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नागरकवृन्त प्रकरण 2

श्लोक (15) पक्ष्सय मासस्य वा प्रज्ञातेऽहनि सरस्वत्या भवने नियुक्तानां नित्यं समाजः।।

अर्थ- पहली सूचना के मुताबिक 15वें दिन या एक महीनें में निश्चित दिन में सरस्वती के मकान में नागरकगण इकट्ठा हो।

श्लोक (16) कुशीलवाश्चागंतवः प्रेक्षणकमेषां दद्युः। द्वितीयेऽहनि तेभ्यः पूजा नियतं लभेरन्। ततो यथाश्रद्धमेषां दर्शनमुत्सगर्गो वा। व्यसनोत्सवेषु चैषां परस्परस्यैककार्यता।।

अर्थ- स्थायी नियुक्त नट, नर्तक आदि कलाकार समाज उत्सव में भाग लें। बाहर से आए हुए नट, नर्तक भी दर्शकों को अपनी कला-कुशलता का परिचय दें तथा दूसरे दिन वे सही पुरस्कार हासिल करें। इसके बाद अगर नागरिकों में उनके प्रति सम्मान का भाव हो तो उन्हे कला-प्रदर्शन के लिए रोका जा सकता है। आगंतुक कलाकारों तथा स्थानीय कलाकारों में आपसी सहयोग तथा एकता की भावना होनी चाहिए।

दुर्वाचनयोग-

          इसमें ऐसे मुश्किल शब्दों के श्लोक हुआ करते थे जिन्हे आसानी से पढ़ा नहीं जा सकता था।

श्लोक (17)- आगन्तूनां च कृतसमवायानां पूजनमभ्युपत्तिश्च। इति गणधर्मः।।

अर्थ- समाज उत्सव देखने के लिए सरस्वती भवन में आयोजित अगर ऐसे लोग आएं जो गोष्ठी के सदस्य न हो तथा बाहर से आए हुए हो तो उनकी अभ्यर्चना तथा मेहमानों का सत्कार यथाविधि करना चाहिए। किसी तरह की मुसीबत आने पर उनकी मदद भी करनी चाहिए। इसी गणधर्म होता है।

          आचार्य वात्स्यायन के समयमें 5 तारीख की रात को सरस्वती जी के मंदिर में समाजोत्सव मनाया जाता था। उस समय के उत्सवों में इस पहले दर्जे का उत्सव माना जाता था।

          इन उत्सवों के समय बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ हुआ करती थी। इन उत्सवों में वहां के नट-नाटियों के अलावा बाहर से भी नट-नाटियां, नर्तक, कुशीलव आदि अपनी-अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए आया करते थे। हर कलाकार अपनी कला द्वारा दर्शकों को खुश तथा मंत्रमुग्ध करने की कोशिश करता था। बाहर से आए हुए कलाकारों के रुकने के लिए भोजन आदि के प्रबंध का कार्य एक-एक व्यावसायिक श्रेणी पर छोड़ दिया जाता था। 5 तारीख (पंचमी) के अलावा अन्यान्य देवालयों में इस तरह का समावजोत्सव मनाया जाता था।

          समाज आर्य जाति का बहुत ही पुराना और संभवतः आदि उत्सव है। वैदिक काल में समाज का नाम समन था जिसे एक तरह का मेला कहा जाता था। इन समनों के अंतर्गत पुरुषों के अलावा स्त्रियां भी आती थी जो दिल बहलाने के लिए काफी संख्या में उपस्थित होती थी। कवि, धनुर्धर और रेस के घोड़े भी इनाम पाने की हसरत रखकर वहां पर पहुंचते थे। इनके अलावा गणिकाएं भी नाम और धन पाने की हसरत रखकर अपनी कला दिखाने के लिए वहां पर पहुंचा करती थी।

           इस मेले की एक खासियत यह थी कि इसमें अपना मनचाहा वर पाने के लिए वयस्क कुमारी कन्याएं काफी संख्या में भाग लेती थी। यह मेला पूरी रात चलता था।

          कामसूत्र तथा उससे पहले परिवर्ती साहित्य के अध्ययन से यह पता चलता है कि समाज उत्सव पहले निर्दोष आमोद-प्रमोद का एक सामुदायिक आयोजन था। बाद में इसका एक दूसरा रूप भी बन गया जिसके अंतर्गत शराब पीना, मांस खाना, केलि-क्रीड़ाएं भी होने लगी।

          इस प्रसंग में गणभोज की भी व्यवस्था की गई थी जिसमें कई प्रकार के व्यंजन, अनाज और सब्जियां आदि बनी हुई थी। इनके साथ मांस का भी पूरा प्रबंध होता था। भगवान ने उन मल्लों को महंगे कपड़े तथा मुद्राएं देकर सम्मानित किया था।

          कदाचित हिंसामूलक खाने वाले पदार्थों तथा चरित्रहीनता बढ़ने के कारण प्रियदर्शी अशोक ने अपने शिलालेखों में ऐसे शिलालेखों में ऐसे समाजोत्सव की निंदा की है।

श्लोक (18)- एतेन तं तं देवताविशेषमुद्दिश्य संभावितस्थितयो घटा व्याख्याताः।

अर्थ- इस प्रकार, शिव, सरस्वती, यज्ञ, कामदेव आदिदेवताओं के आलयों में यथासंभव जुटने वाली सामुदायिक गोष्ठियों-मेलों का विवरण पेश किया है।

श्लोक (19)- गोष्ठीसमवायमाह

वेश्याभवने सभायामन्यतमस्योद्वसिते वा समानविद्याबुद्धिशीलवित्तवयसां सह वेश्याभिरनुरुपैरालापैरासनबंधो गोष्ठी।

अर्थ- इसके अंतर्गत गोष्ठी समवाय की व्याख्या की गई है-

          बुद्धि, संपत्ति, विद्या, उम्र और शील में अपने समान मित्रों, सहचरों के साथ वेश्या के घर में, महफिल में अथवा किसी नागरिक के निवास स्थान पर गोष्ठी समवाय का आयोजन करना चाहिए।

श्लोक (20)- तत्र चैषां काव्यसमस्या कलासमस्या वा।

अर्थ- वहां सुयोग्य वेश्याओं के साथ बैठकर मधुर तथा मनोरंजक बातचीत करें। काव्य व अन्य बौद्धिक, साहित्यिक गोष्ठियों में भाग लेकर काव्य चर्चा, कला चर्च तथा साहित्य चर्चा करें। साहित्य, संगीत और कला जैसे विषयों पर आलोचनात्मक, तुलनात्मक चिंतन किया जाना चाहिए।

श्लोक (21)- तस्यामुज्ज्वला लोककान्ताः पूज्याः। प्रीतिसमानाश्चाहारितः।

अर्थ- और इस प्रकार की गोष्ठी समवाय में सम्मिलित प्रतिभाशाली कलाकार का अच्छा सम्मान करना चाहिए और बुलाए गए मेहमानों तथा कलाकारों का खासतौर पर सम्मान करना चाहिए।

श्लोक (22)- परस्परभवनेषु चापानकानि।।

अर्थ- एक-दूसरे के घर पर जाकर सुरापान, मैरेथ और मधु का पान करना चाहिए।

श्लोक (23)- तत्र मधुमैपेसुरावान्तिविधलवणफलहरितशाकतिक्तकटुकामलोपदंशान्वेश्याः पाययेयुरनुपिबेयुश्च।।

अर्थ- इसके अंतर्गत मधु, मैरीय, सुरा और आसव आदि शराबों को अनेक प्रकार के लवण, फल, हरी सब्जियां, चरपरे, कड़वे तथा खट्टे मसालों के साथ नागरिकों को वेश्याओं को स्वंय ही पिलाना चाहिए तथा इसके बाद खुद पीना चाहिए।

श्लोक (24)- एतेनोद्यानगमनं व्याख्यातम्।।

अर्थ- इस तरह से उद्यान यात्रा में भी समापानक होना चाहिए। अंगूर अथवा दाख के रस से जो शराब बनाई जाती है उसे मधु कहा जाता है। इसके कापिशायन तथा हारहूरक ये 2 नाम और है। भारत का रसिक रईस मधु शराब को साफ करवाकर पीता था।

          मरोड़ की फली, पलाश, छोह, भारक, मेढ़ासिंगी, करंजा, क्षीरवर्ग के कदि की भावना दिया गया खादार शक्कर का चूरा और उसका आधा लोध, चीता, वायविडंग, परम, मोथा, कलिंग, जौ, दारुहल्दी, कमल, सौंफ, चिचिड़ा, सतपर्ण आक का फूल को एकसाथ पीसकर चूर्ण बनाकर इकट्ठा करके एक मुट्ठी मसाला एक सारी परिमाण शराब में डालकर शराब को इस प्रकार साफ बनाया जाता था कि पीने वाले खुश हो जाते थे। कभी-कभी स्वाद को बढ़ाने के लिए इसमें 5 पल राब भी मिला दी जाती थी।

          मैरेय शराब को तैयार करने के लिए मेढ़ासिंगी की छाल का काढ़ा बनाया जाता था और फिर उसमें गुड़, पीपल और कालीमिर्च को मिलाया जाता था। कभी-कभी पीपल की जगह त्रिफला का प्रयोग कर लिया जाता था।

उस समय में सुरा (शराब) 4 प्रकार की होती थी-

    सुरा,
    रसोत्तरा,
    सहकार,
    बीचोत्तरा तथा सम्भारकी

    साधारण सुरा (शराब) में अगर आम का रस निचोड़ दिया जाता था तो वह सहकार सुरा बनती थी।
    अगर साधारण सुरा में गुड़ की चाशनी निचोड़ दी जाती है तो वह रसोत्तर शराब बनती है।
    साधारण सुरा में बीजबंध बूटियां छोड़ देने पर महासुरा बनती है।
    मुलहठी, दूध, केशर, दारुहल्दी, पाठा, लोध, इलायची, इत्र फुलेल, गजपीपल, पीपल और मिर्च आदि को साधारण सुरा में मिला देने से सम्भारिकी सुरा बनती थी।

          आसव को बनाने में 100 पल कैथे का सार, 500 पल राब और एक प्रस्थ शहद का प्रयोग किया जाता था। इसमें पड़ने वाला मसाला, दालचीनी, चीता, गजपीपल, वायविडंग 1-1 कर्ष और और 2-2 कर्ष सुपारी, मुलहठी, लोघ और मोथा लेकर आसव में मिलाया जाता था।

          इन शराबों को पीने के साथ-साथ कई तरह के लवण, सब्जी के अलावा खट्टे-मीठे, चरपरे पदार्थ खाए जाते थे। आचार्य वात्स्यायन नें ऐसे पदार्थों को उपदंश लिखा है। उपदंश शब्द का अर्थ लिखते हुए हलायुध कोष ने कहा है कि मद्यपान रोचक भोज्य द्रव्यम अथवा शराब पीने के सहाये रोचक भोज्य पदार्थ।

          आषानक गोष्ठियों में वेश्याओं की उपस्थिति अपेक्षित मानी जाती थी। वे रसिक नागरक को चषक भरकर शराब पिलाती तथा स्वयं भी पिया करती थी। उद्यान यात्राओं में भी गणिकाएं साथ जाया करती थी और वहां भी मद्यपान होता था।

श्लोक (25)- पूर्वाह्ण एव स्वलंकृतास्तुरगाधिरूढ़ा वेश्याभिः सह परिचारकानुगता गच्छेयुः। दैवसिकीं च यात्रां तत्रानुभूय कुक्कुटयुद्धद्यूतेः प्रेक्षाभिरनुकूलैश्च चेष्टितैः कालं गमयित्वा अपराह्णे गृहीततदुद्यानोपभोगाचिह्नास्तथैव प्रत्याव्रजेयुः।।

अर्थ- इसके अंतर्गत क्रीड़ा उत्सवों और क्रीड़ाओं के बारे में बताया जाता है-

          सुबह-सुबह ही गहने-कपड़े पहनकर तथा घोड़े पर सवार होकर गणिकाओं और सेवकों को साथ लेकर उद्यान यात्रा पर जाना चाहिए। यह उद्यान यात्रा इतनी दूर की होनी चाहिए कि शाम तक वापिस पहुंच जाए। उद्यान में जाकर रोजाना के कामों से निपटकर लावक तथा मेढ़ों की बाजी लगाई गई लड़ाईयां देखें, नृत्य नाटक देखें, जुआ खेलें, संगीत का आनंद लें, मनोरंजक खेलों को खेलें। शाम से पहले उद्यान यात्रा के स्मृति-चिन्ह फल, फूल, पत्ते, स्तबक आदि लेकर जिस तरह आए थे उसी तरह घर पर वापिस लौटना चाहिए।

श्लोक (26)- एतेन रचितोदग्राहोदकानां ग्रीष्मे जलक्रीडागमनं व्याख्यातम्।।

अर्थ- इस तरह गर्मी की जल क्रीड़ाओं में लीन हो जाना चाहिए। गर्मी के मौसम का उत्तम मनोविनोद जल-क्रीडा़ होता है। जिस समय जमीन और आसमान तेज लू से धधकने लगते थे, उस समय पुराने भारत का श्रीमंत नागरक सर्पनिर्भीक के बराबर महीन वस्त्रों, सुगंधित कपूर का चूर्ण, चंदन का लेप तथा पाटल-फूलों से सुसज्जित धारागृह का प्रयोग दिल खोलकर करता था।

          जब विलासनियां गृह वापिकाओं में जल-क्रीड़ा किया करती थी तो कान में घुसाए हुए शिरीष-कुसुम पानी में छा जाते थे। चंदन तथा कस्तूरिका के आमोद से और नाना रंग के अंगरागों से तथा श्रंगार-साधनों से पानी रंगीन हो जाता है।

          जल-स्फलन से पैदा हुए जल बिंदुओं से आसमान में मोतियों की लड़ी बिछ जाती थी। तालाब के अंदर से गूंजते हुए मृदंग घोष को, बादल के स्वर जानकर, सोचे-विचारे मयूर उत्सुक हो उठते थे। बालों से खिसके हुए अशोक-पल्लवों से कमल-दल चित्रित हो उठते थे तथा आनंद कल्लोल से दिकमण्डल मुखरित हो उठता था। प्राचीन चित्रों के द्वारा यह जलकेलि, मनोरम भाव अंकित है।

श्लोक (27)- यक्षरात्रिः। कौमुदीजागरः। सुवसंतक।।

अर्थ- इसके अंतर्गत समस्या क्रीड़ाओं का परिचय दिया जाता है-

यक्षरात्रि कौमुदी जागर तथा सुनसंतक उत्सवों में समस्या क्रीड़ाएं रचाई जाती है-

          आचार्य वात्स्यायन के समय में यज्ञ रात का उत्सव का आयोजन किया जाता था। दीपावली उत्सव का उल्लेख पुराणों, धर्मसूत्रों, कल्पसूत्रों में विस्तृत रूप से मिलता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि कामसूत्र के अंतर्गत दीपावली का कोई उल्लेख न होकर रात के यज्ञ का जिक्र किया गया है। रात्रि यज्ञ से इस बात का पता चलता है कि उस समय, उस दिन यज्ञ की पूजा होती रही होगी तथा द्यूत-क्रीड़ा रचाई जाती है।

          अगर व्याकरण का आधार लेकर अर्थ निकाला जाए तो यज्ञ यते पूज्यते इतियज्ञ-छञ-यज्ञः तथा यज्ञ रात्रि निष्पन्न होता है।

          मुनकिन है इसी अर्थ को लेकर दीपावली का नाम उस समय यज्ञरात्रि रखा गया हो। पुराने समय में शायद दीपावली उत्सव शास्त्रीय अथवा धार्मिक रूप में नहीं मनाया जाता रहा है क्योंकि वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों के अंतर्गत इसका कोई विवरण नहीं है। स्कन्दपुराण तथा पद्मपुराण में इस पर्व का पूरा विवरण पाया जाता है। उसी के आधार पर दीपावली के उत्सव का प्रचलन अब तक है। कार्तिक की अमावस्या के साथ यज्ञ शब्द जोड़ने का तात्पर्य श्रीसूक्त से साफ हो जाता है। श्रीसूक्त ऋग्वेद के परिशिष्ट भाग का एक सूक्त है। इस सूत्र के एक मंत्र में मणिना सह कहा गया है।

          इस वाक्य से पता चल जाता है कि लक्ष्मी का संबंध मणिभद्र यज्ञ से है। मणिभद्र यज्ञ से लक्ष्मी का घनिष्ठ संबंध होने से कामसूत्र के समय तक दीपावली की रात यज्ञरात्रि कहलाती है।

          निसंदेह इतना तो कहा जा सकता है कि दीपावली का आधुनिक रूप में जो प्रचलन है वह ईसवीं तीसरी शती के बाद से शुरू होता है और आचार्य वात्स्यायन के समय इसी के पहले सुनिश्चित है। यह अनुमान किया जा सकता है कि वात्स्यायन के समय में कार्तिक की अमावस्या की रात में लक्ष्मी को पूजने और द्यूत-क्रीड़ा की प्रथा रही होगी।

कौमुदी जागरण-

          उत्सव अनुमानतः शुरू में विशुद्ध  लोकोत्सव रहा होगा क्योंकि संहिताओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में आश्विन पूर्णिमा को बिल्कुल भी महत्व नहीं दिया गया है।

          आश्विन पूर्णिमा की रात में होने वाला यह उत्सव पालि ग्रंथों में कौमदीय-चातुमासनीय छन बतलाया गया है। यह उत्सव मौसम बदलाव के लिए मनाया जाता था। कामसूत्रकार ने इसी को कौमुदी जागरण लिखा है।

          गहसूत्रों में अश्वयुज की पू्र्णिमा को काफी महत्व दिया गया है। गहसूत्रों के द्वारा पता चलता है कि इन उत्सव के मौके पर उस वर्ण के लोग भड़कीले कपड़े पहनकर बड़े उल्लास के साथ अश्वयुजी उत्सव मनाते थे। पशुपति, इंद्र, अश्विन आदि देवताओं को खुश करने के लिए यज्ञ हवन भी किए जाते थे तथा खीर का भोग लगाया जाता था।

          आर्यशूर के द्वारा लिखित जातक माला में शिविराज्य की राजधानी में उस दिन नगर भर में चहल-पहल रहती थी। सड़को, चौमुहनियों में पानी का छिड़काव किया जाता था, उन्हे सजाया-संवारा जाता था। साफ-सुथरे धरातल पर फूल बिखेर दिए जाते थे। चारों तरफ झंडे, पताका तथा वन्दनवार लहराए जाते हैं। जगह-जगह पर नृत्य-नाटक, गीत वाद्य के जमघट लगे होते थे।

          मात्स्य सूक्त के द्वारा सुवसंतक के दिन ही बसंत ऋतु का अवतरण होता है। इसी रोज मदन की पहली पूजा होती है। वसन्तावतार को आजकल वसन्तपंचमी कहा जाता है। सरस्वती कण्ठाभरण से पता चलता है कि सुवसंतक के दिन विलासिनियां कण्ठ में कुवलय की माला तथा कानों में दुष्प्राप्य नवआम्रमंजरी खोसकर गांव को रोशन कर देती है।

          ऋतुसंहार से यह पता चलता है कि बंसत का मौसम आते ही विलासिनियां गर्म कपड़ो का भार उतार फैंकती थी। लाक्षा रंग अथवा कुंकुम से रंजित और सुगंधित कालगुरू से सुवासित हल्की लाल साड़िया पहनती थी। कोई कुसुंभी रंग से रंगे हुए दुकूल धारण करती थी तथा कोई-कोई कानों में नए कर्णिकार के फूल, नील अलकों में लाल अशोक के फूल तथा स्तनों पर उत्फुल्ल नवमल्लिका की माला पहनती थी।

          गरुण पुराण के इन सुझावों से यह पता चलता है कि यह एक व्रत है जो समूह से संबंधित न होकर व्यक्ति से संबंधित है।

श्लोक (28)- सहकारभज्जिका, अभ्यूषखादिका, बिसखादिका, नवपत्रिका, उदकक्ष्वेडिका, पाञ्ञालानुयानम्, एकशाल्मली, कदम्बयुद्धानि, तास्ताश्च क्रीडा जनेभ्यो विशिष्टामाचरेयुः। इति संभूयक्रीड़ाः।।

अर्थ- इसके अंतर्गत दूसरे क्षेत्रीय क्रीड़ाओं का वर्णन किया जाता है-

          सहकार भन्जिका, अभ्यूपखादिका, विसखादिका, नवपत्रिका, उदकक्ष्वेडिका, पान्चालानुयान, एकशाल्मलि कदम्बयुद्ध- इन स्थानीय तथा सार्वदेषिक क्रीड़ाओं में नागरक लोग अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार ही खेलें। सामूहिक क्रीड़ाओं का वर्णन खत्म होता है।

          आचार्य वात्स्यायन ने बसंत के मौसम में खेली जाने वाली क्रीड़ाओं के नाम यहां पर बताए हैं। कामसूत्र की जयमंगला टीका में उनके अलावा उद्यान यात्रा, खलिल क्रीड़ा, पुष्पावचयिका, नवाम्रखादनिका और आम तथा माधवीलता का विवाह- इन क्रीड़ाओं को बसंत के मौसम में उसके बाद निदाध में खेलने का समर्थन किया गया है।

    इसके अंतर्गत आचार्य वात्स्यायन एकांकी व ऐश्वर्यहीन नागरिकों के मनोरंजन का सुझाव पेश कर रहे हैं-

श्लोक (29)- एकचारिणश्च विभवसामर्थ्याद्।।

अर्थ- दुर्भाग्यवश नागरिकों से रहित नागरक अगर अकेले में विचार करता है तो वह अपनी ताकत के अनुकूल ही क्रीड़ा करे।

श्लोक (30)- गणिकाया नायिकायाश्च सखीभिर्नागरकैश्च सह चरितमेतने व्याख्यातम्।।

अर्थ- इसी तरह से एकांकिनी हो जाने पर गणिकाएं तथा नायिकाएं भी नागरिकों तथा सहेलियों के साथ मौसम संबंधी क्रीडा़एं करें।

श्लोक (31) अविभवस्तु शरीरमात्रो मल्लिकाफेनककषायमात्रपरिच्छदः पूज्याद्देशादागत कलासु विचक्षणस्तदुपदेशेने गोष्ठयां वेशोचिते च वृत्ते साधयेदात्मानमिति पीठमर्दः।।

अर्थ- इसके अंतर्गत उपनागरकों का परिचय देते हुए उनके आचरण के बारे में बताया गया है-

          किसी सांस्कृतिक स्थान से आया हुआ कालाविचक्षण नागरिक अगर गरीब हो, उसके पास मल्लिका, फेनक तथा कषाय मात्र ही बाकी बचे हो तो वह नागरिकों की संभाओं, उत्सवों में जाकर और वेश्याओं के यहां जाकर उनको हितकर उपदेश देकर अपनी जीवीका कमानी चाहिए। उनका आचार्य बनकर पीठमर्द पदवी हासिल करनी चाहिए।

          आचार्य वात्स्यायन के मुताबिक अमीर-गरीब समुदाय, सम्पन्न अथवा एकांकी सभी लोगों को मौसम संबंधी मनोरंजनों और उत्सवों में भाग लेना चाहिए। इससे भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का मूल उद्देश्य तथा स्वरूप आसानी से समझा जा सकता है।

          कामसूत्र की गवाही से जान पड़ता है कि भारतीय संस्कृति तथा साहित्य में असुंदर तथा विद्रोह का भाव कहीं भी नहीं है। भारतीय नागरिक पुनर्जन्म तथा कर्मफल के सिद्धांतों को स्वीकार कर सांसरिक विधान के साथ सामन्जस्य बनाए रखने के लिए कोशिश करता है। वह दुख में भी असंतुष्ट अथवा फिक्रमंद नहीं हुआ करता क्योंकि उसकी मान्यता है कि मनुष्य अपने कामों का फल भोगने के लिए ही जन्म लेता है।

          हमारी सभ्यता मनोविनोदों, उत्सवों, नृत्यो-नाटकों को सिर्फ मनोरंजन का साधन ही नहीं मानती बल्कि अर्थ, धर्म, काम तथा मोक्ष की प्राप्ति का मुख्य साधन समझती है। यही वजह है कि वात्स्यायन ने हर व्यक्ति को चाहे वह जिस स्थिति का, जिस वर्ग अथवा रंग का हो, उत्सवों, मनोविनोदों में भाग लेने का सुझाव दिया है।

श्लोक (32)- भुक्तविभवस्तु गुणवान् सकलत्रो वेशे गोष्ठयां च बहुमतस्तदुपजीवी च विटः।।

अर्थ- जो व्यक्ति संपन्न नागरिकों के सभी सुखों का उपभोग कर चुका हो लेकिन किसी वजह हे विभवहीन हो गया हो और सभी नागरक गुणों से संपन्न है, कलावान है, गणिकाओं तथा नागरकों के समाज में लब्धप्रतिष्ठ है, वह वेश्याओं तथा नागरकों के संपर्क से जीविका चलाएं। ऐसा आदमी विट कहलाता है।

श्लोक (33)- एकदेशविद्यस्तु क्रीडनको विश्चास्यश्च विदूषकः। वैहासिको वा।

अर्थ- लेकिन जो लोग किसी कला अथवा विद्या में पूरी हासिल किए हो वह अधूरा कलाकार लोगों के बीच खिलौना बना रहता है। कदाचित वह विश्वस्त हुआ दो विदूषक कहलाएगा अथवा हंसाते रहने की वजह से वैहासिर भी कहा जाता है।

श्लोक (34)- एते वेश्यानां नागरकाणां च मन्त्रिणः सन्धिविग्रहनियुक्ताः

अर्थ- ऐसे लोग वेश्याओं तथा नागरिकों के बीच संधि-विग्रहिक बनते हैं।

श्लोक (35)- तैर्भिक्षुक्यः कलाविदग्धा मुण्डा वृषल्यो वृद्धगणिकाश्च व्याख्याताः।।

अर्थ- विट-विदूषक की तरह कला निपुण भिक्षुकी नायक तथा नायिका के बीच संधि-विग्रहिक बनकर जीवन बिता सकती है।

          उपर्युक्त 3 सूत्रों द्वारा आचार्य वात्स्यायन ने पीठमर्द, विट, विदूषक और इन्ही की तरह भिक्षुणी, बांझस्त्री, विधवा, बूढ़ी वेश्या आदि के जीवनयापन का विधान बताया है।

          सुख-संपन और निर्धन नागरिकों के इस वर्गीकरण से वात्स्यायन कालीन समाज व्यवस्था का सचित्र परिचय प्राप्त होगा। इसके अंतर्गत कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं किया गया है कि उच्च वर्ण के लोग ज्यादा समृद्ध होते थे और नीच वर्ण के लोग कम।

           ऐसा लगता है कि समृद्ध होने के बाद श्रेष्ठी अथवा सामन्त पदवी हासिल हो जाती थी, शुद्र पद विलीन हो जाता था। ब्राह्मण सिर्फ वेद पाठी ही नहीं होते थे बल्कि देश-देशान्तर का व्यापार करके श्रेष्ठि भी बन जाते थे। क्षत्रियों की भी बात यही है कि वे सिर्फ राजा या योद्धा ही नहीं होते थे बल्कि उच्चकोटि के व्यवसायी तथा सेठ भी होते थे।

          मृत्षकटिक नाटक की गवाही के अंतर्गत जाना जाता है कि चारुदत ब्राह्मण होते हुए भी श्रेष्ठि-चत्वर में वास करता है तथा सभी कलाओं का समादरण करने वाला उत्तम नागरिक है। गरीब हो जाने पर भी वसन्तसेना जैसी अनिन्ध सुंधरी, गणिका तथा सभी नागरिकों के प्रेम तथा श्रद्धा का भाजन बना रहता है।

          आचार्य वात्स्यायन द्वारा बताई गई विट की परिभाषा का मनुष्य मृच्छकटिक का एक दूसरा ब्राह्मण है जो विट कहा जाता है। राजा के साले की चापलूसी करता है, गणिकाओं का सम्मान करता है और उन्हे खुश रखता है।

श्लोक (36)- ग्रामवासी च सजातान्विचक्षणान् कौतूहलिकान् प्रोत्साह्या नागरकजनस्य वृत्तं वर्णयञ्श्रद्धां च जनयंस्तदेवानुकुर्वीत। गोष्ठीश्च प्रवर्तयेत्। संगत्या जनमनुरञ्ञयेत। कर्मस च साहाय्येन चानुगृह्णीयात्। उपकारयेच्च। इति नागरकवृत्तम्।।

अर्थ- इसके अंतर्गत गांव के लोग नागरक के वृत्त का वर्णन करते हैं-

          अगर नागरक गांव में जीवनयापन करने या किसी दूसरे मकसद को पूरा करने के लिए निवास करता है तो संजातीय, बुद्धिमान तथा जादू, खेल-तमाशा जानने वाले लोगों को रोचक घटनाएं सुनवाकर अपना भक्त बना लें तथा नागरक जीवन बिताने के लिए उन्हे प्रोत्साहित करें।

          उनके मनोरंजन के लिए उत्सवों और यात्राओं का आयोजन किया जाए, अपने संपर्क से उन्हें प्रमुदित बनाकर रखें। उनके काम में सहायता प्रदान करें तथा उन पर अनुग्रह करता रहें। यहां पर नागरकवृत्त का प्रकरण समाप्त होता है।

          नागरकवृत्त से इस बात का पता चलता जाता है कि उस समय की भारतीय प्रजा, ऐश्वर्य, समृद्धि तथा पौरुष संपन्न थी। सुंदरता तथा सुकुमारता की रक्षा करने में हमेशा जागरुक रहती थी। योग तथा भोग, प्रवृत्ति तथा निवृ्त्ति का सामन्जस्य तथा संतुलन बनाए ऱखने में पूरी तरह काबिल और सावधान थी। उसका अपना भी दृष्टिकोण व जीवन दर्शन था जिसके द्वारा वह इन्द्रियों की वृ्त्ति को पाशविकता की तरफ उन्मुख नहीं होने देती थी।

श्लोक (37)- नात्यंत संस्कृतेनैव नात्यंत देशभाषया। कथां गोष्ठीषु कथयंल्लोके बहुमतो भवेत्।।

अर्थ- इसके अंतर्गत गोष्ठियों में भाषा तथा संभाषण संबंधी नियमों की व्याख्या करते हैं-

          सभाओं तथा गोष्ठियों में न सिर्फ संस्कृत में ही बोला जाए और न ही सिर्फ भाषा में। ऐसा करने से वक्ता सर्वमान्य तथा सर्वसम्मानित नहीं हो सकता है।

श्लोक (38)- या गोष्ठी लोकविद्विष्टा या च स्वैरविसर्पिणी. परहिंसात्मिका या च न तामवतरेद्वधः।।

अर्थ- जिस गोष्ठी में जलने वाले लोग रहते हों तथा जहां पर स्वच्छंद कार्यवाही होती हो और दूसरों पर इल्जाम लगाए जाते हो या दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जाती हो उस गोष्ठी में बुद्धिमान व्यक्ति को नहीं जाना चाहिए।

श्लोक (39)- लोकचित्तानुवर्तिन्या क्रीडामात्रैकाकार्यया। गोष्ठया सहचरन्विद्वांल्लोके सिद्धि नियच्छति।।

अर्थ- जो लोग इस प्रकार की गोष्ठियों से ताल्लुक रखते हों, जो जनरुचि का प्रतिनिधित्व करते हो और जिस जगह पर सिर्फ विनोदों या मनोरंजनों का ही माहौल रहता हो वह व्यक्ति कामयाबी और ख्याति को प्राप्त कर सकता है।

          आचार्य वात्स्यायन के भाषा संबंधी विचार बहुजनहिताय है। वह जन समाज के बीच न तो कठोर पाण्डित्य चाहता है और न ही गंवारपन। उनकी भाषा नीति मध्यम वर्ग का अवलंबन करती है। वात्स्यायन द्वारा हजारों साल पहले निर्धारित की हुई भाषानीति आज के भाषा विवाद के लिए एक उपाय है।

          आचार्य वात्स्यायन के समय में संस्कृतनिष्ठ, सुशिक्षित अथवा साहित्य की भाषा रही है तथा प्राकृत जनभाषा रही है। संस्कृत के साथ-साथ जनभाषा में भी साहित्य का प्रणयन उस समय होता रहा है।

          आचार्य वात्स्यायन ने नियम बताया है कि सभाओं तथा गोष्ठियों में साधारणतयः शाम का ही उपयोग किया जाए जो कि आसान सुबोध होने के साथ ही साहित्यिक गुणों से भी संपन्न हो। गोष्ठियों में भाग लेने, भाषण देने का आयोजन ख्याति तथा लोकप्रियता हासिल करना है।

          बुद्धिमान लोगों को इस प्रकार के उत्सवों में जाना चाहिए जो लोकचित्तानु वर्तिनी हों। जहां अपने दिल के बोझ को उतारकर दिल और दिमाग के लिए बौद्धिक खुराक हासिल की जा सके। आनन्ददायक सौहार्दमय तथा स्नेहमय माहौल हो। ऐसे माहौल मे संपन्न हर क्रिया, हर विचार तथा भावना फलवती हो सकती है। इसके साथ ही कामयाबी और ख्याति भी अनुगमन करती है।

श्लोक- इति श्री वात्स्यायनीये कामसूत्रे साधारणे, प्रथमेऽधिकरणे नागरक वृत्तं चतुर्थोऽध्याय।।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय