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न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपना

न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न[1] अपना
कि अपना घर है अपना और है अपना वतन अपना

जो यूँ हो वस्ल तो मिट जाए सब रंजो-महन[2] अपना
ज़बाँ अपनी दहन[3]उनका ज़बाँ उनकी दहन अपना

न सीधी चाल चलते हैं न सीधी बात करते हैं
दिखाते हैं वो कमज़ोरों को तन कर बाँकपन अपना

अजब तासीर पैदा की है वस्फ़े-नोके-मिज़गाँ[4] ने
कि जो सुनता है उसके दिल में चुभता है सुख़न अपना

पयामे-वस्ल[5],क़ासिद[6] की ज़बानी और फिर उनसे
ये नादानी वो नाफ़हमी[7] ये था दीवानापन अपना

बचा रखना जुनूँ के हाथ से ऐ बेकसो, उसको
जो है अब पैरहन[8] अपना वही होगा क़फ़न अपना

निगाहे-ग़म्ज़ा[9] कोई छोड़ते हैं गुलशने दिल को
कहीं इन लूटने वालों से बचता है चमन अपना

यह मौका मिल गया अच्छा उसे तेशा[10] लगाने का
मुहब्बत में कहीं सर फोड़ता फिर कोहकन अपना

जो तख़्ते-लाला-ओ-गुल के खिले वो देख लेते हैं
तो फ़रमाते हैं वो कि ‘दाग़’ का ये है ये चमन अपना

दाग़ देहलवी की शायरी

दाग़ देहलवी
Chapters
मुमकिन नहीं कि तेरी मुहब्बत की बू न हो
रू-ए- अनवर नहीं देखा जाता
ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
आफत की शोख़ियां हैं
न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपना
रंज की जब गुफ्तगू होने लगी
दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
उज्र् आने में भी है और बुलाते भी नहीं
दिल गया तुम ने लिया हम क्या करें
डरते हैं चश्म-ओ-ज़ुल्फ़, निगाह-ओ-अदा से हम
फिरे राह से वो यहां आते आते
काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है
लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है
पुकारती है ख़ामोशी मेरी फ़ुगां की तरह
ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
उनके एक जां-निसार हम भी हैं
ग़ज़ब किया, तेरे वादे पे ऐतबार किया
रस्म-ए-उल्फ़त सिखा गया कोई
इस अदा से वो वफ़ा करते हैं
पर्दे-पर्दे में आताब अच्छे नहीं
न जाओ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार देखते जाओ
कहाँ थे रात को हमसे ज़रा निगाह मिले
मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया
मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता
हर बार मांगती है नया चश्म-ए-यार दिल
ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएं हम
सितम ही करना जफ़ा ही करना
आरजू है वफ़ा करे कोई
जवानी गुज़र गयी
बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं
फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्योंकर
न रवा कहिये न सज़ा कहिये
हम तुझसे किस हवस की फलक जुस्तुजू करें
अच्छी सूरत पे
हसरतें ले गए
हुस्न-ए-अदा भी खूबी-ए-सीरत में चाहिए
क्या लुत्फ़-ए-सितम यूँ उन्हें हासिल नहीं होता
क्यों चुराते हो देखकर आँखें
तेरी महफ़िल में यह कसरत कभी थी
शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का
ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई
दर्द बन के दिल में आना , कोई तुम से सीख जाए
ज़बाँ हिलाओ तो हो जाए,फ़ैसला दिल का