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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है

लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश के बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मै-ओ-ख़ोर की तितली का तारा जाने है

आगे उस मुतक़ब्बर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद् ख़ुदा को वो मग़रूर ख़ुद-आरा जाने है

आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़िआँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है

चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है

क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्यद बच्चा
त'एर उड़ते हवा में सारे अपनी उसारा जाने है

मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-कनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है

क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है

रख़नों से दीवार-ए-चमन के मूँह को ले है छिपा य'अनि
उन सुराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है

तशना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है

मीर तक़ी

मीर तक़ी "मीर"
Chapters
आए हैं मीर मुँह को बनाए
कहा मैंने
बेखुदी ले गयी
अपने तड़पने की
हस्ती अपनी होबाब की सी है
फ़कीराना आए सदा कर चले
बेखुदी कहाँ ले गई हमको
अश्क आंखों में कब नहीं आता
गम रहा जब तक कि दम में दम रहा
देख तो दिल कि जाँ से उठता है
दिल-ऐ-पुर खूँ की इक गुलाबी से
था मुस्तेआर हुस्न से उसके जो नूर था
इधर से अब्र उठकर जो गया है
जीते-जी कूचा-ऐ-दिलदार से जाया न गया
जो इस शोर से 'मीर' रोता रहेगा
इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
उलटी हो गई सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
न सोचा न समझा न सीखा न जाना
दिल की बात कही नहीं जाती, चुप के रहना ठाना है
दम-ए-सुबह बज़्म-ए-ख़ुश जहाँ शब-ए-ग़म
गुल को महबूब में क़यास किया
होती है अगर्चे कहने से यारों पराई बात
इस अहद में इलाही मोहब्बत को क्या हुआ
जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा
काबे में जाँबलब थे हम दूरी-ए-बुताँ से
मानिंद-ए-शमा मजलिस-ए-शब अश्कबार पाया
मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
मुँह तका ही करे है जिस-तिस का
शब को वो पीए शराब निकला
तुम नहीं फ़ितना-साज़ सच साहब
क्या कहूँ तुम से मैं के क्या है इश्क़
आँखों में जी मेरा है इधर यार देखना
सहर गह-ए-ईद में दौर-ए-सुबू था
जिस सर को ग़रूर आज है याँ ताजवरी का
महर की तुझसे तवक़्क़ो थी सितमगर निकला
बारहा गोर दिल झुका लाया
आ जायें हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ
बात क्या आदमी की बन आई
कोफ़्त से जान लब पर आई है
मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद
ब-रंग-ए-बू-ए-गुल, इस बाग़ के हम आश्ना होते
मीर दरिया है, सुने शेर ज़बानी उस की
यार बिन तल्ख़ ज़िंदगनी थी
शिकवा करूँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का
अब जो इक हसरत-ए-जवानी है
शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत
चलते हो तो चमन को चलिये
दुश्मनी हमसे की ज़माने ने
यारो मुझे मुआफ़ करो मैं नशे में हूँ
दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया
आरज़ूएं हज़ार रखते हैं
रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी
अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ
हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ
यही इश्क़ ही जी खपा जानता है
नाला जब गर्मकार होता है
उम्र भर हम रहे शराबी से
मसाइब और थे पर दिल का जाना
नहीं विश्वास जी गँवाने के
बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं
क़द्र रखती न थी मता-ए-दिल
राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
मामूर शराबों से कबाबों से है सब देर
मरते हैं हम तो आदम-ए-ख़ाकी की शान पर
कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया
आ के सज्जाद
दिखाई दिये यूँ कि बेख़ुद किया
ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहत
न दिमाग है कि किसू से हम
हर जी का हयात है
चुनिन्दा अश्आर- भाग एक
चुनिन्दा अश्आर- भाग दो
चुनिन्दा अश्आर- भाग तीन
चुनिन्दा अश्आर- भाग चार
चुनिन्दा अश्आर- भाग पाँच
चाक करना है इसी ग़म से
गुल ब बुलबुल बहार में देखा
अए हम-सफ़र न आब्ले