Android app on Google Play iPhone app Download from Windows Store

 

नकलची बन्दर


एक टोपी बेचने वाला था वह शहर से टोपियाँ लाकर गाँव में बेचा करता था एक दिन वह दोपहर के समय जंगल में जा रहा था थककर वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया उसने टोपियों की गठरी एक तरफ़ रख दी ठंडी हवा चल रही थी लेटते ही टोपी वाले को नींद आ गई

उस पेड़ पर कुछ बन्दर बैठे हुए थे उन्होंने देखा कि वह मनुष्य सो गया है वे पेड़ से नीचे उतर आए बन्दरों ने देखा कि मनुष्य के पास ही गठरी पड़ी है उन्होंने गठरी खोल दी उसमें बहुत-सी टोपियाँ थीं बन्दर नकलची तो होते ही हैं उन्होंने देखा कि मनुष्य ने सिर पर टोपी पहन रखी है बस हर एक बन्दर ने अपने–अपने सिर पर एक–एक टोपी पहन ली अब सारे बन्दर एक-दूसरे को देखकर हँसने लगे थोड़ी देर बाद वे सब खुशी से नाचने कूदने लगे उनमें से कुछ पेड़ पर जा बैठे।

वह आदमी जागा तो उसने बन्दरों को टोपियाँ पहने देखा उसे बड़ा गुस्सा आया उसने अपने सिर से टोपी उतार कर जमीन पर फ़ेंक दी उसने कहा --- लो यह भी ले लो बन्दर तो नकल किया ही करते हैं उन्होंने भी अपने-अपने सिर से टोपियाँ उतार कर जमीन पर पटक दीं टोपीवाले ने पत्थर मारकर बन्दरों को दूर भगा दिया फ़िर उसने टोपियाँ इकट्ठी करके गठरी में बाँध लीं गठरी सिर पर रखकर वह गाँव की ओर चल पड़ा

(सीख - नकल मे भी अक्ल की जरुरत होती है।) लेबल: नकलची बन्दर

CPU time usage: 0.060 seconds Real time usage: 0.055 seconds Preprocessor visited node count: 69/1000000 Preprocessor generated node count: 301/1000000 Post‐expand include size: 1847/2097152 bytes Template argument size: 440/2097152 bytes