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स्वपन

“यह मेरे हाथी की मस्त चाल और मात।” मुस्कुराते गोपालदास ने शतरंज की बाजी समाप्त की। बाजी हार चुके कृष्ण कुमार ने अपनी बडी लम्बी मूंछ को ताव देते हुए कहा “मूंछ तो मेरी लम्बी है, खेलता तू अच्छा है।“
यह सुन कर गोपाल दास ने ठहाका लगाया “कृष्ण तू अपनी मूंछ पर अधिक ध्यान देता है, उसका आधा समय भी शतरंज मे लगा तो मेरे से अच्छा खेल सकता है।“
“गोपाल, तेरी मूंछ नही है, तुम इसका महत्व क्या जानो, एक बार रख कर देखो।“
“आज तक नही रखी, अब क्या रखूंगा।“
गोपालदास की उम्र पैसठ साल। रिटायरमेंट के बाद कंसलटेंसी का काम कर रहे है। कृष्ण कुमार फौज के रिटायर कर्नल की उम्र अरसठ साल। वो भी कंसलटेंसी का काम कर रहे है। दोनों पडोसी फुरसत के पल शतरंज खेल कर बिताते है।
गोपालदास का बडा पुत्र रोहित शिकागो, अमेरिका में रह रहा है। पुत्री रीना बैंगलुरू में अपने परिवार के साथ रह रही है। गोपालदास और पत्नी गायत्री अकेले रह रहे है। कभी पुत्र के पास अमेरिका चले जाते है, महीना दो साथ रहने के बाद फिर दिल्ली। कभी पुत्री रीना के पास चले जाते है, दस पंद्रह दिन साथ रह कर वापिस दिल्ली।
कृष्ण – “गोपाल, तुम अमेरिका क्यों नही सेटल हो जाते? तुम्हारा अपना घर है।“
“कृष्ण, तुम्हे तो बताया है कि रोहित ने लव मैरिज अमेरिकन से की है। पढने गया था, फिर वापिस नही आया। वहीं नौकरी और शादी। बच्चे भी वही के कल्चर में बढे हो रहे हैं। विचारों के साथ खाने पीने का भी अंतर है। हम शुद्ध शाकाहारी, वहां मांस बनता है। कई बार गए, ठंड भी शिकागो में ज्यादा होती है। बर्दास्त नही होती। महीना दो रह कर वापिस आ जाते हैं।“
कृष्ण – "यहां बुला लो, अब तो बाहर सेटल वापिस भारत में आ रहे हैं।“
“बात की थी, नही आना चाहते। बच्चे जहां भी रहें, खुश रहे, बस इतना सा चाहता हूं।“
फोन की घंटी से वार्तालाप समाप्त हुआ। फोन गोपालदास के पुत्र रोहित का था। फोन सुन कर खुशी से झूमते हुए गोपालदास ने कहा “कृष्ण क्रिसमस कब है?”
कृष्ण - “क्रिसमस तो क्रिसमस वाले दिन ही है।“
गोपाल संजीदा हो कर – “कृष्ण मैं मजाक के मूड में नही हूं। यह बता, क्रिसमस कब आएगा?”
कृष्ण – “पच्चीस दिसम्बर को आएगा।“
गोपाल ने यह सुन कर कृष्ण का गला पकड लिया – “साले गला घोंट दूंगा। ठीक ढंग से बता, कब आएगा।“
कृष्ण – “यार तू तो सीरियस हो गया। जुलाई का महीना है, पांच महीने बाद समझ ले।“
“रोहित का फोन था, परिवार के साथ क्रिसमस की छुट्टियों में भारत आ रहा है। भई, वहां तो लम्बी छुट्टियां होती है, क्रिसमस की, और छुट्टियां ले कर दो महीने रहेगें। एक महीना हमारे साथ और एक महीना भारत भ्रमण पर।“
कृष्ण – “यार तेरे तो मजे ही मजे है।“
"हां, सच कहता है, बच्चों के साथ समय का पता नही चलता, वरना तेरे साथ शतरंज खेलते खेलते दिमाग खाली हो जाता है।“
कृष्ण – “सच बोल, मेरे कारण ही तेरा दिमाग संतुलन में है, वरना खिसका हुआ था।“
“सच कृष्ण, बच्चों के बिना घर काटने को दौडता है। बच्चों के साथ समय कैसे बीतता है, पता ही नही चलता। पता है कृष्ण, रोहित पढने क लिए अमेरिका गया था।
इंडो-अमेरिकन स्कीम में दस छात्रों को चुना गया। सभी छात्रवृति पर गए थे। रोहित का आठवां स्थान था। पढाई के बाद नामचीम कंपनियों में सभी को नौकरी मिली।“
कृष्ण – “भाग्यशाली हो, होनहार पुत्र के पिता हो।“
“हां, भाग्यशाली तो हूं, कि पुत्र के भविष्य की कोई चिन्ता नही रही। बस बच्चों की दूरी अवश्य काटती है।“
कृष्ण – “पूरा जहां तो किसी को नही मिलता। कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो है।“
"हां, सही सत्य है। नौकरी के साथ वहीं अमेरिकन युवती जेलीना से शादी कर ली।“
कृष्ण – “सच बताना, कैसा लगा था, शादी की बात सुन कर।“
“उदास हो गया था। शादी तो उसकी पसन्द से ही करनी थी। रीति रिवाजों के साथ करने की तमन्ना थी। वह पूरी न हुई। लगभग सात महीने बाद रोहित इंडिया आया, तो पार्टी का आयोजन किया। जेलीना को अपनी विवाह की एलबम दिखाई। एक रिश्तेदार की शादी में उसको लेकर गए, तब वह इतनी अधिक उतसाहित हुई, कि रोहित से सात फेरों के लिए राजी किया। रीति रिवाजों के साथ पवित्र अग्नि के समक्ष सात फेरे लेकर विवाह पर भारतीय सभ्यता की मुहर लगाई।“
कृष्ण – “भाई, भाग्यशाली हो, भारतीय परंपरा वाली फिरंगन बहू मिली।“
“हां, यह तो है।“

जुलाई से दिसम्बर इंतजार में बीता, फिर बच्चों का आगमन। रोहित, पुत्रवधु जेलीना और पोता विधुर और पोती जेनिफर। पहले बीस दिन दिल्ली में रहे। बच्चों को दिल्ली का कोना कोना दिखाया। हर ऐतिहासिक, धार्मिक स्थल के साथ नई दिल्ली की रौकन और पुरानी दिल्ली की शान। फिर काश्मीर, लेह, हिमाचल, वैष्णो देवी, अमृतसर, आगरा, मथुरा, हरिद्वार, ऋषिकेश, जयपुर, ऊंटी, पांडीचेरी, कन्याकुमारी। दो महीने कैसे बीते, लगता था, कि दो मिन्ट में। दो महीने बाद बच्चे वापिस अमेरिका चले गए और गोपालदास के जीवन में सूनापन फिर से लौट आया। सूनापन हटाने की एक दवाई गोपालदास और कृष्ण कुमार के पास है, वह है शतरंज। रोज शाम को चालों, शह और मात का खेल नोकझोंक के साथ।

एक साल बीत गया।
जनवरी की कडकती ठंडी रात में तापमान एक डिग्री। बंद कमरे में रजाई के अंदर दुबके गोपालदास की नींद खुली। ठंड में पसीना। गला सूख रहा था। पत्नी गायत्री को हाथ लगाया।
“तबीयत ठीक नही लग रही है? पसीना आ रहा है।“ माथे पर हाथ लगा कर देखा, एकदम ठंडा। “क्या हुआ?”
“गायत्री, पानी दे, फिर बताता हूं।“
गायत्री ने गिलास में पानी दिया। पानी पी कर गोपालदास दीवार पर टकटकी लगा कर बोले “गायत्री, बत्ती जला।“
गायत्री ने बत्ती जलाई।
“गायत्री, बहुत अजीब सा सपना देखा। घबराहट के साथ नींद खुली।“
“क्या देखा?”
“सपने में जेलीना नजर आई। मेरे साथ क्नाट प्लेस में घूम रही है। शॉपिंग कर रही है। लंच क्वालिटी रेस्टारेंट में किया। फिर लंच करने के बाद तेजी से मुझसे आगे निकल गई। दो कारों के बीच में कहां अद्दश्य हो गई, मुझे नजर नही आई। मैं आवाज लगाता रह गया, जेलीना, धीरे चलो, मैं तेज नही चल सकता, परन्तु उसने अनसुना कर दिया।“
गायत्री – “आप परेशान मत हो। सपने तो ऊंटपटांग आते हैं, जिनका कोई सिर पैर होता नही।“
“हां, होते तो हैं अजीब अजीब सपने। कोई सिर पैर तो होता नही। लेकिन एक बात है। सपने में सिर्फ मैं और जेलीना हैं। रोहित और बच्चे भी नही है। इंडिया अकेली क्या कर रही है?”
गायत्री – “अब सो जाऔ।“
कुछ देर तक बातें करते गोपालदास और गायत्री सो जाते हैं। अगले दिन से सामान्य कार्यों में व्यस्त गोपालदास सपने को भूल जाते है। एक सप्ताह बाद जेलीना फिर से सपने में आती है। अब की बार गोपालदास शिकागो में है। जेलीना शॉपिंग कर रही है। एक रेस्टारेंट में बैठ कर लंच करते है, फिर से जेलिना तेजी से दो कारों के बीच कही अद्दश्य हो जाती है। गोपालदास आवाज दे रहे है, जेलीना, मुझे यहां के रास्ते नही मालूम। धीरे धीरे चलो। इसके बाद गोपालदास की नींद खुल जाती है। सपना टूट जाता है। इस बार रात में गोपालदास गायत्री को नही उठाते। सुबह नाश्ते के समय सपने की बात गायत्री से करते हैं।
गायत्री – “ आप रोहित से फोन पर बात कीजिए। मन को तसल्ली हो जाएगी। आपका चित भी शान्त हो जाएगा।“
गोपालदास रोहित को फोन मिलाते हैं।
रोहित रोते हुए फोन पर – “पापा, कल रात जेलीना का रोड एक्सीडेंट में निधन हो गया। मैं हॉस्पीटल में हूं। पिछले सप्ताह सडक पार करते हुए जेलीना ऐक्सीडेंट से बच गई थी, परन्तु कल तेज कार ने धक्का दिया, बहुत चोटे आई। पापा, जेलीना अब नही है।“

गोपालदास के हाथ से फोन छूट गया। जिस दिन पहला सपना आया, उस दिन जेलीना ऐक्सीडेंट से बच जाती है और दूसरे सपने पर कही दूर चली गई। सपने में जेलीना ने पहले से अपने जाने की सूचना दे दी थी।