वारा सभी दृष्टियों से किया जा सकता है। ज्ञान को पाने तथा उसकी सुरक्षा के लिए प्राचीन आचार्यों ने जितने भी अर्थशास्त्रों की रचना है, अक्सर उन सभी को इकट्ठा करके कौटल्य ने कौटलीय अर्थशास्त्र की रचना की है, इस कौटलीय अर्थशास्त्र की लेखनप्रणाली को अपनाकर वात्स्यायन ने कामसूत्र की रचना की है।

           आपस्तंब धर्मसूत्र में अर्थ तथा धर्म में कुशल राजपुरोहित तक का विवरण है। धर्मसूत्रों का मुख्य प्रतिपाद्य विषय धर्म अथवा विधान ही है लेकिन अर्थशास्त्र के अंतर्गत सभी आर्थिक सिद्धांतों तथा नियमों को बताया गया है।

           अर्थशास्त्र का खास विषय राजनीति है। मनुष्य के सभी लौकिक कल्याणों का स्वरूप अर्थशास्त्र के अंतर्गत मौजूद है। इसलिए जीवन के सभी प्रयोजनों की सिद्धि अर्थशास्त्र के अंतर्गत दी गई है।

श्लोक (17)- तिर्यग्योनिष्वपि तु स्वयं प्रवत्तत्वात् कामस्य नित्यत्वाच्च न शास्त्रेण कृत्यमस्तीत्याचार्याः।।

अर्थ- पशु-पक्षी को अक्सर बिना कुछ सिखाए ही संभोग क्रिया करते हुए देखा जा सकता है और काम के अविनाशी होने से यह साबित होता है कि इस विषय का शास्त्र बनाने की जरूरत नहीं है। यह कुछ आचार्यों का मत है-

श्लोक (18)- संप्रयोगपराधीनत्वात् स्त्रीपुंसयोरुपायमपेक्षते।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन नें इसका समाधान करते हुए कहा है-

           संभोग क्रिया करते समय हारने पर स्त्री और पुरुष को इस हार से बचने के लिए शास्त्र की अपेक्षा हुआ करती है।

           जो लोग धर्म के व्यापक रूप को, उसके प्रच्छन्न राज को समझने की कोशिश नहीं करते हैं वही कामशास्त्र का विरोध करते हैं। संभोगक्रिया को स्वाभावसिद्ध मानकर संभोगक्रिया में व्यक्ति और जानवर को बराबर मानने वाले नीतिकारों नें कामशास्त्र की उपयोगिता पर ध्यान नहीं दिया है।

           लेकिन आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि संभोग करने के लिए शास्त्रज्ञान जरूरी इसलिए है कि अगर स्त्री या पुरुष दोनों में से कोई भी भयभीत, लज्जान्वित या हारता है तो उसको उपायों की जरूरत होती है। इन उपायों को शास्त्र के अंतर्गत बताया गया है। संभोग सुख या वैवाहिक जीवन को खुशहाल बनाने के लिए संभोग की 64 कलाओं की जरूरत होती है।

           अर्थशास्त्र या धर्मशास्त्र के द्वारा ऐसी कलाओं और उपायों का ज्ञान नहीं होता। इस वजह से आचार्य वात्स्यायन यह ज्ञान देते हैं कि गृहस्थ जीवन को सुखी, संपन्न और आनंददायक बनाने के लिए कामसूत्र की जानकारी जरूर होनी चाहिए।

           कामशास्त्र के द्वारा इस बात की जानकारी मिलती है कि संभोग क्रिया का सर्वोत्तम तथा आध्यात्मिक उद्देश्य है पति-पत्नी में आध्यात्मिकता, मानव प्रेम तथा परोपकार और उदात्त भावनाओं का विकास। इस मकसद का ज्ञान पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़े को नहीं हो सकता। जो लोग संभोग के बारे में नहीं जानते वह जानवरों की तरह संभोग किया करते हैं।

           कामसूत्र के द्वारा मनुष्य को इस बात का ज्ञान होता है कि संभोग का असली सुख क्या है। यह सुख इस प्रकार से हैं-

मनुष्य जाति का उत्तरदायित्त्व।

           संभोग, संतान पैदा करना, जननेन्दिय और काम से संबधित समस्याओं के प्रति आदर्शमय भाव।

अपनी सहभागी के प्रति उच्चभाव, अनुराग, श्रद्धा और भले की कामना से इन तीनों पर निर्भर रहे।

           दाम्पत्य प्रेम या अपनी प्रेमिका की आत्मियता के बिना विवाह करना या प्रेम करना असफल होता है। दम्पत्तियों के बीच में आपसी क्लेश, संबंधों का टूटना, अनबन, गुप्त व्यभिचार, वेश्यावृत्ति, स्त्री का अपहरण, अप्राकृतिक व्याभिचार आदि बहुत से बुरे परिणामों और घटनाओं का असली कारण कामसूत्र को पसंद न करना या उसके बारे में जानकारी होना है।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय