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विद्या समुदेश प्रकरण 4

श्लोक -12. तस्माद्वैसिकाञ्जनाद्रहसि प्रयोगाञ्छास्त्रमेकदेशं वा स्त्री गृह्वीयात।।12।।

अर्थ- इस कारण से स्त्री को एकांत स्थान पर सभी प्रयोगों की, कामशास्त्र की, संगीतशास्त्र की और इनके आवश्यक अंगों की शिक्षा अवश्य ग्रहण करनी चाहिए।

श्लोक -13. अभ्यासप्रयोज्यांश्च चातुःषष्टिकान् योगान् कन्या रहस्येकाकि-न्यभसेत।।13।।

अर्थ- अभ्यास के द्वारा सफल होने वाली चौसठ कलाओं के प्रयोगों का अभ्यास कन्या को किसी एकांत स्थान पर करना चाहिए।

श्लोक -14. आचार्यास्तु कन्यानां प्रवृत्तपुरुषसंप्रयोगा सहसंप्रवृद्धा धात्रेयिका। तथाभूता वा निरत्ययसम्भाषणा सखी। सवयाश्च मातृष्वसा। विस्त्रब्धा तत्स्थानीया वृद्धदासी। पूर्वसंसृष्टा वा भिक्षुकी। स्वसा च विश्वास च विश्वास- प्रयोगात।।14।।

अर्थ-

विश्वस्त स्त्री-शिक्षिका का निर्देश करते हैं-

निम्नलिखित 6 प्रकार की आचार्याओं में से कोई एक, कन्याओं की आचार्य हो सकती है।

1. पुरुष के साथ सेक्स का अनुभव प्राप्त कर चुकी हो ऐसी, साथ में पली-पोसी खेली हुई धाय की पुत्री।

2. साफ दिल की ऐसी सखी या सहेली जो सेक्स का अनुभव प्राप्त कर चुकी हो।

3. अपने समान उम्र की मौसी।

4. मौसी के ही समान विश्वासपात्र बूढ़ी दासी।

5. अपनी बड़ी बहन।

6. परिवार, शील स्वभाव से पहले से परिचित, भिक्षुणी- संयासिनी।

     पुरुषों को कामशास्त्र की शिक्षा देने के लिए आचार्य तथा शिक्षक आसानी से मिल जाते हैं लेकिन स्त्रियों को कामशास्त्र की शिक्षा देने के लिए आचार्य तथा शिक्षक मुश्किल से उपलब्ध हो पाते हैं। इसीलिए आचार्य वातस्यायन ने उपरोक्त 6 प्रकार की औरतों में किसी एक औरत से कामशास्त्र की शिक्षा लेने की सलाह दी है।

     कामशास्त्र की शिक्षा के लिए इस प्रकार के निर्वाचन में विश्वास, आत्मीयता तथा पवित्रता निहित है। इस प्रकार की औरतो को सीखने और सिखाने में किसी भी प्रकार का शर्म या संकोच नहीं होता है। कामसूत्र के शास्त्रकारों ने उपरोक्त 6 प्रकार की आचार्यों का चुनाव कामशास्त्र की 64 कलाओं की शिक्षा के लिए किया है। इन 64 कलाओं की शिक्षा के लिए निरंतर अभ्यास करने की आवश्यकता होती है।

     इसके अलावा कामसूत्र के शास्त्रकारों ने यह भी सलाह दी है कि यदि किसी कारणवश सभी 64 कलाओं की शिक्षा प्राप्त करने के लिए कोई योग्य आचार्य न मिल सके, तो जितना भी समय मिले उतने ही में और आधी, तिहाई, चौथाई कलाओं को जानने वाली जो भी आचार्य मिल सके उससे कामसूत्र की कलाएं सीख लेनी चाहिए।

श्लोक -15. गीतम्1, वाद्यम्2, नृत्यम्3, आलेख्यम्4, विशेषकच्छेद्यम्5, तण्डुलकुसुमवलिविकाराः6, पुष्पास्तरणम्7, दशनवसनाड्गरागः8, मणिभूमिकाकर्म9, शयनकचनम्10, उदकवाद्यम्11, उदकाघातः12, चित्राश्च13, योगाः,माल्यग्रथनविकल्पाः14, शेखरकापीडयोजनम्15, नेपथ्यप्रयोगाः16, कर्णपत्रभंगा17, गन्धयुक्तिः18, भूषणयोजनम्19, ऐन्द्रजालाः20, कौचुमारश्च योगाः21, हस्तलाघवम्22, विचित्रशाकयूषक्ष्यविकारक्रिया23, पानकरसरागासवयोजनम24, सूचीवानकर्माणि25, सूत्रक्रीड़ा26, वीणाडमरुवाद्यानि27, प्रहेलिका28, प्रतिमाला29, दुर्वाचकयोगाः30, पुस्तकवाचनम्31, नाटकाख्यायिकादर्शनम्32, काव्यसमस्यापूरणम्33, पट्टिकावाननेत्रविकल्पाः34, तक्षकर्माणि35, तक्षणम्36, वास्तुविद्या37, रूप्यपरीक्षा38, धातुवादः39, मणिरागाकरज्ञानम्40, वृक्षायुर्वेदयोगाः41, मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधिः42, सुकसारिकाप्रलापनम्43, उत्सादने संवाहने केशमर्दने च कौशलम44, अक्षरमुष्टिकाकथनम्45, म्लेच्छितविकल्पाः46, देशभाषाविज्ञानम्47, पुष्पशकटिका48, निमित्तज्ञानम्49, यंत्रमातृका50, धारणमातृका51, सम्पाठय्म्52, मानसी काव्यक्रिया53, अधिधानकाशः54, छंदोज्ञानम्55, क्रियाकल्पः56, छलितकयोगाः57, वस्त्रगोपनानि58, द्यूतविशेषः59, आकर्षक्रीडा60, बालक्रीडनकानि61, वैनयिकीनाम्62, वैजयिकीनाम्63, व्यायामिकीना64, च  विद्यानां, इति चतुःषष्टिरंगविद्याः। कामसूत्रस्यावयावयविन्यः।।15।।

अर्थ- इसके अंतर्गत आपको उपायभूत 64 कलाओं के नाम बताये जा रहे हैं-

1. गीतम- गाना

2.  वाद्यम- बाजा बजाना

3.  नृत्यम्- नाचना

4.  आलेख्यम्- चित्रकारी

5. विशेषकच्छेद्यम्- भोजन के पत्तों को तिलक के आकार में काटना।

6. ताण्डुलकुसुमवलिविकाराः- पूजन के लिए चावल तथा रंग-बिरंगे फूलों को सजाना।

7. पुष्पास्तरणम्- घर अथवा कमरों को फूलो से सजाना।

8. दशनवसनाड्गरागः कपड़ों, शरीर और दांतों पर रंग चढ़ाना।

9.  मणिभूमिका कर्म- फर्श पर मणियों को बिछाना।

10.  शयनकचनम्- शैया की रचना।

11. उदकावाद्यम्- पानी को इस प्रकार बजाना कि उससे मुरजनाग के बाजे की ध्वनि निकले।

12. उदकाघात- जल क्रीड़ा करते समय कलात्मक ढंग से छींटे मारना।

13. चित्रयोगा- अनेक औषधियों, तंत्रों तथा मंत्रों का प्रयोग करना।

14.  माल्यग्रथनविकल्पा- विभिन्न प्रकार से मालाएं गूथना।

15.  शेखर कापीड योजनम्- आपीठकं तथा शेखरक नाम के सिर के आभूषणों को शरीर के सही अंगों पर धारण करना।

16. नेपथ्यप्रयोगाः- अपने को या दूसरे को सुंदर कपड़े पहनाना।

17. कर्णपत्रभंगः - शंख तथा हाथीदांत से विभिन्न आभूषणों को बनाना।

18. गन्धयुक्तिः- विभिन्न द्रव्यों को मिलाकर सुगंध तैयार करना।

19.  भूषणयोजनम्- आभूषणों में मणियां जड़ना।

20. ऐन्द्रजालायोगः- इन्द्रजाल की क्रीणाएं करना।

21. कौचुमारश्च योगाः- कुचुमार तंत्र में बताए गये बाजीकरण प्रयोग सौंदर्य वृद्धि के प्रयोग।

22. हस्तलाघवम- हाथ की सफाई।

23. विचित्रशाकयूषक्ष्यविकारक्रिया- विभिन्न प्रकार की साग-सब्जियां तथा भोजन बनाने की कला।

24. पानकरसरागासवयोजनम- पेय पदार्थों का बनाने का गुण।

25. सूचीवानकर्माणि- जाली बुनना, पिरोना और सीना।

26. सूत्रक्रीड़ा- मकानों, पशु-पक्षियों तथा मंदिरों के चित्र हाथ के सूत से बनाना।

27. वीणाडमरुवाद्यानि- वीणा, डमरु तथा अन्य बाजे बजाना।

28.  प्रहेलिका- पहेलियों को बूझना।

29.  प्रतिमाला- अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता का कौशल।

30. दुर्वाचकयोग- ऐसे श्लोक कहना जिनके उच्चारण तथा अर्थ दोनों कठिन हो।

31. पुस्तकवाचनम- किताब पढ़ने की कला।

32. नाटकाख्यायिकादर्शनम- नाटकों तथा ऐतिहासिक कथाओं के बारे में जानकारी।

33. काव्यसमस्यापूरणम- कविताओं के द्वारा समस्यापूर्ति।

34.पट्टिकावाननेत्रविकल्पाः- बेंत और सरकंडे आदि की वस्तुएं बनाना।

35. तक्षकर्माणि- सोने-चांदी के गहनों तथा बर्तनों पर विभिन्न प्रकार की नक्काशी।

36. तक्षणम- बढ़ईगीरी।

37. वास्तुविद्या- घर का निर्माण करना।

38. रूप्यपरीक्षा- मणियों तथा रत्नों की परीक्षा।

39. धातुवाद- धातुओं को मिलाना तथा उनका शोधन करना।

40.मणिरागाकरज्ञानम- मणियों को रंगना तथा उन्हें खानों से निकालना।

41.वृक्षायुर्वेदयोगा- पेड़ों तथा लताओं की चिकित्सा, उन्हें छोटा और बड़ा बनाने की कला।

42.मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधिः- भेड़ा, मुर्गा तथा लावको को लड़ाना।

43. सुकसारिकाप्रलापनम- तोता-मैना को पढ़ाना।

44. उत्सादने संवाहने केशमर्दने च कौशलम- शरीर तथा सिर की मालिश करने की कला।

45.अक्षरमुष्टिकाकथनम- सांकेतिक अक्षरों के अर्थ की जानकारी प्राप्त कर लेना।

46. म्लेच्छितविकल्पा- गुप्त भाषा विज्ञान।

47. देशभाषाविज्ञानम- विभिन्न देशों की भाषाओं की जानकारी।

48. पुष्पशकटिका- फूलों से रथ, गाड़ी आदि बनवाना।

49. निमित्तज्ञानम- शकुन-विचार।

50. यंत्रमातृका- स्वयं चालित यंत्रों को बनाना।

51. धारणमातृका- स्मरण शक्ति बढ़ाने की कला।

52. सम्पाठय्म- किसी सुने हुए अथवा पढे़ हुए श्लोक को ज्यौ का त्यौं दोहराना।

53. मानसी काव्यक्रिया- विक्षिप्त अक्षरों से श्लोक बनाना।

54. अधिधानकोश - शब्दकोषों की जानकारी।

55.छंदोज्ञानम- छंदों के बारे में जानकारी।

56. क्रियाकल्प- काव्यालंकार की जानकारी।

57. छलितकयोगा- बहुरूपियापन।

58.वस्त्रगोपनानि- छोटे कपड़े इस प्रकार पहने कि वह बड़ा दिखाई दे तथा बड़े कपड़े इस प्रकार पहने कि वह छोटा दिखाई दे।

59. द्यूतविशेषः- विभिन्न प्रकार की द्यूत क्रियाओं की कला।

60. आकर्षक्रीडा- पासा खेलना।

61. बालक्रीडनकानिः- बच्चों के विभिन्न खेलों की जानकारी।

62.वैजयिकीनां विद्यानां ज्ञानम- विजय सिखाने वाली विद्याएं, आचार शास्त्र।

63.वैजयिकीनां विद्यानां ज्ञानम- विजय दिलाने वाली विद्याएं तथा आचार्य कौटिल्य का अर्थशास्त्र।

64. व्यायामिकीना विद्यानां ज्ञानम - व्यायाम के बारे में जानकारी।

कामसूत्र की अंगभूत ये 64 विद्याएं हैं।

          आचार्य वात्स्यायन ने यहां पर कलाओं का वर्गीकरण नहीं बल्कि उनका परिगणन किया है। कलाओं की गणना के बारे में सबसे अधिक प्रचलित तथा प्रसिद्ध संख्या 64 है। तंत्रग्रंथों और शुक्रनीति में भी कलाओं की संख्या 64 ही है। कहीं-कहीं इन कलाओं का उल्लेख सोलह, बत्तीस, चौसठ तथा चौसठ से अधिक नाम से भी मिलता है।

          प्रसिद्ध ग्रंथ ललित विस्तार में कामकला के रूप में 64 नाम दिये गये हैं तथा कामकला के रूप में 23 नाम हैं। प्रबंधकोष के अंतर्गत इसकी संख्या 72 दी गयी है। इसके अलावा कला विलास पुस्तक में सबसे अधिक कलाओं के बारे में जानकारी दी गयी है, जिनमें से 32 धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति, 64 लोकोपयोगी कलाएं तथा 32 मात्सर्य शील प्रभाव तथा मान की है।

          लोगों को आकर्षित करने की 10 भेषज कलाएं, 64 कलाएं वेश्याओं की तथा 16 कायस्थों की कलाएं हैं। इसके अतिरिक्त गणकों की कलाओं तथा 100 सार कलाओं का वर्णन है।

          अन्य कामशास्त्रियों तथा आचार्य वात्स्यायन द्वारा बतायी गयी कलाओं पर ध्यान देने से यह जानकारी प्राप्त होती है कि उस समय के आचार्य किसी भी विषय अथवा कार्य़ में निहित कौशल को कला के अंतर्गत रखते हैं। आमतौर पर ललित तथा उपयोगी दोनों प्रकार की कलाएं कलाकोटि में परिगणित होती हैं।

          कला शब्द का सबसे पहले प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है। विभिन्न उपनिषदों में भी कला शब्द का प्रयोग मिलता है। इसके अलावा वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्वेद), सांख्यायनब्राह्मण, तैत्तरीय, शतपथ ब्राह्मण, षडविंशब्राह्मण और आरण्यक आदि वैदिक ग्रंथों में भी कला शब्द का प्रयोग मिलता है। भरत के नाट्य शास्त्र से पहले कला शब्द का अर्थ ललित कला में प्रयोग नहीं हुआ था। कला शब्द का वर्तमान अर्थ जो है उस अर्थ का द्योतक शब्द शास्त्र से पहले शिल्प शब्द था।

          संहिताओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में शिल्प शब्द कला के अर्थ में प्रयोग किया जाता रहा है। पाणिनी द्वारा रचित अष्टाध्यायी तथा बौद्ध ग्रंथों के अंतर्गत शिल्प शब्द उपयोगी तथा ललित दोनों प्रकार की कलाओं के लिए होता है।

          आचार्य वात्स्यायन ने कामसूत्र की जिन 64 कलाओं का वर्णन किया है। उन्हें कामसूत्र की अंगभूत विद्या कहते हैं।

          आचार्य वात्स्यायन ने कामसूत्र में जिन 64 कलाओं का वर्णन किया है। उन सभी कलाओं के नाम का उल्लेख यजुर्वेद के तीसवें अध्याय में किया गया है।

          यजुर्वेद के इस अध्याय में 22 मंत्रों का उल्लेख किया गया है जिनमें से चौथे मंत्र से लेकर बाइसवें मंत्र तक उन्हीं कलाओं तथा कलाकारों के बारे में जानकारी दी गयी है।

श्लोक-16. पान्चालिकी च चतुःषष्टिरपरा। तस्याः प्रयोगानन्ववेत्य सांप्रयोगिके वक्ष्यामः।। कामस्य तदात्मकत्वात।।16।।

अर्थ- पहले वर्णित 64 कलाओं से भिन्न पांचाल देश की 64 कलाएं हैं। वे पांचाली कलाएं कामात्मक हैं, इसलिए उनका वर्णन आगे साम्प्रयोजिक अधिकरण में किय़ा गया है।

श्लोक-17. आभिरभ्युच्छ्रिता वेश्या शीलरूपगुणान्विता। लभते गणिकाशब्दं स्थानं च जनसंसदि।।17।।

अर्थ- गुणशील तथा रूप संपन्न वेश्या इन कलाओं के द्वारा उत्कर्ष प्राप्त कर गणिक का पद प्राप्त करती है और समाज में आदर प्राप्त करती है।  

श्लोक-18. पूजिता या सदा राज्ञा गुणवद्धिश्च संस्तुता। प्रार्थनीयाभिगम्या च लक्ष्यभूता च जायते।।18।।

अर्थ- इन गणिकाओं का सम्मान राजा करता है, उसकी प्रशंसा गुणवान लोगों के द्वारा होती है। आम लोग उससे कलाएं सीखने के लिए प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार से वह सभी का केन्द्र विन्दु बन जाती है।

श्लोक-19. योगज्ञा राजपुत्री च महामात्रसुता तथा। सहस्त्रान्तःपुरमपि स्वनशे कुरुते पतिम्।।19।।

अर्थ-  राजाओं और मंत्रियों की जो पुत्रियां कामसूत्र की 64 कलाओं का ज्ञान प्राप्त कर लेती हैं। वे हजारों स्त्रियों से सेक्स करने की क्षमता रखने वाले पुरुष को भी वश में कर लेती हैं।

श्लोक-20. तथा पतियोग च व्यसनं दारुणा गता। देशोन्तरेऽपि विद्याभिः सा सुखेनैव जीवति।।20।।

अर्थ- ऐसी स्त्रियां किसी कारणवश पति से विमुक्त होने पर या किसी संकट में फंस जाने पर उसे अंजान जगह पर जाना पड़े तो वह अपनी कामसूत्र की 64 कलाओं के द्वारा अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत कर सकती है।

श्लोक-21. नरः कलासु कुशलो वाचालश्चाटुकारकः। असंस्तुतोऽपि नारीणां चित्तमाश्चेव चिन्दति।।21।।

अर्थ- ऐसी स्त्रियों की कला की विशेषता बताने के बाद पुरुषों के गुणों के बारे में बताया जा रहा है। बातचीत करने में निपुण, चाटुकार पुरुष यदि कुशल कलाकार हो तो अपने से घृणा करने वाली स्त्रियों का मन भी आकर्षित कर लेता है।

श्लोक-22. कलानां ग्रहणादेव सौभाग्यमुपजायते। देशकालौ त्वपेक्ष्यासां प्रयोगः संभवेत्र वा।।22।।

अर्थ- कलाओं की जानकारी प्राप्त कर लेने से ही सौभाग्य जागृत हो जाता है लेकिन देश तथा समय प्रतिकूल न हो तो इन कलाओं के प्रयोगों की सफलता में आशंका हो जाती है।

"इति श्री वात्स्यायनीये कामसूत्रे साधारणे प्रथमेऽधिकरणे विद्या समुद्देशस्ववीयोऽध्यायः"

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय