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बयान 22

सुबह होते ही कुमार नहा-धोकर जंगी कपड़े पहन हथियारों को बदन पर सजा बाप-मां से विदा होने के लिए महल में गये। रानी से महाराज ने रात ही सब हाल कह दिया था। वे इनका फौजी ठाठ देखकर दिल में बहुत खुश हुईं। कुमार ने दंडवत कर विदा मांगी, रानी ने आंसू भर कर कुमार को गले से लगाया और पीठ पर हाथ फेरकर कहा, ‘‘बेटा जाओ, वीर पुरुषों में नाम करो, क्षत्रिय का कुल नाम रख फतह का डंका बजाओ। शूरवीरों का धर्म है कि लड़ाई के वक्त मां-बाप, ऐश, आराम किसी की मुहब्बत नहीं करते, सो तुम भी जाओ, ईश्वर करे लड़ाई में बैरी तुम्हारी पीठ न देखे !’’ मां-बाप से विदा होकर कुमार बाहर आये, दीवान हरदयालसिंह को मुस्तैद देखा, आप भी एक घोड़े पर सवार हो रवाना हुए। पीछे-पीछे फौज भी समुद्र की तरह लहर मारती चली। जब विजयगढ़ के करीब पहुंचे तो कुमार घोड़े पर से उतर पड़े और हरदयालसिंह से बोले, ‘‘मेरी राय है कि इसी जंगल में अपनी फौज को उतारूं और सब इन्तजाम कर लूं तो शहर में चलूं।’’ हरदयालसिंह ने कहा, ‘‘आपकी राय बहुत अच्छी है। मैं भी पहले से चलकर आपके के आने की खबर महाराज को देता हूं फिर लौटकर आपको साथ लेकर चलूंगा।’’ कुमार ने कहा, ‘‘अच्छा जाइए।’’ हरदयालसिंह विजयगढ़ पहुंचे, कुमार के आने की खबर देने के लिए महाराज के पास गये और खुलासा हाल बयान करके बोले, ‘‘कुमार सेना सहित यहाँ से कोस भर पर उतरे हैं।’’ यह सुन महाराज बहुत खुश हुए और बोले, ‘‘फौज के वास्ते वह मुकाम बहुत अच्छा है, मगर वीरेन्द्रसिंह को यहाँ ले आना चाहिए। तुम यहाँ के सब दरबारियों को ले जाकर इस्तकबाल करो और कुमार को यहाँ ले आओ !’’ बमूजिब हुक्म के हरदयालसिंह बहुत से सरदारों को लेकर रवाना हुए। यह खबर तेजसिंह को भी हुई, सुनते ही वीरेन्द्रसिंह के पास पहुंचे और दूर ही से बोले, ‘‘मुबारक हो !’’ तेजसिंह को देखकर कुमार बहुत खुश हुए और हाल-चाल पूछा, तेजसिंह ने कहा, ‘‘जो कुछ है सब अच्छा है, जो बाकी है अब बन जायेगा !’’ यह कह तेजसिंह लश्कर के इंतजाम में लगे। इतने में दीवान हरदयालसिंह मय दरबारियों के आ पहुंचे और महाराज ने जो हुक्म दिया था, कहा। कुमार ने मंजूर किया और सज-सजाकर घोड़े पर सवार हो एक सौ फौजी सिपाही साथ ले महाराज से मुलाकात को विजयगढ़ चले। शहर भर में मशहूर हो गया कि महाराज की मदद को कुंवर वीरेन्द्रसिंह आये हैं, इस वक्त किले में जायेंगे। सवारी देखने के लिए अपने-अपने मकानों पर औऱत-मर्द पहले ही से बैठ गये औऱ सड़कों पर भी बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई। सभी की आंखें उत्तर की तरफ सवारों के इंतजार में थीं। यह खबर महाराज को भी पहुंची कि कुमार चले आ रहे हैं। उन्होंनें महल में जाकर महारानी से सब हाल कहा जिसको सुनकर वे प्रसन्न हुईं और बहुत सी औरतों के साथ जिनमें चन्द्रकान्ता और चपला भी थीं, सवारी का तमाशा देखने के लिए ऊंची अटारी पर जा बैठीं। महाराज भी सवारी का तमाशा देखने के लिए दीवानखाने की छत पर जा बैठे। थोड़ी ही देर बाद उत्तर की तरफ से कुछ धूल उड़त दिखाई दी और नजदीक आने पर देखा कि थोड़ी-सी फौज (सवारों की) चली आ रही है। कुछ अरसा गुजरा तो साफ दिखाई देने लगा। कुछ सवार, जो धीरे-धीरे महल की तरफ आ रहे थे, फौलादी जेर्रा पहने हुए थे जिस पर डूबते हुए सूर्य की किरणें पड़ने से अजब चमक-दमक मालूम होती थी। हाथ में झंडेदार नेजा लिए, ढाल-तलवार लगाये जवानी की उमंग में अकड़े हुए बहुत ही भले मालूम पड़ते थे। उनके आगे-आगे एक खूबसूरत, ताकतवर और जेवरों से सजे हुए घोड़ा, जिस पर जड़ाऊ जीन कसी हुई थी और अठखेलियां कर रहा था, पर कुंवर वीरेन्द्रसिंह सवार थे। सिर पर फौलादी टोप जिसमें एक हुमा के पर की लम्बी कलंगी लगी थी, बदन में बेशकीमती लिबास के ऊपर फौलादी जेर्रा पहने हुए थे। गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आंखें, गालों पर सुर्खी छा रही थी। बड़े-बड़े पन्ने के दानों का कण्ठा और भुजबन्द भी पन्ने का था जिसकी चमक चेहरे पर पड़कर खूबसूरती को दूना कर रही थी। कमर में जड़ाऊ पेटी जिसमें बेशकीमती हीरा जड़ा हुआ था, और पिंडली तक का जूता जिस पर कौदैये मोती का काम था, चमड़ा नजर नहीं आता था, पहने हुए थे। ढाल, तलवार, खंजर, तीर-कमान लगाये एक गुर्ज करबूस में लटकता हुआ, हाथ में नेजा लिए घोड़ा कुदाते चले आ रहे थे। ताकत, जवांमर्दी, दिलेरी, और रोआब उनके चेहरे से ही झलकता था, दोस्तों के दिलों में मुहब्बत और दुश्मनों के दिलों में खौफ पैदा होता था। सबसे ज्यादा लुत्फ तो यह था कि जो सौ सवार संग में चले आ रहे थे वे सब भी उन्हीं के हमसिन थे। शहर में भीड़ लग गई, जिसकी निगाह कुमार पर पड़ती थी आंखों में चकाचौंध-सी आ जाती थी। महारानी ने, जो वीरेन्द्रसिंह को बहुत दिनों पर इस ठाठ और रोआब से आते देखा, सौगुनी मुहब्बत आगे से ज्यादा बढ़ गई। मुंह से निकल पड़ा, ‘‘अगर चन्द्रकान्ता के लायक वर है तो सिर्फ वीरेन्द्र ! चाहे जो हो, मैं तो इसी को दामाद बनाऊंगी।’’ चन्द्रकान्ता और चपला भी दूसरी खिड़की से देख रही थीं। चपला ने टेढ़ी निगाहों से कुमारी की तरफ देखा। वह शर्मा गई, दिल हाथ से जाता रहा, कुमार की तस्वीर आंखों में समा गई, उम्मीद हुई कि अब पास से देखूँगी। उधर महाराज की टकटकी बंध गई। इतने में कुमार किले के नीचे आ पहुंचे। महाराज से न रहा गया, खुद उतर आये और जब तक वे किले के अन्दर आवें महाराज भी वहां पहुंच गये। वीरेन्द्रसिंह ने महाराज को देखकर पैर छुए, उन्होंने उठाकर छाती से लगा लिया और हाथ पकड़े सीधे महल में ले गये। महारानी उन दोनों को आते देख आगे तक बढ़ आईं। कुमार ने चरण छुए, महारानी की आंखों में प्रेम का जल भर आया, बड़ी खुशी से कुमार को बैठने के लिए कहा, महाराज भी बैठ गये। बायें तरफ महारानी और दाहिनी तरफ कुमार थे, चारों तरफ लौंडियों की भीड़ थी जो अच्छे-अच्छे गहने और कपड़े पहने खड़ी थीं। कुमार की नीची निगाहें चारों तरफ घूमने लगी मानो किसी को ढूंढ़ रही हों। चन्द्रकान्ता भी किवाड़ की आड़ में खड़ी उनको देख रही थी, मिलने के लिए तबीयत घबड़ा रही थी मगर क्या करे, लाचार थी। थोड़ी देर तक महाराज और कुमार महल में रहे, इसके बाद उठे और कुमार को साथ लिये हुए दीवानखाने में पहुंचे। अपने खास आरामगाह के पास वाला एक सुन्दर कमरा उनके लिए मुकर्रर कर दिया। महाराज से विदा होकर कुमार अपने कमरे में गये। तेजसिंह भी पहुंचे, कुछ देर चुहल में गुजरी, चन्द्रकान्ता को महल में न देखने से इनकी तबीयत उदास थी, सोचते थे कि कैसे मुलाकात हो। इसी सोच में आंख लग गई। सुबह जब महाराज दरबार में गये, वीरेन्द्रसिंह स्नान-पूजा से छुट्टी पा दरबारी पोशाक पहने, कलंगी सरपेंच समेत सिर पर रख, तेजसिंह को साथ ले दरबार में गये। महाराज ने अपने सिंहासन के बगल में एक जड़ाऊ कुर्सी पर कुमार को बैठाया। हरदयालसिंह ने महाराज की चिट्ठी का जवाब पेश किया जो राजा सुरेन्द्रसिंह ने लिखा था। उसको पढ़कर महाराज बहुत खुश हुए। थोड़ी देर बाद दीवान साहब को हुक्म दिया कि कुमार की फौज में हमारी तरफ से बाजार लगाया जाये और गल्ले वगैरह का पूरा इन्तजाम किया जाये, किसी को किसी तरह की तकलीफ न हो। कुमार ने अर्ज किया, ‘‘महाराज, सामान सब साथ आया है।’’ महाराज ने कहा, ‘‘क्या तुमने इस राज्य को दूसरे का समझा है ! सामान आया है तो क्या हुआ, वह भी जब जरूरत होगी काम आवेगा। अब हम कुल फौज का इन्तजाम तुम्हारे सुपुर्द करते हैं, जैसा मुनासिब समझो बन्दोबस्त और इन्तजाम करो।’’ कुमार ने तेजसिंह की तरफ देखकर कहा, ‘‘तुम जाओ। मेरी फौज के तीन हिस्से करके दो-दो हजार विजयगढ़ के दोनों तरफ भेजो और हजार फौज के दस टुकड़े करके इधर-उधर पांच-पांच कोस तक फैला दो और खेमे वगैरह का पूरा बन्दोबस्त कर दो। जासूसों को चारों तरफ रवाना करो। बाकी महाराज की फौज की कल कवायद देखकर जैसा होगा इन्तजाम करेंगे।’’ हुक्म पाते ही तेजसिंह रवाना हुए। इस इन्तजाम और हमदर्दी को देखकर महाराज को और भी तसल्ली हुई। हरदयालसिंह को हुक्म दिया कि फौज में मुनादी करा दो कि कल कवायद होगी। इतने में महाराज के जासूसों ने आकर अदब से सलाम कर खबर दी कि शिवदत्तसिंह अपनी तीस हजार फौज लेकर सरकार से मुकाबला करने के लिए रवाना हो चुका है, दो-तीन दिन तक नजदीक आ जायेगा। कुमार ने कहा, ‘‘कोई हर्ज नहीं, समझ लेंगे, तुम फिर अपने काम पर जाओ।’’ दूसरे दिन महाराज जयसिंह और कुमार एक हाथी पर बैठकर फौज की कवायद देखने गये। हरदयालसिंह ने मुसलमानों को बहुत कम कर दिया था-तो भी एक हजार मुसलमान रह गये थे। कवायद देख कुमार बहुत खुश हुए मगर मुसलमानों की सूरत देख त्योरी चढ़ गई। कुमार की सूरत से महाराज समझ गये और धीरे से पूछा, ‘‘इन लोगों को जवाब दे देना चाहिए ?’’ कुमार ने कहा, ‘‘नहीं, निकाल देने से ये लोग दुश्मन के साथ हो जायेंगे ! मेरी समझ में बेहतर होगा कि दुश्मन को रोकने के लिए पहले इन्हीं लोगों को भेजा जाये। इनके पीछे तोपखाना और थोड़ी फौज हमारी रहेगी, वे लोग इन लोगों की नीयत खराब देखने या भागने का इरादा मालूम होने पर पीछे से तोप मार-कर इन सभी की सफाई कर डालेंगे। ऐसा खौफ रहने से ये लोग एक दफा तो खूब लड़ जायेंगे, मुफ्त मारे जाने से लड़कर मरना बेहतर समझेंगे।’’ इस राय को महाराज ने बहुत पसन्द किया और दिल में कुमार की अक्ल की तारीफ करने लगे। जब महाराज फिरे तो कुमार ने अर्ज किया, ‘‘मेरा जी शिकार खेलने को चाहता है, अगर इजाजत हो तो जाऊं ? महाराज ने कहा, ‘‘अच्छा, दूर मत जाना और दिन रहते जल्दी लौट आना।’’ यह कहकर हाथी बैठवाया। कुमार उतर पड़े और घोड़े पर सवार हुए। महाराज का इशारा पा दीवान हरदयालसिंह ने सौ सवार साथ कर दिये। कुमार शिकार के लिए रवाना हुए। थोड़ी देर बाद एक घने जंगल में पहुंचकर दो सांभर तीर से मार फिर और शिकार ढूंढ़ने लगे। इतने में तेजसिंह भी पहुंचे कुमार से पूछा, ‘‘क्या सब इन्तजाम हो चुका जो तुम यहाँ चले आये ?’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘क्या आज ही हो जायेगा ? कुछ आज हुआ कुछ कल दुरुस्त हो जायेगा। इस वक्त मेरे जी में आया कि चलें जरा उस तहखाने की सैर कर आवें जिसमें अहमद को कैद किया है, इसलिए आपसे पूछने आया हूं कि अगर इरादा हो तो आप भी चलिए।’’ ‘‘हाँ, मैं भी चलूंगा।’’ कहकर कुमार ने उस तरफ घोड़ा फेरा। तेजसिंह भी घोड़े के साथ रवाना हुए। बाकी सभी को हुक्म दिया कि वापस जाएं और दोनों सांभरों का जो शिकार किये हैं, उठवा ले जायें। थोड़ी देर में कुमार और तेजसिंह तहखाने के पास पहुंचे और अन्दर घुसे। जब अंधेरा निकल गया और रोशनी आई तो सामने एक दरवाजा दिखाई देने लगा। कुमार घोड़े से उतर पड़े। अब तेजसिंह ने कुमार से पूछा, ‘‘भला यह कहिए कि आप यह दरवाजा खोल भी सकते हैं कि नहीं ?’’ कुमार ने कहा, ‘‘क्यों नहीं, इसमें क्या कारीगरी है ?’’ यह कह झट आगे बढ़ शेर के मुंह से जुबान बाहर निकाल ली, दरवाजा खुल गया। तेजसिंह ने कहा, ‘‘याद तो है !’’ कुमार ने कहा, ‘‘क्या मैं भूलने वाला हूं।’’ दोनों अन्दर गये और सैर करते-करते चश्में के किनारे पहुंचे। देखा कि अहमद और भगवानदास एक चट्टान पर बैठे बातें कर रहे हैं, पैर में बेड़ी पड़ी है। कुमार को देख दोनों उठ खड़े हुए, झुककर सलाम किया और बोले, ‘‘अब तो हम लोगों का कसूर माफ होना चाहिए।’’ कुमार ने कहा, ‘‘हाँ थोड़े रोज और सब्र करो।’’ कुछ देर तक वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह टहलते और मेवों को तोड़कर खाते रहे। इसके बाद तेजसिंह ने कहा, ‘‘अब चलना चाहिए। देर हो गई।’’ कुमार ने कहा, ‘‘चलो।’’ दोनों बाहर आये तेजसिंह ने कहा, ‘‘इस दरवाजे को आपने खोला है, आप ही बन्द कीजिए।’’ कुमार ने यह कह कि ‘‘अच्छा लो, हम ही बन्द कर देते हैं’’, दरवाजा बन्द कर दिया और घोड़े पर सवार हुए। जब विजयगढ़ के करीब पहुंचे तो तेजसिंह ने कहा, ‘‘अब आप जाइए, मैं जरा फौज की खबर लेता हुआ आता हूँ।’’ कुमार ने कहा, ‘‘अच्छा जाओ।’’ यह सुन तेजसिंह दूसरी तरफ चले गये और कुमार किले में चले आये, घोड़े से उतर कमरे में गये, आराम किया। थोड़ी रात बीते तेजसिंह कुमार के पास आये। कुमार ने पूछा, ‘‘कहो, क्या हाल हैं ?’’तेजसिंह ने कहा, ‘‘सब इन्तजाम आपके हुक्म मुताबिक हो गया, आज दिनभर में एक घण्टे की छुट्टी न मिली जो आपसे मुलाकात करता।’’ यह सुन वीरेन्द्रसिंह हंस पड़े और बोले, ‘‘दोपहर तक तो हमारे साथ रहे तिस पर कहते हो कि मुलाकात न हुई !’’ यह सुनते ही तेजसिंह चौंक पड़े और बोले, ‘‘आप क्या कहते हैं।’’ कुमार ने कहा, ‘‘कहते क्या हैं, तुम मेरे साथ उस तहखाने में नहीं गये थे जहाँ अहमद और भगवानदत्त बन्द हैं ?’’ अब तो तेजसिंह के चेहरे का रंग उड़ गया और कुमार का मुंह देखने लगे। तेजसिंह की यह हालत देखकर कुमार को भी ताज्जुब हुआ। तेजसिंह ने कहा, ‘‘भला यह तो बताइए कि मैं आपसे कहाँ मिला था, कहाँ तक साथ गया और कब वापस आया ?’’ कुमार ने सब कुछ कह दिया। तेजसिंह बोले. ‘‘बस, आपने चौका फेरा। अहमद और भगवानदत्त के निकल जाने का तो इतना गम नहीं है मगर दरवाजे का हाल दूसरे को मालूम हो गया इसका बड़ा अफसोस है।’’ कुमार ने कहा, ‘‘तुम क्या कहते हो समझ में नहीं आता।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘ऐसा ही समझते तो धोखा ही क्यों खाते। तब न समझे तो अब समझिए, कि शिवदत्त के ऐयारों ने धोखा दिया और तहखाने का रास्ता देख लिया। जरूर यह काम बद्रीनाथ का है, दूसरे का नहीं, ज्योतिषी उसको रमल के जरिए से पता देता है।’’ कुमार यह सुन दंग हो गये और अपनी गलती पर अफसोस करने लगे। तेजसिंह ने कहा, ‘‘अब तो जो होना था हो गया, उसका अफसोस कहे का। मैं इस वक्त जाता हूँ, कैदी तो निकल गये होंगे मगर मैं जाकर ताले का बन्दोबस्त करूंगा।’’ कुमार ने पूछा, ‘‘ताले का बन्दोबस्त क्या करोगे ?’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘उस फाटक में और भी दो ताले हैं जो इससे ज्यादा मजबूत हैं। उन्हें लगाने और बन्द करने में बड़ी देर लगती है इसलिए उन्हें नहीं लगाता था मगर अब लगाऊंगा।’’ कुमार ने कहा, ‘‘मुझे भी वह ताला दिखाओ।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘अभी नहीं, जब तक चुनार पर फतह न पावेंगे न बतावेंगे नहीं तो फिर धोखा होगा।’’ कुमार ने कहा, ‘‘अच्छा मर्जी तुम्हारी।’’ तेजसिंह उसी वक्त तहखाने की तरफ रवाना हुए और सवेरा होने के पहिले ही लौट आये। सुबह को जब कुमार सोकर उठे तो तेजसिंह से पूछा, ‘‘कहो तहखाने का क्या हाल है ?’’ उन्होंने जवाब दिया, ‘‘कैदी तो निकल गये मगर ताले का बन्दोबस्त कर आया हूँ।’’ नहा-धोकर कुछ खाकर कुमार को तेजसिंह दरबार ले गये। महाराज को सलाम करके दोनों आदमी अपनी-अपनी जगह बैठ गये। आज जासूसों ने खबर दी कि शिवदत्त की फौज और पास आ गई है, अब दस कोस पर है। कुमार ने महाराज से अर्ज किया, ‘‘अब मौका आ गया है कि मुसलमानों की फौज दुश्मनों को रोकने के लिए आगे भेजी जाये।’’ महाराज ने कहा, ‘‘अच्छा भेज दो।’’ कुमार ने तेजसिंह से कहा, ‘‘अपना एक तोपखाना भी इस मुसलमानी फौज के पीछे रवाना करो।’’ फिर कान में कहा, ‘‘अपने तोपखाने वालों को समझा देना कि जब फौज की नीयत खराब देखें तो जिन्दा किसी को न जाने दें। तेजसिंह इन्तजाम करने के लिए चले गये, हरदयालसिंह को भी साथ लेते गये। महाराज ने दरबार बर्खास्त किया और कुमार को साथ ले महल में पधारे। दोनों ने साथ ही भोजन किया, इसके बाद कुमार अपने कमरे में चले गये। छटपटाते रह गये मगर आज भी चन्द्रकान्ता की सूरत न दिखी, लेकिन चन्द्रकान्ता ने आड़ से इनको देख लिया।