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नागरकवृन्त प्रकरण 1

रसिकजन के कार्य

नागरकवृन्त प्रकरण (रसिकजन के कार्य)

श्लोक-1. गृहीतविद्यः प्रतिग्रहजयक्रयर्निशाधिगतैरर्थैरन्वयागतैरुभयैर्वा गार्हस्थ्यमधिगम्य नागरकमवृत्तं वर्तेत।।1।।

अर्थ- विद्या अध्ययन के समय ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इसके बाद पैतृक संपत्ति या दान, विजय, व्यापार और श्रम आदि द्वारा धन एकत्र करके विवाह करके गृह प्रवेश करना चाहिए। इसके बाद सामान्य नागरिकों की तरह जीवन व्यतीत करना चाहिए।

व्याख्या- कामसूत्र तथा उसकी अंगभूत विद्याएं ही विद्या प्राप्त करने का मुख्य अर्थ हैं। आचार्य़ वात्स्यायन के अनुसार अपहरण बलात्कार द्वारा स्त्री को प्राप्त करने की कोशिश अव्यवहारिक तथा असामाजिक है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए कामशास्त्र तथा 64 कलाओं का अध्ययन करने के बाद ही ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए।

          विवाह करने के बाद घर चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है जिसके लिए उचित उपाय करने चाहिए। इसीलिए वात्स्यायन ने स्वयं कहा है कि कामसूत्र और 64 कलाओं की शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही अपनी कुशलता और श्रम के द्वारा धन कमायें। धन कमाने के बाद ही विवाह करें। इसके अलावा पैतृक संपत्ति का प्रयोग भी कर सकते हैं। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के बाद सभ्य लोगों के समान जीवनयापन करें।

श्लोक-2. नगरे पत्तने खर्वटे महित वा सज्जनाश्रये स्थानम्। यात्रावशाद्वा।।2।।

अर्थ- विवाह करने के बाद नागरिकों को नगर में, खर्वट में, पत्तन में या महत में सभ्य लोगों के बीच निवास करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जीवन चलाने के लिए परदेश में रह सकते हैं।

श्लोक-3. तत्र भवनमासत्रोदकं वृक्षवाटिकावद्विभक्तकर्मकक्षं द्विवास-गृहं कारयेत्।।3।।

अर्थ- वहां जल के निकट वृक्षवाटिका के पास घर का निर्माण करें जिसमें रहने के लिए दो वासस्थान रखना चाहिए। एक बहि प्रकोष्ठ, दूसरा अंतः प्रकोष्ठ।

          आचार्य वात्स्यायन नागरिकों को ऐसे स्थान पर रहने की सलाह देते हैं जहां पर जीवन संबंधी सभी उपयोगी साधन उपलब्ध हो। इस प्रकार की सुविधा पत्तन (राजधानी) में, नगरों (महतीपुरी) में, खर्वट (तहसील) में तथा महत अर्थात जिले के केन्द्रों में आसानी से उपलब्ध होते हैं।

          इन साधनों में जहां पर दैनिक उपयोग और उपभोग की चीजें उपेक्षित हैं। वहीं लोगों को इससे अधिक प्राकृतिक सौंदर्य की अपेक्षा होती है। इसलिए लोग घरों का निर्माण प्रकृति के आस-पास करवाते हैं।

श्लोक-4. बाह्ये च वासगृहे सुश्रलक्ष्णमुभयोपधानं मध्ये विनतं शुक्लोत्तरच्छदं शयनीयं स्यात। प्रतिशय्यिका च। तस्य शिरोभागे कूर्चस्थानम् वेदिका च। तत्र रात्रिशेषमनलेपनं माल्यं सिक्थ करण्डकं सौगन्धिकपुटिका मातुलुड़गत्वचस्ताम्बूलाहनि च स्यूः। भृमौ पतद्ग्रहः नागदंतावसक्ता वीणा। चित्रफलकम्। वर्तिकासमुद्रकः। य कश्चतपुस्तकः कुरण्टकामालाश्च नातिदूरे भूमौ वृत्तास्तरणं समस्तकम्। आकर्षकफलकं द्यूतफलकं च। तस्य बहिः क्रीड़ाशकुनिपञ्जराणि। एकांते च तक्षतक्षणस्थानमन्यासां च क्रीडानाम्। स्वास्तीर्णा पेड्खदोला वृक्षवाटिकायां सप्रच्छाया। स्थण्डिलपीठिका च सकुसुमेति भवनविन्यासः।।4।।

अर्थ- यहां बहिःप्रकोष्ठ की सजावट का निर्देश दिया गया है-  

          घर के बाहरी प्रकोष्ठ (जिसमें नागरिक स्वयं रहता है) में अधिक नर्म, मुलायम, सुगंधित बिस्तर लगा होना चाहिए। सिर तथा पैर दोनों तरफ तकिये लगे होने चाहिए। पलंग बीच में से झुकी होनी चाहिए। पलंग के ऊपर साफ, स्वच्छ चादर होनी चाहिए तथा ऊपर मच्छरदानी तनी होनी चाहिए।

          उसी पलंग के बराबर में उसी के समान एक और पलंग लगी होनी चाहिए जोकि सेक्स क्रिया के लिए है। उस पलंग के सिरहाने पर पलंग की ऊंचाई के बराबर वेदिका रखी हो। वेदिका में रात का बचा हुआ लेपन, फूल-मालाएं, मोमबत्ती, अगरबत्ती, मातृलुंग वृक्ष की छाल तथा पान रखे हुए होने चाहिए। पलंग के पास जमीन पर पीकदान (थूकने का बर्तन) रखा हो। हाथी-दांत की खूंटी पर टंगी हुई वीणा, चित्र बनाने का त्रिफलक, तुलिका तथा रंग के डिब्बे, सजी हुई किताबें और शीघ्र न मुरझाने वाली कुरण्टक पुष्प की माला हो।

          पलंग के पास की जमीन पर एक गोल आसन बिछा होना चाहिए जिसके पीछे की तरफ सिर तथा पीठ के लिए एक गाव तकिया अथवा मनसद हो। बाहरी प्रकोष्ठ के बाहर खूंटियों पर पालतू पक्षियों के पिंजरे टंग रहे हो और किसी एकांत स्थान पर अपद्रव्य बनाने तथा बढ़ईगीरी का कार्य करने तथा अन्य प्रकार के आमोद-प्रमोद के लिए स्थान हो।   वृक्षवाटिका भी साफ, सुंदर और सुविधायुक्त होना चाहिए।

श्लोक-5. स प्रातरुत्थाय कृतनियतकृत्यः गृहीतदंतधावनः, मात्रयानुलेपनं धूपं स्त्रजमिति च गृहीत्वा सिक्थकमलक्तकं च, दृष्टवादर्शे मुखम्, गृहीत्मुखावासताम्बूलः, कार्याण्यनुतिष्ठेत।।5।।

अर्थ- इस सूत्र में नागरिक की दिन तथा रात की क्रियाओं का वर्णन किया गया है। सबसे पहले उस नागरिक को सुबह जागकर, शौच आदि क्रियाओं से फ्री होकर, दांतों को साफ करके उचित मात्रा में मस्तक में चंदन आदि का लेप करके, बालों को धूप से सुवासित कर तथा सुगंधित माला आदि को पहनकर सिक्थम (मोम) तथा अलरक्तक (अलता) का उपयोग करके शीशे में चेहरे को देखकर सुगंधित तम्बाकू आदि खाकर दैनिक कार्यों को करना चाहिए।

श्लोक-6. नित्यं स्नानम्। द्वितीयकमुत्सादनम। तृतीयकः फेनकः। चतुर्थकमायुष्यम। पञ्चमकं दशमकं वा प्रत्यायुष्यमित्यहीनम्। सातत्याच्च संवृतकक्षास्वेदापनोदः।।6।।

अर्थ- निय़मित स्नान करें, हर दूसरे दिन पूरे शरीर की मालिश करें। तीसरे दिन साबुन का प्रयोग करें। चौथे दिन दाढ़ी तथा मूंछों के बाल कटवायें तथा पांचवे दिन या दसवें दिन गुप्त अंगों के बाल सावधानी से काटे। ढकी हुई कांखों के पसीनों को हमेशा सुगंधित पाउडर का प्रयोग करके सुखायें।

          कामसूत्र को पढ़ने से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में भारत के नागरिक विद्या तथा कला का उपयोग जिस सावधानी के साथ करता था, उस प्रकार वह धन का उपयोग नहीं करता था। उसकी दिनचर्या से प्रकट होता है कि वह सुबह जागने के बाद हाथ-मुंह धोकर दातून से दांतों को साफ करता था। उसकी दातून भी कुछ विशेष प्रकार की होती थी जिसका वर्णन वृहतसंहिता में मिलता है-

          सर्वप्रथम दातून को उसके पुरोहित एक सप्ताह पहले सुगंधित द्रव्यों से सुवासित करने की प्रक्रिया शुरू कर देते थे। इसके लिए दातून को हरड़युक्त पेशाब में एक सप्ताह तक भिगोकर रख देते थे। इसके बाद इलायची, दालचीनी, तेजपात, अंजनु, शहद और कालीमिर्च से सुवासित जल में डुबोते थे। इस प्रकार से तैयार की गयी दातून को मंगलदायिनी समझा जाता था। उस समय के लोग दातून का उपयोग सिर्फ दांतों की सफाई के लिए न करके मांगलिक कार्यों के लिए भी किया करते थे। इसलिए वे अपने पुरोहितों से यह पूछ लेते थे कि कौन-से पेड़ की दातून किस विधि से करें।

          दातून के बाद लोग लेप का प्रयोग करते थे। कामसूत्र के विशेषज्ञों के अनुसार शरीर पर सिर्फ चंदन का ही लेप लगाना चाहिए। विभिन्न ग्रंथों में यह बताया गया है कि चंदन को शरीर पर उल्टा-सीधा लेप लेना नियमों के विपरीत है।

          प्राचीन समय में लोग चंदन के अतिरिक्त अन्य विभिन्न प्रकार के द्रव्यों के भी अनुलेप तैयार करते थे। इनमें कस्तूरी, अगुरू और केसर आदि के साथ दूध अथवा मलाई के लेप प्रमुख हैं। इस प्रकार के लेपों की सुगंध काफी देर तक होती है। इन लेपों के प्रयोग से शरीर के अंग स्निग्ध और चिकने होते हैं।

          अनुलेपन के बाद केशों को धूप से धूपित करने की प्रक्रिया की जाती थी, ऐसा करने पर बाल नहीं उड़ते थे, बाल सफेद नहीं होते हैं तथा चिकने और मुलायम बने रहते हैं। वराहमिहिर के ग्रंथ वृहत्संहिता में उल्लेख मिलता है कि अच्छे से अच्छे कपड़े पहनों, सुगंधित माला धारण करो तथा कीमती गहनों से अपने शरीर के अंगों को सजा लो। लेकिन यदि बाल सफेद हो गये हो तो सभी आभूषण फीके पड़ जाएंगे। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में भारत के निवासी बालों को काला बनाये रखने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते थे।  

          वृहत्संहिता के अंतर्गत बालों को धूप देने की निम्न विधि बतायी गई है। कपूर तथा केसर या कस्तूरी से सुगंधित उतारी जाती थी, उस सुगंधि से बालों को सुवासित करके कुछ देर तक उन्हें छोड़ दिया जाता है। इसके बाद स्नान किया जाता था।  

          बालों के सुवासित हो जाने के बाद लोग फूलों की माला धारण करते थे। माला को बनाने और फूलों के चुनाव में भी उसकी रुचि होती थी। उस समय के लोग चम्पाजुही और मालती आदि फूलों की मालाएं धारण करते थे लेकिन सेक्स क्रिया करने के समय विशेष प्रकार से तैयार की गयी माला धारण करते थे ताकि सेक्स के दौरान आलिंगन, चुंबन आदि के समय फूल गिरकर मुरझाएं नहीं।

          इसके बाद वह शीशे में अपना मुंह देखता था। प्राचीन काल के धनी लोगों के घरों में कांच के शीशे का उपयोग नहीं होता है। सोने अथवा चांदी के शीशों का उपयोग किया जाता है। शीशे में चेहरा देखने के बाद लोग पान खाते हैं।

          भारतीय संस्कृति में ताम्बुल को सांस्कृतिक द्रव्य माना जाता है। ताम्बुल का उपयोग साधारण स्वागत समारोह से लेकर देवताओं की पूजा तक में किया जाता है। वराहमिहिर के ग्रंथ वृहत्संहिता में उल्लेख किया गया है कि ताम्बुल (पान) के सेवन से मुंह में चमक बढ़ती है तथा सुगंध प्राप्त होती है, आवाज में मधुरता आती है। अनुराग में भी वृद्धि होती है। चेहरे की सुंदरता भी बढ़ती है तथा कफ जनित विकार दूर होते हैं।

          स्कंदपुराण के कई अध्यायों के अंतर्गत ताम्बूल का विभिन्न तरीके से वर्णन किया गया है। ताम्बूल का बीड़ा लगाना तथा ताम्बूल खाना अपने आप में एक बहुत बड़ी कला है। भारत में प्राचीन काल में धनी लोगों के यहां ताम्बूल वाहिकाएं इस कला की विशेष मर्मज्ञ हुआ करती थी। ताम्बूल का बीड़ा लगाने की विधि का वर्णन करते हुए वराहमिहिर ने कहा है कि- सुपारी, कत्था तथा चूना का उपयोग मुख्य रूप से ताम्बूल में होता है। इसके अलावा विभिन्न प्रकार के सुगंधित पदार्थ और मसाले आदि भी छोड़े जाते हैं।

          ताम्बूल के साथ उपयोग किये जाने वाले कत्था, चूना तथा सुपारी की मात्रा संतुलित होनी चाहिए। यदि ताम्बूल में कत्था की मात्रा अधिक हो जाती है तो लाली कालिमा में बदल जाती है, होंठों का रंग भद्दा हो जाता है। यदि सुपारी की मात्रा अधिक हो जाती है तो पान की लाली फीकी पड़ जाती है तथा होठों की सुंदरता बिगड़ जाती है। पान में चूने की अधिक मात्रा होने से जीभ कट जाती है तथा मुंह का सुगंध बिगड़ जाता है। यदि पान के पत्तियों की मात्रा अधिक हो तो पान की सुगंध खराब हो जाती है। इसलिए रात के पान में पत्ते की संख्या अधिक होनी चाहिए तथा दिन में सुपारी की मात्रा अधिक होनी चाहिए। पान का सेवन करने  के बाद लोग अपने कार्यों में लग जाते थे।

          आचार्य़ वात्स्यायन ने स्नान करने के बारे में कोई भी वर्णन नहीं किया है। इसका कारण यह है कि उस समय स्नान करने की कोई भी प्रचलित विधि नहीं थी तथा उसका कोई भी विशेष महत्व नहीं था।

          हमारे देश में प्राचीन काल में लोग किस प्रकार स्नान करते थे। इसकी जानकारी प्राचीन, काव्यों, नाटकों, कथा-ग्रंथों में बहुत अधिक मात्रा में मिलती है। कादम्बरी में स्नान करने की विधि का वर्णन इस प्रकार से किया गया है।

          लोग दोपहर से थोड़े समय पहले कार्यों को निपटाकर स्नान करने के लिए तैयार हो जाते थे। स्नान करने से पहले लोग कुछ हल्के व्यायाम करते थे। व्यायाम करने के बाद सोने-चांदी के बर्तनों से स्नान करते थे। स्नान के समय लोग अपनी सेविकाओं से शरीर की मालिश किसी सुगंधित तेल से कराते थे तथा बालों में आंवले का तेल लगाते थे।

          स्नान के दौरान लोग अपनी गर्दन की मालिश दिमागी तंतुओं को स्वस्थ बनाने के लिए करते थे। स्नान करने के बाद लोग शरीर को साफ कपड़े से पोछकर कपडे़ पहनता था। इसके बाद वह पूजाघर में जा करके शाम की पूजा का उपासना करता था।

          कामसूत्र में वर्णित स्नान की विधि व्यवहारिक तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी होती है। वैसे तो स्नान प्रतिदिन करना चाहिए लेकिन शरीर का उत्सादन एक-एक दिन का अंतर करके करना चाहिए। शरीर की स्वच्छता तथा कोमलता के लिए साबुन का उपयोग अवश्य ही करना चाहिए। लेकिन साबुन का उपयोग प्रतिदिन न करके हर तीसरे दिन करना चाहिए।

          उस समय के लोग अपने दांतों, नाखूनों और बालों की सफाई बहुत अच्छी तरह से करते थे। नाखूनों के काटने की कला की चर्चा वैदिक कालीन साहित्य में भी मिलती है। संस्कृत साहित्य के अध्ययन से ज्ञात होता है कि लोग नाखूनों को त्रिकोणाकार, चंद्राकार, दांतों के समान तथा अन्य विभिन्न आकृतियों में काटते थे। कुछ लोगों को लंबे नाखून पसंद थे। कुछ लोगों को छोटे आकार के तो कुछ लोगों को मध्यम आकार के नाखून रखने के शौक था।

          आचार्य वात्स्य़ायन के अनुसार हर चौथे दिन पर सेविंग करना चाहिए। भारत में हजामत (सेविंग करना) कराने तथा नाखून काटने की प्रथा बहुत ही पुरानी है। वैदिक काल में भी लोग हजामत (सेविंग करना) तथा नाखून पर विशेष ध्यान देते हैं।

          वैदिक साहित्य के अंतर्गत क्षुर और नखकृन्तक शब्द का प्रयोग से ही प्रमाणित होता है। ऋग्वेद तथा उसके बाद के साहित्य में नाखून को श्मश्रु कहा जाता है तथा सिर के बालों को केश कहते हैं। यजुर्वेद, अथर्वेद औऱ ब्राह्मण ग्रंथों में सिर के बालों का वर्णन मिलता है। वेदों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि वैदिक काल में आर्यों में बालों के बारे में विभिन्न प्रयोग मिलते हैं। अथर्ववेद के अंतर्गत विभिन्न मंत्र ऐसे होते हैं जिनमें बालों के बढ़ने के बारे में औषधियों का वर्णन किया गया है लेकिन ऐसे प्रयोग सिर्फ औरतों के लिए ही हैं।

          अधिकांश ऋषि-मुनि सिर पर लंबे बाल रखते थे तथा बालों को विभिन्न तरीके से गूंथकर रखते थे। कुछ ऋषि-मुनि बालों का जूड़ा बनाकर रखते थे तो कुछ बालों को समेटकर रखते थे। इसके अलावा कुछ ऋषि-मुनि बालों को कपाल की ओर झुकाकर बांधते हैं।  

          इस प्रकार के बालों को वेदों में कपर्द के नाम से जाना जाता है। ऋग्वेद में एक स्थान पर युवती को "चतुष्कपर्दा" तथा एक स्थान पर सिनी वाली देवी को सुकपर्दा कहा गया है। इसी प्रकार स्त्रियां भी बालों को विशेष प्रकार से बालों को संवारती हैं।

          ऋग्वेद में वशिष्ठ ऋषियों को दक्षिणतः कपर्दा अर्थात दाहिनी तरफ जटा वाले कहा जाता है। कुछ देवता और ऋषि-मुनि लंबे बाल रखते हैं लेकिन बालों में गांठ नहीं बांधने देते थे, उन्हें पुलस्ति के नाम से जाना जाता है। जो देवता और ऋषि-मुनि बाल, दाढ़ी और मूंछ बढ़ाये रहते हैं उन्हें ऋग्वेद में मोटी दाढ़ी और मूंछ वाला कहा गया है।

श्लोक-7. पूर्वाह्वयोभोजनम। सायं चारायणस्य।।7।।

अर्थ- स्नान करने के बाद भोजन तथा दिन में सोने का विधान-

          भोजन दोपहर के पहले और दोपहर के बाद दो बार करना चाहिए। लेकिन आचार्य चारायण के अनुसार दूसरा भोजन शाम के समय का ही उपयोगी होता है।

श्लोक-8. भोजनानन्तरं शुकसारिकाप्रलापनव्यापारजः। लावककुक्कुटमेषयुद्धानि तास्ताश्च कला कीड़ाः। पीठमर्दविदूषकायत्ता व्यापाराः दिवाशय्या च।।8।।

अर्थ- भोजन करने के बाद लोग तोता-मैना को बोलते और पढ़ाते थे, उनसे बाते करते थे, लावक तथा मुर्गों की लड़ाई देखना तथा विभिन्न प्रकार की कलाओं और कीड़ाओं द्वारा मनोरंजन करना तथा उनके प्रिय कार्यों को मददगार पीठमर्द, विट तथा विदूषक के सुपुर्द किये गये कार्यों की ओर ध्यान देना चाहिए। इन सभी कार्यों के उपरांत सोये।

          प्राचीन काल में भारत के नागरिक क्या खाते थे। इसके बारे में प्रबंधकोष, हर्ष चरित्र, कादम्बरी आदि ग्रंथों के वर्णनों से हो जाती है।

          कादम्बरी का अध्ययन करने से यह जानकारी प्राप्त होती है कि उस समय के भोजन में सभी तरह के खाने एवं पीने योग्य पदार्थ शामिल होते हैं। इनमें गेहूं, चावल, जौ, चना, दाल, घी और मांस आदि सभी चीजें रसोई में प्रयोग की जाती थी। भोजन, नमकीन पदार्थों से शुरू किया जाता है तथा मिठाइयों से समाप्त होता था।

          भोजन के बाद लोग सुक-सारिकाओं से बातें करते थे। प्राचीन काल में भारत में सुक-सारिकाओं का सम्मान राजमहल से लेकर ऋषि-मुनियों के आश्रम तक था।

श्लोक (9)- गृहीतप्रसाधनस्यापराह्णे गोष्ठीविहाराः।।

अर्थ- इसके दिवाशयन के बाद तीसरे पहर (शाम के समय) की दिनचर्या बताई जाती है- तीसरे पहर (शाम के समय) वस्रालंकार से विमंडित नागरक गोष्ठी-विहारों में मौजूद हो।

श्लोक (10)- प्रदोषे च संगीतकानि। तदन्ते च प्रसाधिते वासगृहे संजारितसुरभिधूपे ससहायस्य शय्यायामभिसारिकाणां प्रतीक्षणम्।

अर्थ- तथा शाम के समय संगीत की महफिल में शामिल होने के बाद सजे हुए वासगृह में अपने सहायकों के साथ बैठकर अभिसारिका के आने का इंतजार करें।

श्लोक (11)- दूतीनां प्रेषणम्, स्वयं वा गमनम्।।

अर्थ- देर हो जाने पर दूती को बुलाने के लिए भेजे या स्वयं ही उसे बुलाने जाएं।

श्लोक (12)- आगतानां च मनोद्दरैरालापैरुपचारैश्च ससहायस्योपक्रमाः।।

अर्थ- आई हुई नायिकाओं को दोस्तों के साथ अच्छी बातचीत और रसमय बर्ताव करके सम्मानित करें।

श्लोक (13)- वर्षप्रमृष्टनेपथ्यानां दुर्दिनाभिसारिकाणां स्वयमेव पुनर्मण्डनम्, मित्रजनेन वा परिचरणमित्याहोरात्रिकम्।।

अर्थ- अगर बारिश के कारण नायिका के कपड़े भीग जाते हैं तो स्वयं ही उसके कपड़े बदलकर उसका साज-श्रृंगार करें और मित्रों से सहायता लें। इस तरह से नागरक की दिनचर्यो तथा रात्रिचर्या समाप्त होती है।

          आचार्य वात्स्यायन नागरक की दिनचर्या के बारे में बताते हुए उसे सजधज कर गोष्ठी विहार में जाने की सलाह दे देते हैं। प्रसाधन से तात्पर्य साज-श्रंगार से है जो कपड़ो और अलंकारों के द्वारा पूरा माना जाता है। प्राचीन भारत के नागरिक के वस्त्रालंकार किस प्रकार के थे। इसका अंदाजा पुरानी मुर्तियों के द्वारा किया जा सकता है।

          भरतमुनि ने भी नाट्यशास्त्र इसके बारे में कुछ संकेत किए हैं। उनके मुताबिक, अभिजात्य नागरिक क्षौभ, कार्पास, कौषेय तथा शंगव 4 तरह के कपड़े पहनते हैं। अलसी के रेशों को निकालकर उनसे जो कपड़े बनाए जाते थे, उनको क्षौम कहा जाता था।

          क्षौम के कपड़ों को छाल से भी बनाया जाता था। कपास (रुई) से बने कपड़े कोशेय तथा ऊन के बने हुए कपड़े रागंव कहलाते थे। यह चारों प्रकार से कपड़े, निबन्धनीय, प्रक्षेप्य तथा आरोप्य। इन प्रकारों से पहने जाते थे। साड़ी, पगड़ी आदि निबंधीनीय कहलाते थे। चोलक तथा चोली प्रक्षेप्य और उत्तरीय, चादर, दुपट्टा आदि आरोग्य थे।

          इस तरह के कपड़े पहनने के बाद नागरिक अलंकार धारण करता था। वराहमिहिर ने 13 तरह के रत्नों तथा 9 तरह के सोने से बने गहनों का उल्लेख वृहत्संहिता के अंतर्गत किया है। वज्रमुक्ता, पद्मराग, मरकत, इन्द्रनीली, वैदूर्य, पुष्पराग, कंकेतन, पुलक, रुधिरक्ष, भीष्म, स्फटिक तता प्रवाल इन 13 प्रकार के जवाहरातों से नागरिक के कई अलंकार बनते हैं।

          जाम्बूनद, शातकौम्भ, हाटक, वेटक, श्रृंगी, शुक्तिज, जातरूप, रसविद्ध तथा आकरउद्धत- इन 9 तरह के सोने की जातियों और रत्नों को मिलाकर निम्नलिखित अलंकार बने होते थे।

          आवेध्य, निबन्धनीय, प्रक्षेप्य, आरोप्य। अंग को छेदकर पहने जाने वाले गहने आवेध्य कहलाते हैं। अंगद वेणी, शिखाद्ददिका, श्रोणी सूत्र, चूड़ामणि आदि बांधकर पहने जाने वाले गहने निबंधलीय के नाम से भी जाने जाते हैं।

          अर्निका कटक, वलय, मंजीर आदि अंग में डालकर पहने जाने वाले अलंकार प्रक्षेप्य कहा जाता है। हार नक्षत्रमालिका आदि आरोपित किए जाने वाले गहने आरोग्य कहलाते हैं।

          रत्न अलंकारों तथा कपड़ो को पहनने के बाद माल्य-अलंकार धारण करता था। वह माल्य 8 प्रकार के होते थे। उद्धर्वित, विवत, संघाट्य ग्रंथिमत, अवलंबित. मुक्तक, मंजरी तथा स्तवक। मालाओं को पहनने के बाद वह मंडन द्रव्यों से मंडित होता था।

          कस्तूरी, कुंकुम, चंदन, अगुरू, कुलक, दंतसम पटवास सहकार, बैल, तांबुल, अलकत, अंजन, गोरोचन आदि उस समय के मंडन द्रव्य थे। इन द्रव्यों की सहायता से नागरक भ्रूघटना, केश रचना आदि योजनामय अलंकार तथा देश-काल की परिस्थिति के अनुरूप श्रमजल, मद्य-मद आदि जन्य और दूर्वा, अशोक, पल्लव यवांकुर, रजत, टापू शंख, तालदल, दंतपात्रिका मृणाल वलय आदि निवेश्य से मंडित होकर विहार गोष्ठियों में जाता था।

          आचार्य वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में जिन 64 कलाओं के बारे में बताया है उनमें से 2 तिहाई कलाएं बौद्धिक अथवा साहित्यिक है। दित्याशय्या के बाद कपडे अलंकार से विमंडित नागरिक जिन गोष्ठियों में भाग लेता था। वह गोष्ठिया ज्यादातर बौद्धिक तथा साहित्यिक ही हुआ करती थी। उच्चकोटि के श्रीमंत नागरिक की गोष्ठी के साथ प्रधान अंग होते थे।

          विद्वान, भाट, मसखरे, कवि, गायक, पुराणज्ञ और इतिहासज्ञ- ये सातों अंग बौद्धिक तथा काव्यशास्त्र विनोदों में भाग लिया करते थे। आचार्य वात्स्यायन के अनुसार अच्छी या बुरी 2 प्रकार की गोष्ठी जमती थी। 1-2 मनचले लोगों की गोष्ठी- जिसमें जुआ, हिंसा आदि कुकर्म शामिल थे। दूसरे भले मनुष्यों की गोष्ठी जिसमें खेल और विद्याएं शामिल थी।

          पुराने समय में पदगोष्ठी, जलगोष्ठी, गीतगोष्ठी, नृत्यगोष्ठी, काव्यगोष्ठी, वीणागोष्ठी, वाद्यगोष्ठी आदि कई प्रकार की गोष्ठियों में नागरिक भाग लेते थे। इन गोष्ठियों के विषय, कहानियां, कलाएं, काव्य, गीत, नृत्य, चित्र और वाद्य आदि होते थे। विद्यागोष्ठी की अंगभूत गोष्ठियां काव्यगोष्ठी, पदगोष्ठी और जलगोष्ठी थी। विद्यागोष्ठी का खास समादरण था।

          काव्यगोष्ठियों में काव्य-प्रबंधो का आयोजन होता था। जलगोष्ठी में आख्यान, आख्यायिका, इतिहास और पुराण आदि सुनाए जाते थे। पदगोष्ठी में अक्षरच्युतक, मात्राच्युतक, बिन्दुमती, गूढ़ चतुर्थपाद आदि प्रकार की बुद्धि बढ़ाने वाली पहेलियां रहती थी।

          हर्षचरित के अंतर्गत बाण ने वीरगोष्ठियों के बारे में भी बताया है जिसमें रणभूमि में साका करने वाले वीरों की कहानियां कही और सुनी जाती थी। इस तरह की गोष्ठियों में भारत के पुराने नागरिक के बुद्धिचातुर्य की परीक्षा होती थी। इसके साथ ही मनोरंजन भी होता था। गोष्ठी विनोद के बाद शाम के समय संगीत का आयोजन हुआ करता था।

           नागरिक संगीत गोष्ठी को खत्म करके वासगृह में पहुंचकर अभिसारिका की प्रतीक्षा करता है। प्रसाधित वासगृहे का मतलब टीकाकारों नें धूप से खुशबूदार किया हुआ कमरा बताया है लेकिन यह गलत है। पुराने समय में राजा, अमीरों तथा संपन्न नागरिकों के यहां वासागृह बने हुए होते थे। जहां पर विवाह के बाद दूल्हा-दूल्हन का चतुर्थी कम संपादित हुआ करता था।

          वासागृह के अंतर्गत दुल्हा-दुल्हन तथा प्रेमी-प्रेमिका के बैठकर प्यार भरी बातें, आलिंगन, चुंबन आदि रति-क्रियाएं करने के लिए एक ही पलंग हुआ करता था।

          दरवाजों के पल्लों पर कामदेव की दोनों स्त्रियों प्रीति और रति की आकृतियां बनी हुआ करती थी। दोनों ही पल्लों पर मंगल-दीप जला करते थे। एक तरफ फूलों से बोझिल रक्त-अशोक के नीचे धनुष पर बाण रखे हुए निशाना साधे हुए कामदेव का चित्र बना हुआ रहता था। सफेद रंग की चादर से ढके हुए पलंग की बाजू में कांचन आचामरुक रखी होती थी और दूसरी तरफ हाथीदांत का डिब्बा लिए हुए सोने की पुत्तलिका खड़ी रहती थी। सिरहाने पर पानी से भरा हुआ चांदी का निद्राकलश रखा हुआ रहता था।

          वासागृह की भित्तियों पर गोल-गोल शीशे लगे हुए होते थे, जिनमें प्रियतमा के बहुत सारे प्रतिबिंब पड़े रहते थे। 11वीं शताब्दी में ऐसे वासगृहों को आदर्श भवन कहा जाने लगा था तथा बाद में ये शीशमहल या अरसी महल कहलाने लगे थे।

श्लोक (14)- घटानिबंधनम्, गोष्ठीसमवायः, समापानकम्, उद्यान गमनम, समस्या क्रीडाश्च प्रवर्तयेत्।।

अर्थ- इसमें 5 तरह के सामूहिक विनोदों के बारे में बताया गया है। घटानिबंधन गोष्ठी समवाय, समापानक, उद्यानगमन तथा समवयस्क मित्रो के साथ खेल खेलना- इन 5 प्रकार की क्रीड़ाओं में नागरिक को यथावसर प्रवृत्त होना चाहिए।

घटानिबंध- घटानिबंधन देवायतन में जाकर सामूहिक नृत्य-गान करने अथवा गोष्ठी का बोधक हैं। पुराने भारत का नागरिक हर मौसम में बहुत से उत्सवों का आयोजन करता था। शरद, बसंत, हेमंत तथा बारिश के मौसम के अनेक उत्सवों का विवरण पुराने ग्रंथों में बहुत ज्यादा मात्रा में मिलता है।

          दूसरे मनोरंजन को गोष्ठीसमवाय बताया गया है। इस तरह की गोष्ठियों को नागरिक अपने घर पर ही आयोजित किया करते थे या किसी गणिका के घर पर। विद्या तथा कला में माहिर कन्याएं गोष्ठी समवाय में जरूर हिस्सा लेती थी तथा पुरुषों की तरह कई प्रकार की काव्य समस्याओं, मानसी, काव्यक्रिया, पुस्तक वाचक, दुर्वाचस योग, देशभाषाविज्ञान, छंद, नाटक आदि बौद्धिक तथा उपयोगी कलाओं में भाग लेती थी और साथ ही गीत, नृत्य और रसालाप द्वारा मौजूद सभ्यों का मनोविनोद भी किया करती थी।

          तृतीय मनोरंजन समापानक है। अच्छी तरह से जी भरकर शराव का सेवन करना समापानक है। इस तरह के समापानक मनोरंजन साल में एकाध बार किए जाते थे क्योंकि कौटिल्य अर्थशास्त्र के द्वारा पता चलता है कि उस जमाने में भी शराब बनाने, पीने और बेचने पर बहुत ज्यादा नियंत्रण था। आज की तरह उस समय का भी सरकार का आबकारी विभाग शराब के ठेकों तथा शराब के बनाने आदि की व्यवस्था करता था।

          इस तरह के प्रबंध करने वाले व्यक्ति को सुराध्यक्ष कहते थे जो शराब के बनवाने और बेचने का प्रबंध काबिल व्यक्तियों द्वारा किया करता था। सुविधा के अनुसार शराब के ठेके भी वही देता था।

          अगर कोई व्यक्ति गैर-कानूनी तरीके से शराब बेचते हुए पकड़ा जाता था तो उसे सजा मिलती थी। शराब के मंगवाने या भेजने पर नियंत्रण रहता था। खुलेआम शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा हुआ था। जो व्यक्ति शराब पीकर दंगा-फसाद करता था उसे पकड़ लिया जाता था। शराब को उधार नहीं बेचा जाता था। मद्यशालाओं को बनवाने के लिए सरकारी नक्शे तैयार किये जाते थे और फिर उन्ही के आधार पर उनका निर्माण कार्य होता था। इसके अलावा सरकारी गुप्तचर विभाग का काम यह था कि वह रोजाना बिकने वाली शराब को नोट कर लें।

          समापानक जैसे उत्सवों के मौके पर मद्यनिर्माण और मद्यपान का अलग से सरकारी कानून था। इन मौकों पर सिर्फ श्वेतसुरा, आसव, मेदक और प्रस्सना नाम की शराब ही पी जाती थी।

          सुराध्यक्ष की इजाजत से नागकरण इन शराबों को अपने घर पर ही तैयार कर लिया करते थे। मदन महोत्सव आदि खास तरह के मौकों पर सिर्फ 4 दिनों तक खुलकर सामूहिक रूप से सरकार की तरफ से शराब पीने की छूट दी जाती थी। ऐसे मौकौं पर सुराध्यक्ष से व्यक्तिगत रूप से सामूहिक रूप से इजाजत लेने की जरूरत नहीं पड़ती थी।

          कामसूत्र में बताया गया है कि उन दिनों राजभवनों में अक्सर आपानकोत्सव या पान गोष्ठी के आयोजन हुआ करते थे। इन मौकों पर बाहर के प्रेमी लोग बिना किसी रोक-टोक के राजभवन में प्रवेश किया करते थे।

          चौथा मनोविनोद उद्यानगमन है। आचार्य वात्स्यायन नें स्वंय बताया है कि उस समय उद्यानगमन मनोविनोद किस तरीके से संपादित होता था। उद्यान यात्रा के लिए पहले से एकदिन तय कर लिया जाता था। उस दिन नागरिकगण सुबह से ही पूरी तरह सजधज कर तैयार हो जाया करते थे।

          यह यात्रा किसी उद्यान या वन की ही की जाती है जो नागरिकों के निवास-स्थान से इतनी दूरी पर हो कि शाम तक घर पर वापिस पहुंच सके। इन उद्यान यात्राओं में कभी-कभी अन्तःपुरिकाएं भी साथ में रहती थी और कभी-कभी गणिकाओं को भी ले जाया जाता था।

          उद्यान यात्रा एक तरह का गोठ अथवा पिकनिक होती थी। ऐसे अवसरों पर हिन्दोल लीला, समस्यापूर्ति, आख्यायितका, बिंदुमती आदि अनेक तरह की पहेलियां खेला करती थी। कुक्कुट, लाव, मेष, बटेर आदि पशु-पक्षियों की लड़ाईयां कराई जाती थी। इसी मौके पर कहीं-कहीं क्रीडैकशाल्मली खेल खेला जाता था। सेमल के पेड़ के नीचे ही इस खेल को खेला जाता था। यशोधर के अंतर्गत विदर्भ प्रदेश के नागरिक इस खेल में ज्यादा शौक रखते थे।

          पांचवां मनोविनोद समस्या क्रीड़ाओं का है जो सामूहिक रूप से खेली जाती थी। यह काव्य-कला संबंधी क्रीड़ाएं अक्सर उत्सवों में स्थान पाती थी लेकिन कभी-कभी खासतौर पर इसी विषय के दंगल होते थे। इस विनोद में खासतौर पर निम्नलिखित काव्य-क्रीड़ां होती थी।

मानसीकला-

          इस विनोद के अंतर्गत श्लोक के अक्षरों की जगह पर कमल या किसी दूसरे फूल की पंखुड़ियों को बिछा देते थे और उन पंखुड़ियों से ही श्लोक पढ़ा जाता था। इसका दूसरा रूप यह भी था कि अमुक स्थान पर यह मात्रा है, कहीं पर अनुस्वार है, कहीं पर विसर्ग है। बस इतने सी ही उसे पूरा श्लोक बनाना पड़ता था।

प्रतिमाला-

          इसको अंतयाक्षरी भी कहते हैं। एक पक्ष श्लोक पढ़ता था और दूसरा पक्ष श्लोक के अंत्याक्षर से शुरू करके दूसरा श्लोक पढ़ता था।

अक्षरमुष्ठि-

          यह समस्या 2 तरह की होती थी-सभासा और निरवभाषा। किसी नाम को संक्षिप्त करके बोलना सभासा कहलाता है जैसे फाल्गुन, चैत्र, वैशाख को छोटा करके फा-चै-वै बोलना। गुप्त तरीके से बातचीत करना निरवभासा के लिए अनेक प्रकार के इशारे काम में लाए जाते हैं। इसमें एक विधि अक्षरमुष्दि है। इसमें कवर्ग अक्षरों के लिए मुट्ठी बांधी जाती रही है। चवर्ग के लिए हथेली फैला दी जाती थी।

          इसका विधान यह है कि जो कुछ भी बोलना होता है पहले उसके अक्षरों के वर्गों के संकेत किए जाते हैं। वर्ग बताने के बाद उंगलियों को उठाकर वर्ग अक्षर बताएं जाते हैं जैसे अगर कहना है ग तो पहले वर्ग बताने के लिए मुट्टी बांधी गई और इसके बाद तीसरी उंगली उठाकर अक्षर बतला दिया गया। वर्ग तथा अक्षर बताने के बाद पैर उठाकर अथवा चुटकी बजाकर मात्राएं बताई जा सकती है।

          उस समय का हर नागरिक इस प्रकार के काव्य विनोदों को अभ्यास प्रयत्नपूर्वक करता था क्योंकि यश, कीर्ति और लाभ के स्रोत भी ऐसे खेल माने जाते थे। इनके अलावा अक्षरक्रीड़ा, द्यूत समाद्वय, जलक्रीड़ा उदक्ष्वेडिका, कुसुमावचय आदि क्रीड़ांए होती थी।

कामसूत्र

Vātsyāyana
Chapters
कामसूत्र
कामसूत्र का परिचय
1
नागरकवृन्त प्रकरण 1
नागरकवृन्त प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 1
विद्या समुदेश प्रकरण 2
विद्या समुदेश प्रकरण 3
विद्या समुदेश प्रकरण 4
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 1
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 2
त्रिवर्ग प्रतिपत्ति प्रकरण 3
शास्त्र संग्रह 1
शास्त्र संग्रह 2
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 1
नायक सहायदूतकर्म विमर्श प्रकरण 2
2
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
सप्तम अध्याय
अष्टम अध्याय
नवम अध्याय
दशम अध्याय
3
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्यायः
पंचम अध्याय
4
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
5
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
6
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
तृतीय अध्याय
चतुर्थ अध्याय
पंचम अध्याय
षष्ठम अध्याय
7
प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय