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देवी स्तोत्र

श्रीपार्वत्युवाच --

नाम्नां सहस्रमं परमं छिन्नमस्ता-प्रियं शुभम् । कथितं भवता शम्भो सद्यः शत्रु-निकृन्तनम् ॥१॥

पुनः पृच्छाम्यहं देव कृपां कुरु ममोपरि । सहस्र-नाम-पाठे च अशक्तो यः पुमान् भवेत् ॥२॥

तेन किं पठ्यते नाथ तन्मे ब्रूहि कृपा-मय । श्री सदाशिव उवाच - अष्टोत्तर-शतं नाम्नां पठ्यते तेन सर्वदा ॥३॥

सहस्र्-नाम-पाठस्य फलं प्राप्नोति निश्चितम् ।

ॐ अस्य श्रीछिन्नमस्ताष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्रस्य सदाशिव ऋषिरनुष्टुप् छन्दः

श्रीछिन्नमस्ता देवता मम-सकल-सिद्धि-प्राप्तये जपे विनियोगः ॥

ॐ छिन्नमस्ता महाविद्या महाभीमा महोदरी । चण्डेश्वरी चण्ड-माता चण्ड-मुण्ड्-प्रभञ्जिनी ॥४॥

महाचण्डा चण्ड-रूपा चण्डिका चण्ड-खण्डिनी । क्रोधिनी क्रोध-जननी क्रोध-रूपा कुहू कला ॥५॥

कोपातुरा कोपयुता जोप-संहार-कारिणी । वज्र-वैरोचनी वज्रा वज्र-कल्पा च डाकिनी ॥६॥

डाकिनी कर्म्म-निरता डाकिनी कर्म-पूजिता । डाकिनी सङ्ग-निरता डाकिनी प्रेम-पूरिता ॥७॥

खट्वाङ्ग-धारिणी खर्वा खड्ग-खप्पर-धारिणी । प्रेतासना प्रेत-युता प्रेत-सङ्ग-विहारिणी ॥८॥

छिन्न-मुण्ड-धरा छिन्न-चण्ड-विद्या च चित्रिणी । घोर-रूपा घोर-दृष्टर्घोर-रावा घनोवरी ॥९॥

योगिनी योग-निरता जप-यज्ञ-परायणा । योनि-चक्र-मयी योनिर्योनि-चक्र-प्रवर्तिनी ॥१०॥

योनि-मुद्रा-योनि-गम्या योनि-यन्त्र-निवासिनी । यन्त्र-रूपा यन्त्र-मयी यन्त्रेशी यन्त्र-पूजिता ॥११॥

कीर्त्या कर्पादनी काली कङ्काली कल-कारिणी । आरक्ता रक्त-नयना रक्त-पान-परायणा ॥१२॥

भवानी भूतिदा भूतिर्भूति-दात्री च भैरवी । भैरवाचार-निरता भूत-भैरव-सेविता ॥१३॥

भीमा भीमेश्वरी देवी भीम-नाद-परायणा । भवाराध्या भव-नुता भव-सागर-तारिणी ॥१४॥

भद्र-काली भद्र-तनुर्भद्र-रूपा च भद्रिका । भद्र-रूपा महा-भद्रा सुभद्रा भद्रपालिनी ॥१५॥

सुभव्या भव्य-वदना सुमुखी सिद्ध-सेविता । सिद्धिदा सिद्धि-निवहा सिद्धासिद्ध-निषेविता ॥१६॥

शुभदा शुभफ़्गा शुद्धा शुद्ध-सत्वा-शुभावहा । श्रेष्ठा दृष्ठि-मयी देवी दृष्ठि-संहार-कारिणी ॥१७॥

शर्वाणी सर्वगा सर्वा सर्व-मङ्गल-कारिणी । शिवा शान्ता शान्ति-रूपा मृडानी मदानतुरा ॥१८॥

इति ते कथितं देवि स्तोत्रं परम-दुर्लभमं । गुह्याद्-गुह्य-तरं गोप्यं गोपनियं प्रयत्नतः ॥१९॥

किमत्र बहुनोक्तेन त्वदग्रं प्राण-वल्लभे । मारणं मोहनं देवि ह्युच्चाटनमतः परमं ॥२०॥

स्तम्भनादिक-कर्म्माणि ऋद्धयः सिद्धयोऽपि च । त्रिकाल-पठनादस्य सर्वे सिध्यन्त्यसंशयः ॥२१॥

महोत्तमं स्तोत्रमिदं वरानने मयेरितं नित्य मनन्य-बुद्धयः । पठन्ति ये भक्ति-युता नरोत्तमा भवेन्न तेषां रिपुभिः पराजयः ॥२२॥

इति श्रीछिन्नमस्ताष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥

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